पूर्व RAW एजेंट की चेतावनी: ईरान का हाइब्रिड वॉर US-इजराइल के लिए नया खतरा

Iran Hybrid War
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पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष अब एक नए और अधिक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। यह जंग अब केवल मिसाइल हमलों और एयर स्ट्राइक तक सीमित नहीं रही, बल्कि “हाइब्रिड वॉरफेयर” और “प्रॉक्सी वॉर” के रूप में तेजी से फैलती नजर आ रही है। इस बीच पूर्व RAW एजेंट और NSG कमांडो लकी बिष्ट ने इस बदलती रणनीति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है।

लकी बिष्ट ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक वीडियो साझा करते हुए कहा कि आने वाले समय में खतरा केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं होगा, बल्कि छिपे हुए नेटवर्क, साइबर हमलों और अप्रत्यक्ष रणनीतियों से भी हो सकता है। उनके अनुसार, यह युद्ध अब “हाइब्रिड वॉर” में बदल रहा है, जो पारंपरिक युद्ध से कहीं अधिक जटिल और खतरनाक होता है।

कैसे शुरू हुआ यह संघर्ष?

यह युद्ध 28 फरवरी 2026 को उस समय शुरू हुआ जब अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त सैन्य अभियान चलाकर ईरान के सैन्य ठिकानों और नेतृत्व को निशाना बनाया। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल पर मिसाइल हमले किए और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को भी निशाना बनाया। इसके साथ ही ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क को सक्रिय कर दिया, जिससे यह संघर्ष अब कई मोर्चों पर फैल गया है।

आज यह जंग केवल एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि लेबनान, इराक, यमन और समुद्री मार्गों तक फैल चुकी है। इससे यह एक “मल्टी-फ्रंट वॉर” बन गई है, जिसमें कई क्षेत्रीय शक्तियां अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं।

प्रॉक्सी वॉर: ईरान की सबसे बड़ी ताकत

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी “प्रॉक्सी वॉर” रणनीति है। ईरान सीधे युद्ध में उलझने के बजाय क्षेत्रीय संगठनों और मिलिशिया समूहों के जरिए अपने विरोधियों पर दबाव बनाता है।

लेबनान में हिजबुल्लाह को ईरान का सबसे मजबूत सहयोगी माना जाता है, जिसने कई बार इजराइल के खिलाफ संघर्ष में भाग लिया है। इसी तरह इराक में कई शिया मिलिशिया समूह ईरान समर्थित माने जाते हैं, जिन पर अमेरिकी ठिकानों पर हमलों का आरोप लगता रहा है। यमन में हूती विद्रोही भी ईरान के समर्थन से सऊदी अरब और खाड़ी देशों को चुनौती देते रहे हैं। इसके अलावा, सीरिया में भी ईरान ने सरकार का समर्थन करते हुए अपने प्रभाव को मजबूत किया है।

इन उदाहरणों से साफ है कि ईरान प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय अप्रत्यक्ष रणनीति में अधिक दक्ष है, जिससे वह कम संसाधनों में भी बड़े देशों को चुनौती दे सकता है।

स्लीपर सेल और छिपे नेटवर्क का खतरा

जैसे-जैसे यह युद्ध आगे बढ़ रहा है, “स्लीपर सेल” यानी छिपे हुए नेटवर्क की आशंका भी बढ़ रही है। हालांकि अभी तक अमेरिका या यूरोप में बड़े स्तर पर ऐसे नेटवर्क के सक्रिय होने के ठोस प्रमाण सामने नहीं आए हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह सतर्क हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो छोटे स्तर के हमले या गुप्त नेटवर्क सक्रिय हो सकते हैं। इस तरह के हमले पारंपरिक युद्ध से ज्यादा खतरनाक और अप्रत्याशित होते हैं, क्योंकि इनका पता लगाना और रोकना मुश्किल होता है।

हाइब्रिड वॉर: बदलती जंग का नया चेहरा

अब यह संघर्ष “अनरिस्ट्रिक्टेड वॉरफेयर” की दिशा में बढ़ता दिख रहा है, जिसमें हर क्षेत्र को युद्ध का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसमें साइबर हमले (बैंकिंग, बिजली और डेटा सिस्टम पर), तेल और गैस सप्लाई में बाधा, प्रॉक्सी समूहों के जरिए हमले, और प्रचार या मनोवैज्ञानिक युद्ध शामिल हैं।

इस तरह का युद्ध न केवल सैन्य मोर्चे पर बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी भारी असर डालता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य: सबसे बड़ा दांव

इस पूरे संघर्ष का सबसे संवेदनशील केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य बन चुका है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान द्वारा इस मार्ग को बाधित करने की कोशिशों ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है, जबकि अमेरिका ने इसे हर हाल में खुला रखने की चेतावनी दी है।

यदि इस मार्ग में रुकावट आती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल और गैस सप्लाई पर पड़ेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है और दुनिया को 1970 के दशक जैसे बड़े ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि यह संघर्ष अब पारंपरिक युद्ध से कहीं आगे बढ़ चुका है। हाइब्रिड वॉर, प्रॉक्सी नेटवर्क और आर्थिक दबाव जैसे नए हथियार इस जंग को और जटिल बना रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक शक्तियां इस बदलते खतरे से कैसे निपटती हैं।