LPG Crisis: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब भारत के आम लोगों की जिंदगी पर भी दिखाई देने लगा है। कई शहरों और कस्बों में LPG गैस की किल्लत और एजेंसियों पर लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। ऐसे समय में Saharanpur के एक किसान ने आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल पेश की है, जो न केवल प्रेरणादायक है बल्कि एक स्थायी समाधान भी दिखाती है।
गांव का समाधान, बड़ी समस्या का जवाब
सहारनपुर से करीब 12 किलोमीटर दूर भलस्वा गांव में रहने वाले Rakam Singh Saini पिछले लगभग 9 वर्षों से अपने घर में बायोगैस प्लांट का उपयोग कर रहे हैं। यह प्लांट MGNREGA योजना के तहत लगाया गया था, जिसने उनके परिवार की रसोई व्यवस्था पूरी तरह बदल दी।
इस प्लांट में गाय के गोबर और पानी का मिश्रण डाला जाता है, जिससे गैस तैयार होती है। यही गैस चूल्हे में इस्तेमाल की जाती है। रोजाना करीब 12 से 15 किलो गोबर से इतनी गैस बन जाती है कि 6 से 8 घंटे तक खाना पकाया जा सकता है, जिससे 8 से 10 लोगों का खाना आराम से बन जाता है।
एक साथ दो फायदे: गैस और खाद
बायोगैस प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ गैस ही नहीं देता, बल्कि जैविक खाद भी तैयार करता है। गैस बनने के बाद जो अवशेष बचता है, वह खेतों के लिए बेहतरीन खाद बन जाता है।
इससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है और खेती की लागत भी घटती है। Rakam Singh Saini बताते हैं कि इस प्लांट का रखरखाव भी बेहद आसान है और साल में केवल एक बार सफाई करनी पड़ती है।
रसोई में आया बड़ा बदलाव
गृहिणी Geeta Saini के लिए यह बदलाव काफी राहत भरा रहा है। पहले उन्हें लकड़ी और भूसे से खाना बनाना पड़ता था, जिससे धुआं और परेशानी होती थी।
अब बायोगैस से तेज आंच पर जल्दी खाना बन जाता है और रसोई भी साफ-सुथरी रहती है। उन्होंने बताया कि अब LPG सिलेंडर की खपत काफी कम हो गई है। एक सिलेंडर 4 से 5 महीने तक चल जाता है और साल में केवल 2-3 सिलेंडर की जरूरत पड़ती है।
आत्मनिर्भरता की ओर एक मजबूत कदम
आज जब दुनिया गैस संकट का सामना कर रही है, ऐसे में Rakam Singh Saini का यह मॉडल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत उदाहरण बनकर सामने आया है।
वे अन्य किसानों से भी अपील करते हैं कि वे अपने गांव में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके बायोगैस प्लांट लगाएं। इससे न केवल खर्च कम होगा, बल्कि पर्यावरण को भी फायदा मिलेगा।
सतत भविष्य की ओर पहल
Saharanpur का यह उदाहरण दिखाता है कि छोटी-छोटी पहल भी बड़े बदलाव ला सकती है। जहां एक ओर वैश्विक संकट ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर रहे हैं, वहीं स्थानीय समाधान हमें आत्मनिर्भर बना सकते हैं।
अगर ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह के मॉडल को अपनाया जाए, तो देश न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास की दिशा में भी बड़ा कदम उठाएगा।

