Pakistan Economic Crisis: पाकिस्तान में चल रहा आर्थिक संकट आम लोगों की जिंदगी पर गहरा असर डाल रहा है। नई सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में परिवार अब अपनी आय का करीब दो-तिहाई हिस्सा भोजन, बिजली और अन्य मूलभूत खर्चों पर खर्च करने के लिए मजबूर हैं। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घकालिक कल्याण जैसी आवश्यक ज़रूरतें धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं। यह खुलासा हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकनॉमिक सर्वे 2024-25 के नतीजों में हुआ है, जिसका हवाला द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने दिया है।
रिपोर्ट बताती है कि महंगाई, आर्थिक कुप्रबंधन और लगातार बढ़ती कीमतों ने घरेलू बजट का संतुलन पूरी तरह बदल दिया है। आय बढ़ने के बावजूद खर्च उससे तेज़ रफ्तार से बढ़ रहे हैं — खासकर बढ़े हुए बिजली-गैस टैरिफ और जीवन-यापन की समग्र लागत के कारण।
सर्वे के अनुसार, पाकिस्तान के परिवार अब अपने कुल खर्च का लगभग 63 प्रतिशत सिर्फ दो मदों पर खर्च करते हैं — भोजन और आवास संबंधी खर्च, जिनमें बिजली और गैस भी शामिल हैं। अकेले भोजन पर 37 प्रतिशत खर्च हो रहा है, जबकि आवास और यूटिलिटी बिल 26 प्रतिशत बजट ले लेते हैं। यह तस्वीर दर्शाती है कि डबल-डिजिट महंगाई ने लोगों की क्रय शक्ति पर गहरा प्रहार किया है और खर्च “जीविका तक सीमित” होता जा रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलुओं में से एक शिक्षा पर होने वाले खर्च में तेज गिरावट है। अब घर-परिवार अपनी आय का केवल 2.5 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं — जो आवास और यूटिलिटीज़ पर होने वाले खर्च के मुकाबले बेहद कम है। शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन पर कुल मिलाकर खर्च 7 प्रतिशत के आसपास अटका हुआ है, जिससे मानव विकास से जुड़े संकेतकों पर खतरे की घंटी बज रही है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि परिवारों की आय में विदेशों से आने वाले रेमिटेंस और अनौपचारिक मदद की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। छह साल पहले जहां रेमिटेंस का हिस्सा 5 प्रतिशत से भी कम था, वहीं अब यह करीब 8 प्रतिशत तक पहुंच गया है। ग्रामीण परिवार — जहां रोजगार के अवसर कम हैं — इस सहायता पर और अधिक निर्भर होते जा रहे हैं, जिसे विशेषज्ञ सिकुड़ती घरेलू अर्थव्यवस्था का संकेत मान रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि औसत मासिक आय छह वर्षों में PKR 41,500 से बढ़कर लगभग PKR 82,000 हो गई है, लेकिन इसी अवधि में उपभोग खर्च 19 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ा है — यानी आय वृद्धि से कहीं अधिक। नतीजा यह हुआ कि लोगों की वास्तविक क्रय शक्ति घट गई और असमानता भी तेज़ी से बढ़ी, जहां अमीर तबका गरीबों की तुलना में तीन गुना से ज्यादा कमाई कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर महंगाई और कीमतों का दबाव इसी तरह जारी रहा, तो परिवारों को और भी कठोर समझौते करने पड़ सकते हैं — जिनका असर आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर दीर्घकालिक रूप से दिखाई देगा।
(एजेंसी इनपुट्स शामिल)

