Train Delay: भारतीय रेलवे में ट्रेनों के लेट होने के कई कारण होते हैं, लेकिन हाल ही में सामने आई जानकारी ने एक अलग ही समस्या की ओर ध्यान खींचा है। आरटीआई से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में रेलवे ट्रैक पर घूमने वाले छुट्टा पशुओं की वजह से सवा लाख (1.25 लाख) से अधिक पैसेंजर और मालगाड़ियां देरी का शिकार हुई हैं। यह आंकड़ा न केवल रेलवे संचालन की चुनौतियों को दर्शाता है, बल्कि यात्रियों की परेशानी और आर्थिक नुकसान को भी उजागर करता है।
रेलवे विशेषज्ञों के अनुसार, जब भी कोई ट्रेन बिना किसी तकनीकी या प्रशासनिक कारण के अचानक रुकती है, तो उसके पीछे आने वाली अन्य ट्रेनों को भी रोकना पड़ता है। इस वजह से एक ट्रेन की देरी का असर कई अन्य ट्रेनों पर भी पड़ता है। छुट्टा पशुओं के कारण होने वाली ऐसी घटनाएं अब एक गंभीर समस्या बन चुकी हैं।
आरटीआई में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, बीते चार सालों में लगभग एक लाख से ज्यादा ऐसे मामले दर्ज हुए हैं, जहां ट्रेन की चपेट में आकर पशुओं की मौत हुई। इन घटनाओं के बाद सुरक्षा कारणों से ट्रेन को रोककर जांच करनी पड़ती है, जिससे देरी होना तय हो जाता है।
यदि साल-दर-साल आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2019-20 में पशुओं के ट्रेन से कटने की करीब 27 हजार घटनाएं सामने आईं, जिनके कारण लगभग 37 हजार ट्रेन लेट हुईं। 2020-21 में करीब 20 हजार घटनाओं के चलते 23 हजार ट्रेनों को देरी का सामना करना पड़ा। 2021-22 में यह संख्या बढ़कर 29 हजार घटनाओं तक पहुंच गई, जिससे 36 हजार ट्रेन प्रभावित हुईं। वहीं 2022-23 में 26 हजार घटनाओं के कारण फिर से करीब 36 हजार ट्रेन लेट हुईं।
यह समस्या देखने में भले छोटी लगे, लेकिन इसका असर व्यापक है। एक ट्रेन के रुकने से पूरे नेटवर्क पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे यात्रियों की यात्रा प्रभावित होती है और समय की बर्बादी होती है।
आर्थिक दृष्टि से भी यह नुकसान काफी बड़ा है। आरटीआई के अनुसार, यदि डीजल से चलने वाली एक पैसेंजर ट्रेन एक मिनट के लिए रुकती है, तो रेलवे को लगभग 20,401 रुपये का नुकसान होता है। वहीं इलेक्ट्रिक पैसेंजर ट्रेन के मामले में यह नुकसान करीब 20,459 रुपये प्रति मिनट तक पहुंच जाता है। इसी तरह, डीजल मालगाड़ी को एक मिनट रुकने पर करीब 13,334 रुपये और इलेक्ट्रिक मालगाड़ी को 13,392 रुपये का नुकसान होता है।
यह नुकसान केवल रेलवे तक सीमित नहीं है। ट्रेनों में यात्रा कर रहे यात्रियों को भी देरी के कारण समय, काम और कई बार आर्थिक हानि झेलनी पड़ती है। कुछ मामलों में रेलवे यात्रियों को मुआवजा भी देता है, जो आमतौर पर 100 से 200 रुपये प्रति यात्री होता है। हालांकि, यह मुआवजा यात्रियों की असुविधा की पूरी भरपाई नहीं कर पाता।
इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए रेलवे और रेलवे पुलिस ने कई कदम उठाए हैं। ट्रैक के आसपास पशु चराने वालों पर कार्रवाई भी की जा रही है। आंकड़ों के अनुसार, 2019 में 51 एफआईआर दर्ज की गईं, 2020 में 126, 2021 में 333 और 2022 में 428 मामले दर्ज किए गए। यह दिखाता है कि रेलवे इस समस्या को लेकर गंभीर है और लगातार सख्ती बढ़ा रहा है।
इसके बावजूद, छुट्टा पशुओं की समस्या पूरी तरह से खत्म नहीं हो पाई है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में ट्रैक के आसपास पशुओं का खुले में घूमना आम बात है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए केवल कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन, पशुपालकों और रेलवे के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है। ट्रैक के किनारे मजबूत फेंसिंग, जागरूकता अभियान और निगरानी बढ़ाने जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।
कुल मिलाकर, छुट्टा पशुओं की वजह से ट्रेनों की देरी अब एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। यदि समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या भविष्य में और भी बड़ी हो सकती है।

