ठंड और बदली का असर: आलू की फसल में झुलसा रोग (Jhulsa Disease) का बढ़ा खतरा, किसान रहें सतर्क

Jhulsa Disease
Jhulsa Disease

Jhulsa Disease: मौसम में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव और तापमान में गिरावट ने आलू की फसल के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय कई तरह के रोगों के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल बन रही हैं, जिनमें झुलसा (ब्लाइट) रोग सबसे प्रमुख है। मौसम के आकलन के आधार पर अनुमान है कि आने वाले दिनों में झुलसा रोग का प्रकोप बढ़ सकता है, इसलिए किसानों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, बादल छाए रहने और वातावरण में नमी बढ़ने पर फफूंद का संक्रमण तेजी से फैलता है — यही झुलसा रोग का मुख्य कारण बनता है। यह रोग दो प्रकार का होता है — अगेती झुलसा और पछेती झुलसा। अगेती झुलसा सामान्यतः दिसंबर के अंत में दिखाई देता है, जबकि पछेती झुलसा जनवरी के दौरान अधिक फैलता है। हालांकि, मौसमी बदलाव के कारण यह रोग कभी भी शुरू हो सकता है।

पछेती झुलसा को आलू की सबसे नुकसानदेह बीमारी माना जाता है। इस रोग में पत्तियों के सिरे और किनारे पहले सूखने लगते हैं और धीरे-धीरे पूरा पौधा प्रभावित हो जाता है। नमी और बदली वाले मौसम में रोग तेजी से फैलता है और दो–तीन दिनों में पूरी पत्तियाँ झुलस सकती हैं। गंभीर स्थिति में तना और कंद (आलू) भी सड़ने लगते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब वातावरण में लगभग 80% नमी हो और तापमान 10 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच हो, तब झुलसा रोग बहुत तेजी से फैलता है और एक सप्ताह के भीतर पूरी फसल को नष्ट कर सकता है।

रोकथाम के लिए कृषि वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि आलू और टमाटर की फसल पर कार्बेन्डाजिम 12% + मैंकोजेब 63% दवा का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव मैंकोजेब से किया जा सकता है।

पछेती झुलसा के नियंत्रण में संपर्क एवं प्रणालीगत (सर्वागी) फफूंदनाशकों का संयोजन प्रभावी माना गया है। पहले कॉपर साल्ट और बोर्डो मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब डिथियोकार्बामेट और मेटालेक्सिल आधारित दवाएँ अधिक उपयोगी साबित हो रही हैं। साथ ही, रोग में प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो, इसके लिए मेटालेक्सिल को मैंकोजेब जैसे संपर्क फफूंदनाशक के साथ मिलाकर छिड़काव करने की सलाह दी जाती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि समय पर निगरानी, सही दवाओं का उपयोग और मौसम के अनुरूप खेती प्रबंधन से झुलसा रोग के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।