Tarique Rahman के नेतृत्व में बांग्लादेश इस समय एक जटिल भू-राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर United States की सख्त व्यापारिक शर्तें हैं, तो दूसरी ओर China की खुली आर्थिक और औद्योगिक पेशकश। नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखे।
एशियाई आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, वॉशिंगटन की ओर से प्रस्तावित नई व्यापार संधि ने ढाका की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अमेरिका बाजार तक बेहतर पहुंच देने के बदले नियामकीय नियंत्रण, सुरक्षा सहयोग और निर्यात नियमों के पालन जैसी कड़ी शर्तें रख रहा है। हालांकि पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump की पारस्परिक टैरिफ नीति को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था, लेकिन नई शर्तों से यह साफ है कि अमेरिका बांग्लादेश को अपने रणनीतिक दायरे में बनाए रखना चाहता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले जहां टैरिफ 19% तक घटाए गए हैं, वहीं यह चेतावनी भी दी गई है कि शर्तों का पालन न होने पर इन्हें फिर से 37% तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, बांग्लादेश को अमेरिकी निर्यात नियंत्रण और संभावित प्रतिबंधों में सहयोग करना होगा। यदि भविष्य में अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर नए व्यापार नियम लागू करता है, तो ढाका को उनके अनुरूप अपनी नीतियां ढालनी पड़ सकती हैं।
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था खासतौर पर रेडीमेड गारमेंट (RMG) सेक्टर में अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर है। देश के कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा अमेरिका को जाता है। ऐसे में किसी भी तरह का व्यापारिक तनाव सीधे आर्थिक विकास और रोजगार पर असर डाल सकता है।
दूसरी ओर, चीन बांग्लादेश के लिए केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि औद्योगिक ढांचे का अहम हिस्सा बन चुका है। बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, औद्योगिक एकीकरण और रक्षा आपूर्ति के क्षेत्र में बीजिंग ने व्यापक निवेश की पेशकश की है। चीन का एफडीआई स्टॉक लगभग 3 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। इसके अलावा, चीन ने बांग्लादेश सहित कई अल्पविकसित देशों को शून्य-टैरिफ निर्यात पहुंच भी दी है, जिससे ढाका को बड़ा लाभ मिला है।
गारमेंट और विनिर्माण क्षेत्र में चीन से आयातित कच्चा माल और मशीनरी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यदि चीन से आर्थिक दूरी बनाई जाती है, तो बांग्लादेश की औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा असर पड़ सकता है।
ढाका स्थित Bangladesh Enterprise Institute के वरिष्ठ शोध निदेशक फैज़ सोभान के अनुसार, मौजूदा ध्रुवीकृत वैश्विक माहौल में महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाना और भी कठिन होता जा रहा है। उनका मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता में किसी एक पक्ष की ओर स्पष्ट झुकाव बांग्लादेश के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।
अगर बांग्लादेश अमेरिका से टकराव मोल लेता है, तो निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है। वहीं, चीन से दूरी बनाने का मतलब औद्योगिक ढांचे और निवेश प्रवाह को कमजोर करना होगा। ऐसे में तारिक रहमान के लिए यह केवल व्यापार नीति का सवाल नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक संतुलन की परीक्षा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश ‘संतुलित कूटनीति’ की राह अपना सकता है—जहां वह अमेरिका के साथ व्यापार और सुरक्षा सहयोग बनाए रखे, जबकि चीन के साथ औद्योगिक और बुनियादी ढांचा साझेदारी को जारी रखे। लेकिन वैश्विक राजनीति में बढ़ती ध्रुवीकरण की स्थिति में यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह आने वाला समय ही बताएगा।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि रहमान सरकार के हर फैसले पर अंतरराष्ट्रीय नजरें टिकी रहेंगी। अमेरिका का दबाव और चीन का निवेश—दोनों ही बांग्लादेश के भविष्य को आकार देने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यह संतुलन साधना ही नई सरकार की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती है।

