Iran US Peace Talks: मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच Iran ने एक बार फिर शांति वार्ता को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री Saeed Khatibzadeh ने कहा कि उनका देश बातचीत के लिए तैयार है और अपने वादों का सम्मान करता है, लेकिन मौजूदा हालात अब भी बेहद नाजुक हैं। उन्होंने संकेत दिया कि कूटनीतिक समाधान संभव है, बशर्ते सभी पक्ष समझौते की शर्तों का ईमानदारी से पालन करें।
खातिबजादेह के अनुसार, हाल ही में हुए हमलों के बाद क्षेत्रीय स्थिति “बेहद गंभीर” हो गई थी, जिसके चलते ईरान को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। उन्होंने बताया कि इसके बाद Pakistan के माध्यम से कूटनीतिक संवाद की शुरुआत हुई, जिसने तनाव को कुछ हद तक कम करने में मदद की। यह पहल इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय शक्तियां अब टकराव की बजाय बातचीत का रास्ता तलाश रही हैं।
हालांकि, ईरान ने इस प्रक्रिया में United States की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। खातिबजादेह ने कहा कि वॉशिंगटन को अपने सहयोगी Israel को नियंत्रित करना चाहिए, ताकि सीजफायर का सही तरीके से पालन हो सके। उनका मानना है कि यदि इज़राइल अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखता है, तो शांति वार्ता का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाएगा।
ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह वार्ता के लिए इस्लामाबाद जाने को तैयार है और वहां स्थायी समाधान निकालने की कोशिश करेगा। लेकिन इसके साथ ही उसने चेतावनी दी है कि अगर Lebanon को इस समझौते में शामिल नहीं किया गया, तो स्थायी शांति की संभावना बेहद कम हो जाएगी। इस मुद्दे पर पहले से ही मतभेद गहराते जा रहे हैं, क्योंकि इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने साफ कहा है कि लेबनान इस सीजफायर का हिस्सा नहीं है और वहां सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी।
ईरान के एक अन्य वरिष्ठ नेता Mohammad Bagher Ghalibaf ने भी अमेरिका और इज़राइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि दोनों देशों ने समझौते की तीन महत्वपूर्ण शर्तों का उल्लंघन किया है। इन उल्लंघनों में लेबनान में जारी हमले, ईरानी हवाई क्षेत्र में घुसपैठ और यूरेनियम संवर्धन के अधिकार से इनकार शामिल हैं।
गालिबाफ के अनुसार, इन मुद्दों का समाधान किए बिना किसी भी तरह की सार्थक बातचीत संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि ईरान अपने अधिकारों से समझौता नहीं करेगा और अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने का अधिकार रखता है। यह बयान दर्शाता है कि वार्ता की मेज पर पहुंचने से पहले ही कई जटिल मुद्दे मौजूद हैं।
इसके बावजूद, दोनों पक्ष इस्लामाबाद में संभावित वार्ता के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं। खबरों के अनुसार, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व JD Vance कर सकते हैं। यदि यह वार्ता सफल होती है, तो यह क्षेत्रीय तनाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति “संभावनाओं और जोखिमों” के बीच झूल रही है। एक ओर जहां कूटनीतिक बातचीत की उम्मीदें बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर जारी सैन्य गतिविधियां इस प्रक्रिया को कमजोर कर सकती हैं। यदि सभी पक्ष संयम बरतते हैं और समझौते की शर्तों का पालन करते हैं, तो शांति की दिशा में प्रगति संभव है।
फिलहाल, ईरान का संदेश स्पष्ट है—वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन बिना ठोस गारंटी और सभी पक्षों की भागीदारी के कोई स्थायी समाधान संभव नहीं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह कूटनीतिक पहल वास्तविक शांति में बदलती है या फिर तनाव एक बार फिर बढ़ता है।

