July, जूते और जंग !

July, जूते और जंग ! : जनता के दोस्तो और जंग के दुश्मनो! हो जाओ होशियार कि आ गई जुलाई है। बीते बरसों की तरह इस बार भी लेना पड़ेगा औकात से ज़्यादा उधार कि लगातार महंगी होती पढ़ाई-खर्च की सुरसा ने और बड़ा मुँह खोला है,

और जीभ फैलाई है। पर, इस संकट की घड़ी की हमारे सूबेदार चोला बाबा ने बड़ी अच्छी काट निकाली है। ‘न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी’ वाले मुहावरे को अमल में लाते हुए एक आसुरी नीति अपना ली है। (कृपया आप सभी इसे जो मैंने लिखा वह न पढ़ें, फ़िर बेसुरी या सुरसुरी जो भी पढ़ें चलेगा, क्योंकि आप में से किसी ने इसका सही अर्थ उन्हें बता दिया, तो बाबा का प्रिय वाहन मुँह फाड़े मेरे घर को खाने दौड़ पड़ेगा।) ‘फैसला ऑन द स्पॉट’ –नो अदालत की कुर्सी, नो पंचायत की खाट — का जलवा दिखाते हुए, कहते हैं, उन्होंने ‘टू सेवन’ लाख विद्यालय बंद कर दिया है। और एक मोक्षदायी निर्णय लेते हुए हजारों मदिरालय खोलने की गति तीव्रतम और विद्यालय की अति मंद कर दिया है।

और मज़े की बात यह कि उन्हें बड़े राजा की ओर से कुछ भी करने / बोलने की छूट विशेष है। उन्हें इन देसी कामों में कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि अभी-अभी आए बड़े राजा को एक अति स्मॉल देश से अपना 1001वाँ ‘बिग तमगा ‘ लेने तुरंत जाना विदेश है। चोला बाबा को कुछ भी बोलने की पूरी आज़ादी है। शायद इसीलिए वे ‘काटने-बाँटने’ के अलावा ज़्यादा बात नहीं करते, कहते हैं– उसमें नियम- कानूनों को परेशानी और शब्दों की बरबादी है। और तो और, वे नई-नई स्थापनाओं के आदी हैं। अब चार जुलाई यानी स्वामी विवेकानंद की निर्वाण तिथि सामने आई, तो मा-बदौलत के बूढ़ मगज में उनकी वाणी कुलबुलाई :- “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा ” को स्वामी जी का उद्घोष बता कर चोला बाबा दहाड़े। एक ही बड़बोल में विवेकानंद और नेताजी सुभाषचंद्र बोस दोनों विभूतियां महान, लग गईं किनारे। ना ना! ये नहीं है टंगस्लिप, भूल-गलती या हास-परिहास! ये है बड़े राजा के ‘ राज मार्ग ‘ पर चलने का अभ्यास। इसी राह से तो बदलेगा संविधान और इतिहास! आख़िर तो देना है नई पीढ़ी को नया ज्ञान, कि  ” 47′ की आज़ादी ” थी नक़ली। कुछ वैसे ही, जैसे गायब किए जा रहे गाँधी, उनके विचार अर्थात खादी, चरखा, तकली।

और हां, 26’ की जुलाई में ही लिखित मीडिया में — बड़ा आघात करने वाली एक खबर, बहुत छोटी-सी जगह में आई है। यह आगरा के जूतों के लिए अतिशय दुखदाई है। वे बहुत निराश हैं, हताश हैं, कि सागर के सीने पर चढ़ कर उसके पार जाते थे, तो अच्छा मान-सम्मान / दाम पाते थे। अचानक चपटी नाकवाले न्यू वर्ल्ड मंकी (अमेरिकन बंदर) के ‘ जंप ‘ से जलमार्ग होर्मुज स्ट्रेट पर आफ़त आन पड़ी है। खास बाहर वालों के लिए बनते आगरा के जूतों और उन्हें गाँठने, संवारने, निखारने वाले सपूतों के हाथ लुंज और पेट सुन्न हो गए हैं। क्योंकि वे बेचारे आगरा के जूतासाज हैं, फोर्ट या ‘ ताज ‘ नहीं हैं।…जूतमपैजार की ओर बढ़ रही अजुधिया से, अपने आँसुओं और ऊपरवाले की किरपा से गोदाम में डूबते-उतराते इन जूतों को कुछ आस बँधी थी कि पाँव में न सही, नए महलवाले, चौंसठ कलाओं में एक खास कला में निपुण ‘तीन गुरु आठ चेले’ वाली जंग कुछ आगे बढ़ेगी, तो इंशा अल्ला कुछ सरों के लिए हमारी जरूरत पड़ेगी! लेकिन वहां भी ‘मौसेरे भाई’ वाले मुहावरे को सार्थक करते बातमपैज़ार से काम चलाया जा रहा है, तो जूतों को एक बार फ़िर निराश होना पड़ा है।

जंग की ज़हालत जेहन में जैसे झूमी, तो शरारती शब्दों की नज़र मिडिल ईस्ट की ओर घूमी, जहां हर पानी अपने पंप में खींचने को आतुर अमरीका होर्मूज में जंप मार के ईरानियों के जूते तक उतरवाने पर तुला है। लेकिन ईरान जूते तो दूर, सिर से पगड़ी और कंधे से हथियार तक उतारने को तैयार नहीं है।…और यह देख जूते फ़िर निराश हो गए हैं।

जुलाई के तमाम जुल्ल से चुल्ल करते हुए उसकी आख़िरी तारीख याद आई यानी प्रेमचंद जयंती यानी इकतीस जुलाई। पिछले महीने में 31 देखने की सारी मूर्खतापूर्ण कोशिशें नाकाम हो गईं थीं।…ख़ैर, जयंती के साथ उपन्यास सम्राट भी याद आए, जो थे अति साधारण जीवन जीने की ज़िद के मारे। उन्होंने सारी जिंदगी जिसे छिपाए, तंजदादा हरिशंकर परसाई ने पूरी पढ़ोका कायनात को वही ” प्रेमचंद के फटे जूते ” दिखाए। … यह सुनकर आगरा के जूते जबलपुर की जानिब धाए, कि मौका अच्छा है, कम से कम एक जोड़ी का सौदा पक्का है।

पर, पता चला कि मुंशी प्रेमचंद बिना उतारे उन्हीं जूतों में चले गए। और तो और उनके … फटे जूते का पता बताने वाले कोठरीजीवी परसाई महान भी नहीं रहे।…बाद मुद्दत के जूतों को समंदर पार जाने का सुअवसर मिला था, पर एक बेतुकी बेढंगी जंग ने उनका मानसम्मान, मालिकों से दाम छीन लिया है। तब से वे वापस नए रामराज में सच्चे किरदार के ‘ साफ़ – सुथरे ‘ पाँव ढूँढ़ने का असंभव-सा काम करते अपना सिरा पटक रहे हैं, जिसका न मिलना तय है।… जुलाई मुँह लटकाए जा रही है, जूते पाँव की तलाश में भटक रहे हैं, सीज फ़ायर तारी है और जंग जारी है…