World Bank Report: कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान की आर्थिक यात्राएं बिल्कुल अलग दिशा में जाती दिख रही हैं। विश्व बैंक की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि जहां पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, महंगाई और गरीबी के दुष्चक्र में फंसा हुआ है, वहीं भारत तेज़ी से उभरती हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर चुका है। रिपोर्ट में भारत को वैश्विक विकास की “उजली किरण” करार दिया गया है, जबकि पाकिस्तान की स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में लगभग 6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी, लेकिन यह सुधार टिकाऊ साबित नहीं हुआ। 2023 आते-आते पाकिस्तान की आर्थिक रफ्तार लगभग थम गई और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने देश के लिए मात्र 0.5 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया। राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी मुद्रा संकट, बढ़ता कर्ज और कमजोर नीतिगत फैसले इस गिरावट के प्रमुख कारण बताए गए हैं।
इसके उलट भारत की अर्थव्यवस्था ने महामारी के बाद मजबूत वापसी की। 2023 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6 प्रतिशत से ऊपर रही, जिससे वह दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक मंदी और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत की घरेलू मांग, बुनियादी ढांचे में निवेश और सेवा क्षेत्र की मजबूती ने उसे स्थिरता प्रदान की।
पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियों को अब वहां के नीति-निर्माता भी खुले तौर पर स्वीकार कर रहे हैं। इस्लामाबाद में आयोजित एक बिजनेस कार्यक्रम के दौरान विशेष निवेश सुविधा परिषद (SIFC) के राष्ट्रीय समन्वयक लेफ्टिनेंट-जनरल सरफराज अहमद ने स्वीकार किया कि पाकिस्तान के पास फिलहाल “कोई ठोस विकास योजना नहीं है” और देश की वित्तीय स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। यह बयान पाकिस्तान की आंतरिक आर्थिक चिंताओं को उजागर करता है।
महंगाई पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। रिपोर्ट के अनुसार 2022 से 2023 के बीच पाकिस्तान में महंगाई दर 37.97 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछले तीन दशकों में सबसे अधिक मानी जा रही है। इस रिकॉर्ड तोड़ महंगाई ने आम लोगों की कमर तोड़ दी है। खाने-पीने की चीज़ों, ईंधन और बिजली की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी से लाखों परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया। विश्व बैंक का अनुमान है कि महंगाई के कारण लगभग 1.3 करोड़ पाकिस्तानी गरीबी रेखा के नीचे चले गए।
2023-24 तक पाकिस्तान में गरीबी दर बढ़कर 25.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है, यानी हर चार में से एक व्यक्ति गरीबी में जीवन गुजार रहा है। अगर अंतरराष्ट्रीय गरीबी मानक (दैनिक 4 डॉलर से कम आय) को अपनाया जाए, तो पाकिस्तान की करीब 45 प्रतिशत आबादी गरीब मानी जाएगी। यह आंकड़े देश के सामाजिक और आर्थिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
भारत में भी इस अवधि के दौरान महंगाई का दबाव रहा, लेकिन पाकिस्तान की तुलना में स्थिति कहीं बेहतर रही। भारत में 2023 के दौरान मुद्रास्फीति 5 से 6 प्रतिशत के बीच रही और 2024 में इसमें और कमी देखने को मिली। खासतौर पर खाद्य कीमतों पर नियंत्रण और सरकारी नीतियों के कारण 2023 के अंत तक खुदरा महंगाई 5 प्रतिशत से नीचे आ गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एक औसत पाकिस्तानी उपभोक्ता को भारत के मुकाबले लगभग पांच गुना अधिक महंगाई का सामना करना पड़ रहा है।
गरीबी के मोर्चे पर भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत में दैनिक 4 डॉलर से कम पर जीवन यापन करने वाली आबादी 2023 तक घटकर केवल 2.3 प्रतिशत रह गई, जबकि पहले यह आंकड़ा करीब 16 प्रतिशत था। यह गिरावट आर्थिक सुधारों, सामाजिक कल्याण योजनाओं और रोजगार के बढ़ते अवसरों का परिणाम मानी जा रही है।
कुल मिलाकर, विश्व बैंक की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि महामारी के बाद भारत और पाकिस्तान की आर्थिक नीतियों और उनके परिणामों में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है। जहां भारत वैश्विक मंच पर एक “ग्लोबल स्टार” के रूप में उभर रहा है, वहीं पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए बड़े और कठिन सुधारों की जरूरत है।

