भारत अपने रक्षा इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य खरीद में से एक की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम के तहत राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर सरकार जल्द बड़ा फैसला ले सकती है। बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा हालातों के बीच यह सौदा भारतीय वायुसेना (IAF) की युद्धक क्षमता को नई ऊंचाई देने वाला माना जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की बैठक 12 फरवरी को होने जा रही है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करेंगे। इस बैठक में 114 राफेल विमानों की खरीद के लिए स्वीकृति की आवश्यकता (Acceptance of Necessity – AoN) को मंजूरी मिलने की संभावना है। यह मंजूरी मिलने के बाद खरीद प्रक्रिया औपचारिक रूप से अगले चरण में प्रवेश कर जाएगी।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इसी महीने भारत के राजकीय दौरे पर आने वाले हैं, जिससे भारत-फ्रांस रक्षा सहयोग को नई गति मिलने के संकेत मिल रहे हैं।
₹3.25 लाख करोड़ की रणनीतिक निवेश योजना
प्रस्तावित सौदे के तहत 114 राफेल फाइटर जेट खरीदे जाएंगे, जिनकी अनुमानित लागत ₹3.25 लाख करोड़ (लगभग 39 अरब डॉलर) बताई जा रही है। यह सौदा पहले ही रक्षा खरीद बोर्ड (DPB) से मंजूरी पा चुका है और अब केवल DAC की स्वीकृति शेष है।
सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत इस सौदे को दो चरणों में लागू करने की योजना है। इसके अंतर्गत 18 विमान फ्रांस से सीधे ‘फ्लाई-अवे’ स्थिति में खरीदे जाएंगे, जबकि शेष 96 विमान भारत में ही एक रणनीतिक साझेदारी के तहत निर्मित किए जाएंगे। इससे न केवल तेज़ी से विमानों की तैनाती संभव होगी, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही वायुसेना
भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल 29 से 30 फाइटर स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत आवश्यकता 42 स्क्वाड्रन की है। चीन और पाकिस्तान के साथ दो मोर्चों पर संभावित संघर्ष की स्थिति में यह कमी गंभीर मानी जाती है।
पुराने सोवियत दौर के लड़ाकू विमानों—जैसे MiG-21 और MiG-27—की सेवानिवृत्ति के बाद वायुसेना को आधुनिक विमानों की सख्त जरूरत महसूस हो रही है। ऐसे में राफेल की बड़ी संख्या में खरीद इस अंतर को पाटने की दिशा में निर्णायक कदम मानी जा रही है।
राफेल क्यों है भारत की पहली पसंद
राफेल पहले ही भारतीय वायुसेना में अपनी क्षमता साबित कर चुका है। यह विमान एडवांस्ड रडार सिस्टम, लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता, और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम से लैस है।
विशेषज्ञों के अनुसार, राफेल ने लद्दाख और हिमालयी क्षेत्रों में बेहतरीन प्रदर्शन किया है, जो चीन के साथ सीमा तनाव के संदर्भ में बेहद अहम है। वहीं पाकिस्तान के खिलाफ यह विमान स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक और गहरे हमले की क्षमता प्रदान करता है, जिससे भारत की प्रतिरोधक शक्ति और मजबूत होती है।
खरीद प्रक्रिया: आगे क्या होगा
DAC से AoN मिलने के बाद यह सौदा कई चरणों से गुजरेगा:
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AoN स्वीकृति – खरीद को औपचारिक मंजूरी
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Request for Proposal (RFP) – फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन को प्रस्ताव भेजा जाएगा
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तकनीकी व वाणिज्यिक मूल्यांकन – तकनीक हस्तांतरण और मेक इन इंडिया शर्तों की जांच
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Contract Negotiation Committee (CNC) – कीमत, रखरखाव और हथियार पैकेज पर बातचीत
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कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की मंजूरी
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अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्तर के सौदे में अंतिम समझौते तक पहुंचने में समय लग सकता है।
भारत-फ्रांस रक्षा साझेदारी को नई ऊंचाई
राफेल सौदे को भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी का एक अहम स्तंभ माना जा रहा है। फ्रांस उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिसने भारत के साथ दीर्घकालिक रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और औद्योगिक सहयोग को प्राथमिकता दी है।
यदि यह सौदा अंतिम रूप लेता है, तो यह न केवल भारतीय वायुसेना की ताकत को नई धार देगा, बल्कि भारत को एक वैश्विक एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी बड़ा कदम साबित होगा।

