Partition of India: कैसे ब्रिटेन ने जल्दबाज़ी में छोड़ा भारत और बढ़ा विभाजन का संकट

Partition of India
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Partition of India: Indian Independence की कहानी अक्सर त्याग, संघर्ष और नैतिक जीत के रूप में सुनाई जाती है। हमें बताया जाता है कि वर्षों तक चले स्वतंत्रता आंदोलन और जनता के दबाव के आगे ब्रिटिश साम्राज्य को आखिरकार झुकना पड़ा। लेकिन अगर 1947 को केवल भावनात्मक नजरिए से नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है।

15 अगस्त 1947 सिर्फ भारत की आज़ादी का दिन नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक तेजी से तैयार किया गया “एग्ज़िट प्लान” भी था। उस समय ब्रिटेन आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था और भारत पर शासन जारी रखना उसके लिए घाटे का सौदा बन गया था।

जब Lord Mountbatten मार्च 1947 में भारत पहुंचे, तब उन्हें जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण पूरा करने का समय दिया गया था। यानी लगभग 18 महीने की अवधि। लेकिन कुछ ही समय में यह पूरी योजना बदल गई और अचानक 15 अगस्त 1947 को आज़ादी की तारीख घोषित कर दी गई।

इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इतनी जल्दबाज़ी के पीछे सबसे बड़ा कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति थी। World War II के बाद ब्रिटेन का खजाना लगभग खाली हो चुका था। युद्ध जीतने के बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह दबाव में थी।

भारत ने भी युद्ध के दौरान ब्रिटेन की मदद की थी, जिसके कारण ब्रिटेन पर भारत का भारी आर्थिक कर्ज़ चढ़ गया था। ऐसे में ब्रिटेन के लिए भारत पर नियंत्रण बनाए रखना आर्थिक रूप से मुश्किल होता जा रहा था। कभी “ज्वेल इन द क्राउन” कहलाने वाला भारत अब ब्रिटिश साम्राज्य के लिए लाभ की जगह बोझ बन चुका था।

विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन ने राजनीतिक फैसले से ज्यादा आर्थिक गणना के आधार पर भारत छोड़ने का निर्णय लिया। जैसे कोई कंपनी घाटे में चल रही यूनिट को बंद कर देती है, उसी तरह ब्रिटिश शासन ने भी भारत से जल्दी निकलने का फैसला किया।

सबसे बड़ा विवाद विभाजन की प्रक्रिया को लेकर रहा। Cyril Radcliffe, जिन्होंने पहले कभी भारत नहीं देखा था, उन्हें सिर्फ पांच हफ्तों में भारत और पाकिस्तान की सीमाएं तय करने की जिम्मेदारी दी गई। इतनी बड़ी ऐतिहासिक प्रक्रिया के लिए यह समय बेहद कम माना जाता है।

विश्लेषकों का कहना है कि अगर ब्रिटिश शासन जून 1948 तक भारत में रहता, तो विभाजन के दौरान हुई हिंसा, पलायन और प्रशासनिक विफलताओं की जिम्मेदारी सीधे ब्रिटेन पर आती। लेकिन अगस्त 1947 में जल्दबाजी में सत्ता हस्तांतरण करके ब्रिटेन ने इस मानवीय संकट का बोझ भारत और पाकिस्तान पर छोड़ दिया।

Partition of India इतिहास के सबसे बड़े और सबसे दर्दनाक जनपलायनों में से एक माना जाता है। लाखों लोग विस्थापित हुए और बड़ी संख्या में लोगों ने हिंसा में अपनी जान गंवाई।

इस पूरी कहानी में अमेरिका की भूमिका भी अहम मानी जाती है। युद्ध के बाद ब्रिटेन अमेरिकी आर्थिक मदद और कर्ज़ पर निर्भर था। अमेरिका नहीं चाहता था कि उसके पैसों का इस्तेमाल पुराने औपनिवेशिक शासन को बनाए रखने में हो। इसलिए उसने ब्रिटेन पर तेजी से उपनिवेशवाद खत्म करने का दबाव बनाया।

15 अगस्त की तारीख भी किसी भारतीय परंपरा या विशेष भावना के कारण नहीं चुनी गई थी। यह वही दिन था जब जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण किया था। माउंटबेटन के लिए यह एक व्यक्तिगत गौरव का दिन था, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के करोड़ों लोगों के लिए यह अनिश्चितता और विभाजन की शुरुआत साबित हुआ।

इतिहासकारों का मानना है कि 1947 को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक नजरिए से भी समझना जरूरी है। इससे भारत के स्वतंत्रता संग्राम का महत्व कम नहीं होता, बल्कि यह दिखाता है कि भारतीयों ने कितनी कठोर और स्वार्थी औपनिवेशिक व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया।

भारत की आज़ादी किसी साम्राज्य की दया का परिणाम नहीं थी। यह वह समय था जब ब्रिटिश शासन भारत पर राज करने की आर्थिक कीमत और नहीं चुका सकता था। और शायद यही 1947 का सबसे कड़वा सच है कि जाते-जाते भी साम्राज्य ने सबसे बड़ी कीमत भारत की जनता से ही वसूली।

लेखक: डॉ. स्वर्णजीत सिंह, निर्माता, 1947: Brexit India डॉक्यूमेंट्री