भारत की आपत्ति के बावजूद शक्सगाम ( Shaksgam Valley)पर चीन कायम, दावे दोहराए

Shaksgam Valley
Shaksgam Valley

भारत की कड़ी और स्पष्ट आपत्ति के बावजूद चीन ने शक्सगाम घाटी  (Shaksgam Valley) को लेकर अपने क्षेत्रीय दावे को एक बार फिर दोहराया है। बीजिंग ने कहा है कि शक्सगाम घाटी में उसकी बुनियादी ढांचा गतिविधियां “पूरी तरह वैध” हैं और वह अपने ही क्षेत्र में विकास कार्य कर रहा है। चीन का यह बयान ऐसे समय आया है, जब भारत ने हाल ही में इस इलाके में चीनी निर्माण कार्यों को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया था और इसे भारत की संप्रभुता के खिलाफ बताया था।

भारत ने पिछले सप्ताह स्पष्ट रूप से कहा था कि शक्सगाम घाटी भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहां किसी भी तरह की गतिविधि उसकी क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है। विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखता है। इसके बावजूद चीन अपने रुख पर अड़ा हुआ नजर आ रहा है।

शक्सगाम घाटी का मामला भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से संवेदनशील रहा है। यह इलाका जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से में आता है, जिस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा बताया जाता है। वर्ष 1963 में पाकिस्तान ने कथित रूप से एक सीमा समझौते के तहत इस क्षेत्र का लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर हिस्सा चीन को सौंप दिया था। भारत ने तब भी इस समझौते को गैरकानूनी बताया था और आज तक इसे मान्यता नहीं दी है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हालिया प्रतिक्रिया में दो टूक कहा कि शक्सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र है और 1963 का तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता पूरी तरह अवैध और अमान्य है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत इस समझौते को कभी स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि पाकिस्तान को इस क्षेत्र को किसी तीसरे देश को सौंपने का कोई अधिकार नहीं था।

भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को लेकर भी कड़ा रुख दोहराया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि CPEC ऐसे भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिस पर पाकिस्तान ने जबरन कब्जा कर रखा है, इसलिए भारत इस परियोजना को भी मान्यता नहीं देता। भारत का मानना है कि इस तरह की परियोजनाएं न केवल उसकी संप्रभुता का उल्लंघन हैं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी खतरा पैदा करती हैं।

भारत की इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने बीजिंग में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि जिस क्षेत्र की बात की जा रही है, वह चीन का हिस्सा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि चीन अपने ही क्षेत्र में बुनियादी ढांचा विकास कर रहा है, जो पूरी तरह उचित और वैध है। माओ निंग ने यह भी दावा किया कि चीन और पाकिस्तान के बीच 1960 के दशक में हुआ सीमा समझौता दोनों संप्रभु देशों के बीच था और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैध माना जाना चाहिए।

CPEC को लेकर भारत की आलोचना को खारिज करते हुए चीन ने कहा कि यह एक आर्थिक पहल है, जिसका उद्देश्य स्थानीय आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना तथा लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना है। चीन का कहना है कि इस परियोजना का किसी भी तरह से किसी तीसरे देश की संप्रभुता से कोई संबंध नहीं है।

कश्मीर मुद्दे पर भी चीन ने अपने पारंपरिक रुख को दोहराया। बीजिंग का कहना है कि जम्मू-कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र चार्टर, सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और द्विपक्षीय समझौतों के तहत शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाना चाहिए। इसके जवाब में भारत ने फिर स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं और इस पर कोई भी बाहरी टिप्पणी या हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि शक्सगाम घाटी को लेकर चीन और भारत के बीच यह टकराव आने वाले समय में कूटनीतिक तनाव को और बढ़ा सकता है। भारत के लिए यह मुद्दा न केवल क्षेत्रीय अखंडता का है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। वहीं चीन अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के चलते इस इलाके में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश में लगा हुआ है।