Iran Protest: ईरान में जारी सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के बीच अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। हिंसक दमन, गिरफ्तारी और फांसी के आरोपों के बीच संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे पर सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने का फैसला किया है। इस कदम के साथ ही इज़राइल ने खुलकर ईरानी प्रदर्शनकारियों के समर्थन में आवाज़ बुलंद की है, जिससे वैश्विक कूटनीति में हलचल तेज हो गई है।
संयुक्त राष्ट्र में इज़राइल के राजदूत डैनी डैनन ने सुरक्षा परिषद की बैठक का स्वागत करते हुए अयातुल्ला शासन पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि जिस समय ईरानी सरकार अपने ही नागरिकों पर गोलियां चला रही है, विरोधियों को फांसी दी जा रही है और डर का माहौल बनाया जा रहा है, उस समय अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया बेहद धीमी और निराशाजनक है। डैनन ने ईरानी जनता को सीधे संबोधित करते हुए कहा, “आप अकेले नहीं हैं। आज़ादी और सम्मान के लिए आपकी लड़ाई किसी भी दमनकारी शासन से कहीं अधिक मजबूत है।”
UN में गूंजा ईरान का मुद्दा
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपात बहस बुलाने का फैसला ऐसे समय में हुआ है जब मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टें लगातार सामने आ रही हैं। इन रिपोर्टों के अनुसार, दिसंबर 2025 के अंत से ईरान के कई शहरों में व्यापक विरोध प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारी महंगाई, बेरोज़गारी, राजनीतिक दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं। जवाब में सुरक्षा बलों पर अत्यधिक बल प्रयोग, अंधाधुंध गिरफ्तारियों और हिरासत में मौतों के आरोप लगाए जा रहे हैं।
डैनी डैनन ने कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब भी चुप रहता है, तो यह चुप्पी भी दमन का एक रूप बन जाएगी। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी केवल बयान जारी करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
यूरोप में प्रतिक्रिया और तेज
इज़राइल के बयान के बाद यूरोप में भी प्रतिक्रियाएं तेज़ हो गई हैं। यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कलास ने ईरानी जनता के साहस की सराहना करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने संकेत दिए कि यूरोपीय संघ ईरान पर अतिरिक्त प्रतिबंधों को लेकर गंभीर चर्चा कर रहा है, खासकर उन अधिकारियों और संस्थानों पर जो दमन की कार्रवाई में सीधे तौर पर शामिल हैं।
फिनलैंड ने भी सख्त रुख अपनाते हुए ईरान के चार्ज द’अफेयर्स को तलब किया। फिनलैंड सरकार ने हिंसा तत्काल रोकने, हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को रिहा करने और इंटरनेट व सूचना तक निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करने की मांग की। यूरोपीय देशों का कहना है कि इंटरनेट बंद करना और सूचना प्रवाह रोकना मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
डेनमार्क और मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन ने भी ईरान की कार्रवाई को “brutal और अस्वीकार्य” बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हालात में सुधार नहीं हुआ तो और कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि ईरान सरकार पहली बार किसी प्रदर्शनकारी को फांसी देने की तैयारी कर रही है, जिससे हालात और गंभीर हो सकते हैं।
इन संगठनों के अनुसार, अब तक हजारों प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और कई को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के जेल में रखा गया है। यह स्थिति केवल ईरान के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी बनती जा रही है कि अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो मानवाधिकार संकट और गहरा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव की बढ़ती कसौटी
कुल मिलाकर, ईरान में चल रहा संकट अब केवल आंतरिक मामला नहीं रह गया है। इज़राइल का खुला समर्थन, यूरोप की सख्त प्रतिक्रियाएं और संयुक्त राष्ट्र की आपात बैठक इस बात के संकेत हैं कि आने वाले दिनों में ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और बढ़ सकता है। सवाल यह है कि क्या यह दबाव ज़मीनी हकीकत में कोई बदलाव ला पाएगा, या फिर ईरानी जनता की संघर्षपूर्ण लड़ाई को अभी और लंबा इंतज़ार करना होगा।

