वायनाड भूस्खलन पीड़ितों के दर्द और हौसले की कहानी बयां करता है रेस्तरां ‘जुलाई 30’

Restaurant 'July 30' tells the story of the pain and courage of Wayanad landslide victims
Restaurant 'July 30' tells the story of the pain and courage of Wayanad landslide victims

वायनाड (केरल), हरी-भरी और धुंध से घिरी वायनाड की पहाड़ियों के बीच मेप्पाड़ी-चूरालमाला सड़क के किनारे कई कैफे और भोजनालय स्थित हैं, लेकिन इनमें रेस्तरा ”जुलाई 30” बरबस ही ध्यान खींचता है। पहली नज़र में, यह बेकरी-रेस्तरां भूखे यात्रियों के लिए किसी भी आम पड़ाव जैसा ही लगता है। फिर भी, काले रंग की पृष्ठभूमि पर उकेरे गए इसके गहरे नारंगी रंग के अक्षर (30 जुलाई) सिर्फ़ एक संकेत से कहीं ज़्यादा हैं।

वायनाड के लिए ’30 जुलाई’ 2024 विनाशकारी भूस्खलन का दिन है। इसी दिन इस रेस्तरां के मालिक, नौफ़ल के. की पत्नी और तीन बच्चों सहित परिवार के 11 सदस्यों की जान चली गई थी। नौफल ने उसी दिन की याद में इस रेस्तरां को ‘जुलाई 30’ का नाम दिया। यह अब सिर्फ एक भोजनालय नहीं है बल्कि एक गहरी भावनात्मक कहानी का प्रतीक बन चुका है। वायनाड में हुए भूस्खलन में मुंडक्कई और चूरलमाला क्षेत्र बुरी तरह से प्रभावित हुए और इसमें ये इलाके लगभग पूरी तरह तबाह हो गए थे। इस विनाशकारी हादसे में 298 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें से 32 लोग लापता बताए गए थे।

मुंडक्कई गांव जोकि नौफल का जन्मस्थान है, 30 जुलाई 2024 को अपराह्न 1.15 बजे आई आपदा में पूरी तरह तबाह हो गया। आपदा से पहले उस दिन रिकार्ड 372.6 मिमी बारिश हुई थी। त्रासदी के समय नौफल ओमान में कार्यरत थे। वह 2016 में वहां नौकरी की तलाश में गए थे। वह वहां लगातार मेहनत कर रहे थे और धीरे-धीरे पैसे जमा कर रहे थे। उनका सपना था कि वह एक दिन वतन लौटें और अपनी पत्नी का एक ऐसा रेस्तरां खोलने का सपना पूरा करें, जिसे पूरा परिवार मिलकर चला सके।

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नौफल (43) ने बताया कि उन्हें 30 जुलाई को एक फ़ोन आया जिसमें इस त्रासदी की सूचना दी गई। वह अगले दिन वायनाड आ गए और फिर उसके बाद कभी ओमान नहीं गए। उन्होंने कहा, ‘‘”मैंने अपने माता-पिता, पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे सहित परिवार के 11 सदस्यों को खो दिया। मैं सिर्फ अपनी सबसे बड़ी बेटी नफला (16) के शव की ही पहचान कर सका। बाकी की पहचान डीएनए नमूनों से हुई… वह (नफला) मेरी आशा की किरण थी।”

नौफल के लिए ‘जुलाई 30’ सिर्फ एक व्यवसाय नहीं बल्कि एक जीवंत स्मारक है। उन्होंने यह नाम जानबूझकर चुना, भले ही यह उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी से जुड़ा हो। नौफल कहते हैं, ‘‘मैं अपने परिवार और उन सभी लोगों की यादों को ज़िंदा रखना चाहता हूं, जो इस हादसे में मारे गए हैं।” उन्होंने कहा, ‘‘लोग इस आपदा को पांच-दस साल बाद भूल जाएंगे। लेकिन जब वे यह नाम देखेंगे तो उन्हें याद रहेगा। मेरे लिए यह दिवंगत आत्माओं के लिए भी एक प्रार्थना है।’’ नौफल ने बताया कि उन्होंने अपनी बचत और केरल नदवथुल मुजाहिदीन से मिले सात लाख रुपये का इस्तेमाल कर करीब नौ महीने पहले यह रेस्तरां खोला था। नौफल ने बताया कि तेजी से यह रेस्तरां लोकप्रिय हो गया है। विशेष रूप से इसकी बीफ करी, पोरोटा (पराठा) और बिरयानी लोगों को बहुत पसंद आ रही है। इस रेस्तरां में सात कर्मचारी कार्यरत हैं और ये सभी भूस्खलन से प्रभावित हुए परिवारों से हैं।

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