Iran Festival Chahar Shanbe Suri: ईरान इन दिनों राजनीतिक हिंसा, जनआंदोलनों और सामाजिक अस्थिरता के कठिन दौर से गुजर रहा है। सड़कों पर विरोध, शासन के खिलाफ आक्रोश और दमन की खबरों के बीच एक ऐसा सांस्कृतिक पहलू भी चर्चा में है, जो ईरान को भारत से गहराई से जोड़ता है। यह कनेक्शन किसी राजनीति या कूटनीति से नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता, परंपरा और अग्नि-पूजा की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है। भारत में मनाई जाने वाली लोहड़ी और ईरान का पारंपरिक त्योहार चहार-शंबे सूरी इस साझा विरासत के जीवंत उदाहरण हैं।
आज भले ही ईरान एक इस्लामी गणराज्य के रूप में जाना जाता हो, लेकिन उसका इतिहास इस्लाम से कहीं अधिक पुराना है। फारसी सभ्यता में सूर्य, चंद्रमा, जल, वन और विशेष रूप से अग्नि को पवित्र माना जाता रहा है। यही कारण है कि आधुनिक धार्मिक पहचान के बावजूद ईरान की सांस्कृतिक जड़ों में प्रकृति-पूजा और प्रतीकात्मक उत्सव आज भी जीवित हैं। चहार-शंबे सूरी इसी परंपरा की एक झलक है, जो नए साल से पहले मनाया जाने वाला अग्नि उत्सव है।
उत्तर भारत, खासकर पंजाब और हरियाणा में हर साल 13 जनवरी को लोहड़ी का पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामूहिकता, नई फसल और जीवन में नई शुरुआत का प्रतीक है। लोहड़ी की रात लोग खुले मैदान या घरों के आंगन में आग जलाते हैं, उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं और तिल, मूंगफली, रेवड़ी तथा गजक अग्नि को अर्पित करते हैं। भांगड़ा और गिद्दा के साथ यह उत्सव सामाजिक एकता और उल्लास का संदेश देता है।
इसी तरह ईरान में चहार-शंबे सूरी के दिन लोग परिवार और समुदाय के साथ इकट्ठा होते हैं। आग जलाई जाती है और लोग उसके ऊपर से कूदते हैं। यह केवल रस्म नहीं, बल्कि प्रतीक है—मान्यता है कि आग पुराने वर्ष की नकारात्मकता, रोग और दुखों को अपने साथ जला ले जाती है और आने वाला नया साल ऊर्जा, स्वास्थ्य और आशा से भर देता है। इस दौरान ईरानी लोग आग से एक विशेष प्रार्थना करते हैं, जिसमें वे अपनी कमजोरी और पीड़ा अग्नि को सौंपकर उससे शक्ति और लालिमा लेने की कामना करते हैं।
भारत और ईरान की इस साझा सोच का मूल केंद्र अग्नि है। भारतीय वैदिक परंपरा में अग्नि पंचतत्वों में सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है। ऋग्वेद में अग्नि को प्रथम देव कहा गया है, जो देवताओं और मनुष्यों के बीच सेतु का काम करती है। यज्ञ, विवाह और हर शुभ संस्कार में अग्नि की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। यही भावना ईरान की प्राचीन परंपराओं में भी दिखाई देती है, जहां अग्नि को शुद्धि, जीवन और चेतना का प्रतीक माना गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समानता इस बात का प्रमाण है कि त्योहार केवल धर्म से नहीं, बल्कि सभ्यता और सामूहिक स्मृति से जन्म लेते हैं। समय के साथ शासन बदल सकते हैं, धार्मिक पहचान बदल सकती है, लेकिन सांस्कृतिक परंपराएं लोगों की चेतना में जीवित रहती हैं। यही कारण है कि ईरान में कई बार सरकारी सख्ती और सुरक्षा चिंताओं के बावजूद चहार-शंबे सूरी को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका।
आज जब ईरान हिंसा और दमन की आग में झुलसता दिख रहा है, तब लोहड़ी और चहार-शंबे सूरी जैसे त्योहार एक गहरा संदेश देते हैं। आग केवल विनाश का प्रतीक नहीं होती, बल्कि वह शुद्धि, ऊर्जा और नई शुरुआत का भी संकेत है। भारत और ईरान की यह साझा सांस्कृतिक विरासत बताती है कि सभ्यताओं के रिश्ते सीमाओं से कहीं आगे होते हैं और उम्मीद की लौ सबसे कठिन समय में भी जलती रहती है।

