भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत होता जा रहा है और यह साझेदारी अब एक नए रणनीतिक चरण में प्रवेश करती दिख रही है। दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर की रक्षा डील को लेकर गंभीर बातचीत चल रही है, जिसमें भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस अहम भूमिका निभा सकती है। इसी बीच पाकिस्तान को एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है, क्योंकि यूएई ने उसके स्वदेशी बताये जाने वाले JF-17 लड़ाकू विमान को खरीदने से साफ इनकार कर दिया है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह घटनाक्रम न केवल भारत की बढ़ती सैन्य विश्वसनीयता को दर्शाता है, बल्कि पाकिस्तान के हथियार निर्यात के दावों पर भी सवाल खड़े करता है। बीते कुछ वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं और अब उसके हथियार वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बना रहे हैं।
ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास ध्यान आकर्षित किया है। पिछले वर्ष ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस मिसाइल ने अपनी मारक क्षमता और सटीकता का प्रदर्शन किया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के 11 एयरबेस पर किए गए सटीक हमलों के बाद ब्रह्मोस की वैश्विक मांग में तेजी से इजाफा हुआ। फिलीपींस पहले ही इस मिसाइल प्रणाली को खरीद चुका है और उसने इसके लिए अतिरिक्त ऑर्डर भी दिए हैं। इसके बाद कई अन्य देशों ने भी ब्रह्मोस में रुचि दिखाई है, जिनमें यूएई का नाम प्रमुख रूप से सामने आ रहा है।
इसी कड़ी में यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MBZ) का हालिया भारत दौरा बेहद अहम माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान भारत और यूएई के बीच एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ, जिसके तहत दोनों देश संयुक्त रूप से हथियारों के निर्माण और तकनीकी सहयोग पर काम करेंगे। रक्षा सूत्रों का कहना है कि ब्रह्मोस मिसाइल से जुड़ा सौदा भी अंतिम चरण में पहुंच चुका है, हालांकि कुछ तकनीकी और कूटनीतिक अड़चनें अभी बाकी हैं।
सबसे बड़ी चुनौती MTCR (मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम) को लेकर है। इस व्यवस्था के तहत 290 किलोमीटर से अधिक रेंज वाली मिसाइलों के निर्यात पर प्रतिबंध है। भारत MTCR का सदस्य है और उसने ब्रह्मोस मिसाइल की रेंज को 450 किलोमीटर से अधिक तक बढ़ा दिया है। वहीं यूएई इस व्यवस्था का सदस्य नहीं है, जिसके कारण सौदे को अंतिम रूप देने में समय लग सकता है। इसके अलावा, ब्रह्मोस परियोजना में रूस की साझेदारी होने के कारण उसकी मंजूरी भी आवश्यक है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान लंबे समय से JF-17 लड़ाकू विमान को लेकर बड़े-बड़े दावे करता रहा है। उसने इंडोनेशिया, सऊदी अरब और अन्य देशों को यह विमान बेचने की बात कही थी, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक ये दावे ज़मीनी हकीकत से काफी दूर हैं। यूएई जैसे रणनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत देश द्वारा JF-17 को खारिज किया जाना पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में यूएई के राष्ट्रपति पाकिस्तान के दौरे पर भी गए थे, लेकिन उस यात्रा से कोई बड़ा रक्षा या रणनीतिक समझौता सामने नहीं आया। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह दौरा काफी सीमित रहा और इसका फोकस किसी बड़े सैन्य सहयोग की बजाय अन्य गतिविधियों तक ही सीमित रहा।
कुल मिलाकर, मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत देता है कि वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है। जहां पाकिस्तान की हथियार निर्यात की कोशिशें अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पा रही हैं, वहीं भारत की ब्रह्मोस मिसाइल जैसी उन्नत प्रणालियां अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान बना रही हैं। आने वाले समय में भारत-यूएई रक्षा साझेदारी न केवल दोनों देशों की सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है।

