Iran Israel War: पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव डालने लगा है। Iran और Israel के बीच सीधे संघर्ष ने वैश्विक कूटनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी अस्थिर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव लंबा खिंचता है, तो भारत के विदेशी व्यापार, ऊर्जा आयात और महंगाई पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है।
निर्यातकों की बढ़ी चिंता
मुंबई के प्रमुख निर्यातक और टेक्नोक्राफ्ट इंडस्ट्रीज के चेयरमैन शरद कुमार सराफ ने मीडिया से बातचीत में कहा कि हालात की अनिश्चितता के कारण कई भारतीय कंपनियों ने ईरान और इजरायल के लिए भेजी जाने वाली खेपों को फिलहाल रोक दिया है। व्यापारिक जोखिम, बीमा प्रीमियम में वृद्धि और भुगतान तंत्र की अनिश्चितता ने निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
भारत का पश्चिम एशिया के देशों के साथ अरबों डॉलर का व्यापार है। ऐसे में इराक, जॉर्डन और सीरिया जैसे देशों के साथ भी सप्लाई चेन प्रभावित होने की आशंका है। यदि बंदरगाहों या बैंकिंग चैनलों में व्यवधान आता है, तो व्यापारिक गतिविधियां सुस्त पड़ सकती हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट
विशेषज्ञों के मुताबिक इस संघर्ष का सबसे बड़ा खतरा Strait of Hormuz पर मंडरा रहा है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के बड़े हिस्से के तेल व्यापार का प्रमुख रास्ता है। यदि यहां से जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ेगा।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। तेल की कीमतों में उछाल आने से देश में पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, जिसका सीधा असर परिवहन लागत और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा। इससे महंगाई बढ़ने की आशंका है।
लाल सागर के बाद नई चुनौती
भारतीय व्यापारी पहले ही Red Sea में असुरक्षा की स्थिति से जूझ रहे हैं। हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण कई जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे Cape of Good Hope से होकर लंबा मार्ग अपनाना पड़ रहा है। इससे माल ढुलाई की लागत और समय दोनों बढ़ गए हैं। अब ईरान–इजरायल संघर्ष ने एक और रणनीतिक मार्ग को जोखिम में डाल दिया है।
सप्लाई चेन पर असर
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस क्षेत्र में बंदरगाह संचालन या वित्तीय लेनदेन प्रभावित होते हैं, तो भारत की सप्लाई चेन पर भारी दबाव पड़ेगा। माल भाड़ा (Freight) और बीमा लागत में वृद्धि से निर्यात महंगा हो जाएगा, जिससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है।
अरबों डॉलर का दांव
आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में भारत का ईरान के साथ निर्यात लगभग 1.24 अरब डॉलर और आयात 441.8 करोड़ डॉलर रहा। इजरायल के साथ भारत का निर्यात 2.1 अरब डॉलर और आयात 1.6 अरब डॉलर के आसपास है। इसके अलावा अन्य पश्चिम एशियाई देशों के साथ भी भारत का व्यापारिक रिश्ता मजबूत है।
ईरान को भारत से मुख्य रूप से बासमती चावल, सोया मील, चाय, केला और चना निर्यात किया जाता है। यदि क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति गहराती है, तो इन वस्तुओं के निर्यात पर सीधा असर पड़ेगा।
ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद यह संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। ऐसे में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी—एक ओर ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और दूसरी ओर अपने निर्यातकों को आर्थिक अस्थिरता से बचाना।
सरकार को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश, सामरिक तेल भंडार के उपयोग और नए व्यापारिक मार्गों की रणनीति पर काम करना पड़ सकता है। फिलहाल स्थिति पर नजर बनाए रखना और जोखिम प्रबंधन ही भारतीय व्यापार जगत के लिए सबसे अहम कदम है।

