French Wine Tariff: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी आक्रामक व्यापार नीति का प्रदर्शन करते हुए फ्रांस को खुली चेतावनी दी है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि यदि फ्रांस उनके प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय मंच ‘बोर्ड फॉर पीस’ में शामिल होने से इनकार करता है, तो अमेरिका फ्रेंच वाइन और शैम्पेन पर 200 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाने पर विचार कर सकता है। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति और व्यापार जगत में हलचल तेज हो गई है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है जब अमेरिका गाज़ा में इज़रायल और हमास के बीच जारी संघर्ष के बाद युद्धविराम की निगरानी और पुनर्निर्माण के लिए एक नया अंतरराष्ट्रीय ढांचा तैयार करने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप का दावा है कि ‘बोर्ड फॉर पीस’ इसी उद्देश्य से बनाया जा रहा है और वह स्वयं इसकी अगुवाई करेंगे। ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में फ्रांस समेत कई देशों को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण भेजा था, ताकि इसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल सके।
हालांकि फ्रांस ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया है। एक वरिष्ठ फ्रांसीसी अधिकारी ने बताया कि फ्रांस इस बोर्ड में शामिल होने का इच्छुक नहीं है, क्योंकि इसका ढांचा संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करता हुआ प्रतीत होता है। फ्रांस का मानना है कि गाज़ा जैसे अत्यंत संवेदनशील और जटिल मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका को नजरअंदाज करना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
फ्रांस की इस प्रतिक्रिया के बाद ट्रंप ने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे इनकार की “कीमत चुकानी पड़ सकती है।” उन्होंने संकेत दिया कि फ्रेंच वाइन और शैम्पेन जैसे प्रमुख निर्यात उत्पादों पर 200 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। यह धमकी फ्रांस के लिए विशेष रूप से गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि वाइन उद्योग न केवल उसकी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
फ्रांस के कृषि मंत्री ने ट्रंप की इस चेतावनी पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे “ब्लैकमेल” करार देते हुए कहा कि किसी संप्रभु देश पर व्यापारिक दबाव डालकर राजनीतिक फैसले बदलवाने की कोशिश स्वीकार्य नहीं है। मंत्री ने यह भी कहा कि फ्रांस अपने सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति प्रतिबद्धता से समझौता नहीं करेगा, चाहे इसके लिए उसे आर्थिक दबाव का सामना ही क्यों न करना पड़े।
विश्लेषकों के मुताबिक, ट्रंप की यह रणनीति नई नहीं है। इससे पहले भी वह व्यापारिक टैरिफ को राजनीतिक दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम का एक बड़ा उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के प्रभाव को सीमित करना और अमेरिका-केंद्रित वैश्विक व्यवस्था को आगे बढ़ाना हो सकता है। आलोचकों का कहना है कि ‘बोर्ड फॉर पीस’ जैसी पहलें न केवल यूएन की साख को नुकसान पहुंचा सकती हैं, बल्कि गाज़ा संकट के समाधान को और अधिक जटिल बना सकती हैं।
फ्रांस के इनकार और ट्रंप की टैरिफ धमकी ने एक बार फिर ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव पैदा कर दिया है। यूरोप के अन्य देशों में भी इस मुद्दे को लेकर चिंता देखी जा रही है, क्योंकि यदि अमेरिका इस तरह की व्यापारिक सख्ती अपनाता है तो उसका असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों पक्ष बातचीत के जरिए किसी समाधान पर पहुंचते हैं या फिर यह विवाद अमेरिका और यूरोप के बीच एक नए टकराव का रूप ले लेता है।

