Iran internet blackout: ईरान इस समय दोहरे संकट से गुजर रहा है। एक ओर देश पिछले करीब 45 दिनों से लगभग पूरी तरह इंटरनेट ब्लैकआउट की स्थिति में है, वहीं दूसरी ओर समुद्री क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इस स्थिति ने न केवल ईरान के भीतर जनजीवन को प्रभावित किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है।
साइबर निगरानी संस्था NetBlocks के अनुसार, ईरान में “near blackout” की स्थिति बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्टिविटी 1,000 घंटे से अधिक समय से बाधित है। यह संकट तब शुरू हुआ जब संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की थी। इसके बाद ईरानी सरकार ने बाहरी डिजिटल संपर्कों पर कड़ी पाबंदियां लगा दीं।
इंटरनेट बंदी के कारण आम नागरिकों का वैश्विक संपर्क लगभग खत्म हो गया है। इससे पहले भी जनवरी में विरोध प्रदर्शनों के दौरान सरकार ने कई हफ्तों तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखी थीं। मौजूदा हालात ने देश के भीतर सूचना के प्रवाह को सीमित कर दिया है, जिससे लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
इसी बीच, समुद्री क्षेत्र में भी तनाव चरम पर पहुंचता दिख रहा है। ईरान ने United States Central Command की उस योजना का कड़ा विरोध किया है, जिसमें ईरानी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों पर नाकेबंदी की बात कही गई है। ईरानी सेना ने साफ चेतावनी दी है कि Persian Gulf और Gulf of Oman में सुरक्षा “सभी के लिए समान” होनी चाहिए।
ईरान ने यह भी कहा है कि यदि उसके बंदरगाहों की सुरक्षा खतरे में पड़ी, तो क्षेत्र के अन्य बंदरगाह भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। उसने Strait of Hormuz पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की बात दोहराई है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। ईरान ने चेतावनी दी है कि दुश्मन देशों से जुड़े जहाजों को इस मार्ग से गुजरने नहीं दिया जाएगा, जबकि अन्य जहाजों को निर्धारित नियमों के तहत अनुमति दी जाएगी।
ईरान ने अमेरिका की इस कार्रवाई को “गैरकानूनी” करार देते हुए इसे समुद्री डकैती जैसा बताया है। दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह कदम सुरक्षा और रणनीतिक कारणों से उठाया जा रहा है। हालांकि, अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि अन्य देशों के जहाजों की आवाजाही को बाधित नहीं किया जाएगा।
मौजूदा हालात ने ईरान को एक जटिल स्थिति में डाल दिया है, जहां एक तरफ डिजिटल अलगाव है और दूसरी तरफ सैन्य व समुद्री तनाव बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर न केवल क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

