Tibet Classes विवाद: चीन में 10500 तिब्बती बच्चों का दाखिला

Tibet Classes
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चीन में चल रहे ‘Tibet Classes’ कार्यक्रम एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस और आलोचना के केंद्र में आ गए हैं। साल 2025 में इस योजना के तहत 10,500 तिब्बती बच्चों को चीन के विभिन्न शहरों में स्थित विशेष स्कूलों में दाखिला दिया गया है। यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक आंकड़ा बताया जा रहा है। तिब्बत ऑटोनॉमस रीजन (TAR) के शिक्षा विभाग की एक हालिया रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है, जिसे तिब्बती वेबसाइट Phayul ने प्रकाशित किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में सिर्फ तिब्बती बच्चों के लिए 5 नए स्कूल खोले गए हैं। इन स्कूलों और क्लासेज़ में बड़े पैमाने पर बच्चों को दाखिल किया गया है। आंकड़ों के अनुसार, 150 जूनियर स्कूल क्लासेज़ में करीब 2,000 बच्चे, 205 सीनियर सेकेंडरी क्लासेज़ में लगभग 4,500 बच्चे और 223 वोकेशनल या तकनीकी क्लासेज़ में करीब 4,000 बच्चों को जगह दी गई है। इनमें से 3,215 बच्चे तिब्बत क्षेत्र से हैं, जबकि 785 बच्चे छिंगहाई प्रांत से हैं, जिसे पारंपरिक तिब्बती इलाका माना जाता है।

सरकार का दावा, आलोचकों की चिंता

चीनी सरकार का कहना है कि इन बच्चों में से लगभग 70 प्रतिशत गरीब, ग्रामीण, घुमंतू और सीमावर्ती इलाकों से आते हैं। सरकार के अनुसार, ‘तिब्बत क्लासेज़’ का उद्देश्य इन बच्चों को बेहतर शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है, ताकि वे मुख्यधारा के विकास से जुड़ सकें।

हालांकि, आलोचकों और मानवाधिकार संगठनों का नजरिया इससे बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि ऐसे सामाजिक रूप से कमजोर तबकों के बच्चे आसानी से प्रभावित किए जा सकते हैं। उन्हें कम उम्र में परिवार और समुदाय से दूर करके चीनी भाषा, संस्कृति और विचारधारा में ढाला जा रहा है, जिससे उनकी अपनी तिब्बती पहचान धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।

हर साल बढ़ रहे दाखिले

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 2023 के बाद से ‘तिब्बत क्लासेज़’ में दाखिले हर साल करीब 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं। यह कार्यक्रम चीन की तथाकथित “तीन बढ़ोतरी और तीन कवरेज” नीति के तहत चलाया जा रहा है। इस नीति का अर्थ है—ज्यादा बोर्डिंग स्कूल, ज्यादा छात्रों का दाखिला और ज्यादा स्कूलों का विस्तार, ताकि दूर-दराज़ और सीमावर्ती इलाकों को पूरी तरह कवर किया जा सके।

आलोचकों का मानना है कि बोर्डिंग स्कूल मॉडल के जरिए बच्चों को लंबे समय तक घर से दूर रखा जाता है, जिससे उनका अपने परिवार, भाषा और धार्मिक परंपराओं से जुड़ाव कमजोर हो जाता है।

शिक्षा या राजनीतिक प्रशिक्षण?

तिब्बती संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि ‘तिब्बत क्लासेज़’ सिर्फ शिक्षा का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक तरह का राजनीतिक और वैचारिक प्रशिक्षण है। उनका कहना है कि इन स्कूलों में तिब्बती भाषा और संस्कृति को हाशिये पर रखा जाता है, जबकि चीनी राष्ट्रवाद और कम्युनिस्ट विचारधारा पर ज्यादा जोर दिया जाता है।

आलोचकों के अनुसार, बच्चों को छोटी उम्र में ही घर से निकालकर ऐसे माहौल में रखा जा रहा है, जहां उनकी धार्मिक आस्था, परंपराएं और सांस्कृतिक मूल्य धीरे-धीरे दब जाते हैं। इसे तिब्बती पहचान को खत्म करने की एक लंबी और सुनियोजित प्रक्रिया बताया जा रहा है।

‘तिब्बत क्लासेज़’ का इतिहास

‘तिब्बत क्लासेज़’ कार्यक्रम की शुरुआत साल 1984 में की गई थी। शुरुआत में इसे एक शैक्षणिक पहल के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन 1996 में चीनी सरकार ने इसे सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि एक “राजनीतिक जिम्मेदारी” करार दिया। आज यह कार्यक्रम चीन के 23 प्रांतों, 60 बड़े शहरों और 129 स्कूलों में चलाया जा रहा है।

चीन का दावा है कि अब तक करीब 1.8 लाख तिब्बती छात्र इन स्कूलों से शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं और देश के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। वहीं, आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि इस शिक्षा की कीमत तिब्बती संस्कृति और पहचान को चुकानी पड़ रही है।

बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चिंता

मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के अधिकारों और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के नजरिये से यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। आने वाले समय में यह विवाद चीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच तनाव को और बढ़ा सकता है।