नई दिल्ली: कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने 1980 की मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने से जुड़े विवाद पर दायर याचिका का कड़ा विरोध किया है। शनिवार को दिल्ली की एक अदालत में उनके वकीलों ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह शिकायत न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक मकसद से प्रेरित है। उनका तर्क था कि सोनिया गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोप कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हैं।
यह मामला विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने के समक्ष पेश हुआ, जो 11 सितंबर 2025 के उस मजिस्ट्रेट आदेश को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। उस आदेश में मजिस्ट्रेट अदालत ने इस आरोप की जांच से इनकार कर दिया था कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में मतदाता सूची में जोड़ा गया, जबकि उन्होंने 1983 में भारतीय नागरिकता प्राप्त की थी।
सोनिया गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता तरन्नुम चीमा, कनिष्का सिंह और आकाश सिंह ने अदालत में जवाब दाखिल किया। जवाब में कहा गया कि शिकायत “पूरी तरह से गलत, बेबुनियाद, राजनीति से प्रेरित और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” है। वकीलों ने यह भी दलील दी कि इस तरह के आरोप लगभग 25 साल पुराने विवाद को दोबारा जीवित करने की कोशिश हैं, जिनका कोई ठोस आधार नहीं है।
अदालत में यह भी कहा गया कि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने अपने आदेश में बिल्कुल सही निष्कर्ष निकाला था। नागरिकता से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह केंद्र सरकार के पास है, जबकि मतदाता सूची से संबंधित विवादों का निपटारा निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे मामलों में आपराधिक अदालतों का हस्तक्षेप न केवल शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 329 का भी उल्लंघन करता है, जो चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक दखल पर रोक लगाता है।
सोनिया गांधी के वकीलों ने यह भी रेखांकित किया कि शिकायत में कोई बुनियादी या प्राथमिक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए हैं, जिनके आधार पर जांच का आदेश दिया जा सके। जवाब में कहा गया कि यह मान लेना गलत होगा कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल होना केवल फॉर्म 6 जमा करने के आधार पर ही हुआ होगा। इसके अलावा, 40 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद किसी भी व्यक्ति से विश्वसनीय सबूत प्रस्तुत करने की अपेक्षा करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
जवाब में यह भी तर्क दिया गया कि इतने पुराने आरोपों पर आपराधिक मुकदमा चलाना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी देता है। वकीलों के अनुसार, दुर्भावनापूर्ण और राजनीतिक रूप से प्रेरित शिकायतों के जरिए किसी व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया में उलझाना मौलिक अधिकारों के विपरीत है।
इससे पहले, राउज एवेन्यू अदालत की मजिस्ट्रेट अदालत ने ‘सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन’ के उपाध्यक्ष वकील विकास त्रिपाठी द्वारा दायर शिकायत को खारिज कर दिया था। त्रिपाठी की ओर से वकील पवन नारंग ने आरोप लगाया था कि जनवरी 1980 में सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में जोड़ा गया था, जबकि उस समय वह भारतीय नागरिक नहीं थीं। उन्होंने इसे “जालसाजी” और सार्वजनिक प्राधिकरण के साथ “धोखाधड़ी” करार दिया था।
हालांकि, मजिस्ट्रेट अदालत ने स्पष्ट किया था कि शिकायत कानूनी रूप से गलत आरोपों पर आधारित है और अदालत को ऐसा अधिकार क्षेत्र देने की कोशिश की गई है, जो वास्तव में उसके दायरे में नहीं आता। इसी आदेश को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिका पर अब अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 21 फरवरी की तारीख तय की है।

