भारत वैश्विक एयरोस्पेस सप्लाई चेन में तेजी से अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को कहा कि अमेरिका की विमान निर्माता कंपनी बोइंग भारत से विमान के कलपुर्जों (एयरक्राफ्ट कंपोनेंट्स) की एक प्रमुख खरीदार है और भविष्य में भारत को अपने सबसे बड़े विदेशी मूल उपकरण विनिर्माता (OEM) आधार के रूप में देख रही है। मंत्री के इस बयान से यह संकेत मिलता है कि भारत न केवल विमानन बाजार के रूप में, बल्कि उत्पादन और आपूर्ति केंद्र के रूप में भी वैश्विक कंपनियों का भरोसा जीत रहा है।
पीयूष गोयल ने यह भी बताया कि भारत और अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते से दोनों देशों की औद्योगिक साझेदारी को नई गति मिली है। इस समझौते के तहत अमेरिका ने कुछ विमानों और विमान के कलपुर्जों पर लगने वाले शुल्क को हटाने पर सहमति जताई है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी एयरोस्पेस बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और निर्यात को गति देने का रास्ता साफ हुआ है।
बोइंग और एयरबस की भारत पर बढ़ती निर्भरता
गोयल ने कहा, “बोइंग और एयरबस पहले से ही भारत से विमान के कलपुर्जों के बड़े खरीदार हैं। मुझे बताया गया है कि आने वाले समय में ये दोनों कंपनियां भारत को कलपुर्जों के लिए अपने सबसे बड़े विदेशी OEM के रूप में देख रही हैं।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस विषय पर उनकी दोनों कंपनियों के शीर्ष बोर्ड सदस्यों और सीईओ के साथ सीधी बातचीत हो चुकी है। मंत्री के अनुसार, भारत-अमेरिका साझेदारी को लेकर उद्योग जगत में जबरदस्त उत्साह है।
भारत, बोइंग के लिए एक अहम बाजार बना हुआ है। देश में इस समय 265 से अधिक वाणिज्यिक और सैन्य विमान परिचालन में हैं, जो बोइंग की भारत में मजबूत मौजूदगी को दर्शाता है। इसके अलावा, बोइंग का भारतीय सप्लायर नेटवर्क भी लगातार विस्तार कर रहा है। कंपनी के पास भारत में 325 से अधिक आपूर्तिकर्ता हैं, जिनके माध्यम से वह कलपुर्जों और सेवाओं की खरीद करती है।
अरबों डॉलर की खरीद, हजारों नौकरियों की संभावना
आंकड़ों के मुताबिक, बोइंग की भारत से वार्षिक खरीद 1.25 अरब डॉलर से अधिक की है, जिसमें विमान के कलपुर्जों के साथ-साथ इंजीनियरिंग और अन्य सेवाएं भी शामिल हैं। यह न केवल भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए बड़ा अवसर है, बल्कि इससे रोजगार सृजन, तकनीकी कौशल विकास और स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी बढ़ावा मिल रहा है।
सिर्फ बोइंग ही नहीं, यूरोपीय विमान निर्माता एयरबस भी भारत में अपने निवेश और खरीद को तेजी से बढ़ा रही है। एयरबस का लक्ष्य है कि 2030 तक भारत से घटकों और सेवाओं की खरीद को बढ़ाकर 2 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाए। फिलहाल यह आंकड़ा लगभग 1.4 अरब डॉलर के आसपास है। इससे साफ है कि भारत वैश्विक एयरोस्पेस कंपनियों के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार बनता जा रहा है।
‘मेक इन इंडिया’ को मिल रहा अंतरराष्ट्रीय समर्थन
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रगति सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलों का प्रत्यक्ष परिणाम है। बेहतर नीतिगत माहौल, कुशल इंजीनियरिंग टैलेंट, प्रतिस्पर्धी लागत और मजबूत सप्लाई चेन ने भारत को एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग का भरोसेमंद केंद्र बना दिया है। व्यापार समझौतों से शुल्क बाधाएं कम होने पर भारतीय कंपनियों को वैश्विक ऑर्डर मिलने की संभावनाएं और बढ़ेंगी।
कुल मिलाकर, बोइंग और एयरबस जैसी दिग्गज कंपनियों का भारत पर बढ़ता भरोसा यह संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में देश वैश्विक विमानन उद्योग का अहम उत्पादन केंद्र बन सकता है। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि भारत की औद्योगिक क्षमता और वैश्विक प्रतिष्ठा भी मजबूत होगी।

