पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच Iran ने खाड़ी क्षेत्र में किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट किया है। ईरान के सर्वोच्च नेता के भारत स्थित प्रतिनिधि Dr. Abdul Majid Hakeem Ilahi ने कहा कि ईरान का उद्देश्य पड़ोसी देशों को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि उन अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निष्क्रिय करना है जिनका इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए किया जा रहा है।
नई दिल्ली में एक इंटरव्यू के दौरान इलाही ने कहा कि ईरान हजारों वर्षों से इस क्षेत्र का हिस्सा रहा है, जबकि United States हजारों किलोमीटर दूर स्थित है और सीधे अपने देश से हमला करना उसके लिए संभव नहीं है। इसी कारण अमेरिका ने ईरान के आसपास कई देशों में सैन्य अड्डे स्थापित किए हुए हैं।
“अमेरिका के दर्जनों सैन्य अड्डे”
इलाही का दावा है कि अमेरिका ने ईरान के आसपास लगभग 33 से 45 सैन्य ठिकाने स्थापित कर रखे हैं। उनके अनुसार युद्ध शुरू होने से पहले ईरान ने पड़ोसी देशों से अनुरोध किया था कि वे इन ठिकानों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ न होने दें।
उन्होंने कहा कि कई देशों ने शुरुआत में ऐसा न करने का भरोसा दिया था, लेकिन बाद में उन्हीं अड्डों से ईरान के खिलाफ हमले किए गए। इलाही के मुताबिक, इसी कारण ईरान को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का मुख्य उद्देश्य उन सैन्य अड्डों को नुकसान पहुंचाना है, जहां से ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जा रही है। उनके शब्दों में, अगर इन अड्डों को निष्क्रिय नहीं किया गया तो वे लगातार ईरान के लिए खतरा बने रहेंगे।
नागरिकों की मौत पर ईरान का पक्ष
संघर्ष के दौरान नागरिकों की मौत के बारे में पूछे जाने पर इलाही ने कहा कि निर्दोष लोगों की जान जाना बेहद दुखद है। हालांकि उनका कहना है कि इसके लिए जिम्मेदारी उन देशों की है जिन्होंने युद्ध की शुरुआत की।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह केवल हमलों की आलोचना करने के बजाय इस बात पर भी ध्यान दे कि इस संघर्ष की शुरुआत किसने की और किन परिस्थितियों में यह युद्ध शुरू हुआ।
स्कूल पर हमले को लेकर दावा
इलाही ने यह भी दावा किया कि मिनाब के एक प्राइमरी गर्ल्स स्कूल पर हुआ हमला बहरीन की दिशा से दागी गई मिसाइल के कारण हुआ था। इस घटना में 180 से अधिक लोगों की मौत होने की बात कही गई है।
हालांकि कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि यह हमला संभवतः अमेरिकी सेना की गलत खुफिया जानकारी के आधार पर हुआ हो सकता है। इन दावों की अभी तक स्वतंत्र रूप से पूरी पुष्टि नहीं हो पाई है।
कैसे शुरू हुआ यह संघर्ष
पश्चिम एशिया में यह सैन्य संघर्ष 28 फरवरी को तेज हो गया था, जब United States और Israel ने ईरान के कई ठिकानों पर संयुक्त हमले किए। इन हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया।
इसके बाद हालात तब और गंभीर हो गए जब हमलों के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत की खबर सामने आई। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में राजनीतिक और सैन्य तनाव को और बढ़ा दिया।
ईरान की जवाबी कार्रवाई
हमलों के जवाब में ईरान ने इजरायल और अमेरिका से जुड़े कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद कुछ अड्डों पर भी मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए।
विश्लेषकों का मानना है कि यह संघर्ष अब क्षेत्रीय संकट का रूप ले सकता है, क्योंकि कई देशों के सैन्य अड्डे और रणनीतिक ठिकाने इस टकराव में शामिल हो चुके हैं।
वैश्विक असर की आशंका
मिडिल ईस्ट में बढ़ते इस तनाव का असर वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है। खाड़ी क्षेत्र से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और गैस प्राप्त करता है, इसलिए यहां अस्थिरता से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में कई देश कूटनीतिक समाधान की जरूरत पर जोर दे रहे हैं ताकि क्षेत्र में स्थिरता और शांति बहाल की जा सके।

