Iran US War: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने अब एक नए और खतरनाक मोड़ ले लिया है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहा टकराव अब सिर्फ सैन्य स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक बड़े आर्थिक युद्ध का रूप ले चुका है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने अपनी रणनीति बदलते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला कदम उठाया है।
परमाणु कार्यक्रम पर हमलों का सीमित असर
अमेरिकी रक्षा विभाग का अनुमान था कि 2025 और 2026 में किए गए हमलों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को गंभीर नुकसान पहुंचा है। लेकिन Defense Intelligence Agency (DIA) की हालिया खुफिया रिपोर्ट इससे अलग तस्वीर पेश करती है।
रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने हमलों से पहले ही अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित कर दिया था। इस वजह से उसकी परमाणु क्षमता को केवल कुछ महीनों का ही नुकसान हुआ है।
इसके अलावा, देश के भीतर अब परमाणु हथियारों के पक्ष में जनमत मजबूत होता दिखाई दे रहा है। मोजतबा खामेनेई के नेतृत्व में ईरान का रुख पहले से ज्यादा आक्रामक नजर आ रहा है, और पूर्व में परमाणु हथियारों के खिलाफ जारी धार्मिक आदेश (फतवा) का प्रभाव भी कम होता दिख रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: ईरान का सबसे बड़ा ‘आर्थिक हथियार’
होर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे संकट का केंद्र बन चुका है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से लगभग 25% वैश्विक कच्चे तेल और 20% LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) का परिवहन होता है।
ईरान ने इस रणनीतिक मार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए टैंकरों की आवाजाही को बाधित कर दिया है। इसका सीधा असर वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ा है और तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है।
ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं और विशेषज्ञों का मानना है कि यह 140 डॉलर तक जा सकती हैं। इससे वैश्विक मंदी का खतरा और गहरा गया है।
एशियाई देशों पर बढ़ता ऊर्जा संकट
इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ रहा है। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश ऊर्जा आपूर्ति के लिए इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं।
तेल और गैस की सप्लाई में रुकावट के कारण इन देशों की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ गई है, जिससे उनके आर्थिक विकास पर भी असर पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन की विरोधाभासी रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की रणनीति को लेकर सामने आया है। एक तरफ अमेरिका ईरान पर सैन्य दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी ओर तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उसने 140 मिलियन बैरल ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी है।
विश्लेषकों के अनुसार, यह नीति एक विरोधाभास को दर्शाती है—जहां एक ओर दबाव बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश भी हो रही है।
चीन की बढ़ती भूमिका और पेट्रोडॉलर को चुनौती
चीन इस पूरे संकट में एक अहम खिलाड़ी बनकर उभरा है। ईरान अब उन टैंकरों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति दे रहा है, जो तेल का व्यापार चीनी युआन में कर रहे हैं।
यह कदम सीधे तौर पर अमेरिकी डॉलर आधारित ‘पेट्रोडॉलर’ प्रणाली को चुनौती देता है और वैश्विक वित्तीय संतुलन में बदलाव का संकेत देता है।
जिद्दी रणनीति के साथ आगे बढ़ता ईरान
ईरान का रुख साफ है—जब तक उसके पास होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण है, वह किसी भी दबाव में जल्दबाजी में समझौता नहीं करेगा। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के समर्थन से ईरान आर्थिक दबाव बनाकर अपने विरोधियों को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
कुल मिलाकर, यह संकट अब केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की पकड़ ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि आर्थिक रणनीतियों से भी लड़ा जाता है।

