डॉ. संजीव कुमार: हिंदी साहित्य के बहुआयामी सृजनकर्ता

Renowned Hindi author Dr. Sanjeev Kumar seated at his residence during an exclusive interview about his literary journey and contributions to Hindi literature
Eminent Hindi author and publisher Dr. Sanjeev Kumar during an exclusive interview, sharing insights on his decades-long literary journey, writing process, and his role in nurturing new voices in Hindi literature.

Dr Sanjeev Kumar : हिंदी साहित्य जगत में शायद ही कोई ऐसा इन्सान हो जो डॉ. संजीव कुमार जी के नाम से अपरिचित हो या उनके बहुआयामी योगदान की चर्चा न करता हो। कई दशकों से वह निरंतर हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में संलग्न हैं — एक ऐसे साहित्यकार, जिनकी लेखनी हर विधा में समान अधिकार रखती है। चाहे वह व्यंग्य की सूक्ष्म दृष्टि हो, कविता का भाव-संसार, लेख और समीक्षा की गहराई हो , बच्चों के लिए रचनात्मक लेखन हो या कानूनी व सामाजिक विषयों पर चिंतन— डॉ. संजीव कुमार का लेखन हमेशा सार्थक, संतुलित और गहन दृष्टिकोण से ओत-प्रोत रहा है।

उनका व्यक्तित्व उतना ही धीर और गंभीर है जितना उनकी रचनाओं का स्वर। अनुशासनप्रिय, संतुलित और समस्या-समाधान में निपुण, वह हर चुनौती का सामना सहजता और मुस्कान के साथ करते हैं। यही उनकी प्रबंधकीय कुशलता और मानवीय गहराई का परिचायक है। साहित्यिक जगत में उनकी उपस्थिति हमेशा सकारात्मक संवाद और नयी दृष्टि का पर्याय रही है।

डॉ. संजीव कुमार का जन्म 4 फरवरी, 1960 को कानपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। पिता कॉलेज में प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रवक्ता थे, जबकि माता एक विदुषी महिला थीं, जिनकी साहित्य, संगीत, कला और ज्योतिष में गहरी रुचि थी। बचपन का अधिकांश समय उन्होंने पैतृक गाँव में बिताया, जहाँ की प्रकृति और परिवेश ने उनके भीतर संवेदनशीलता और रचनात्मकता के बीज बोए।

खासरपट डॉट कॉम के लिए डॉ संजीव कुमार जी से विशेष बातचीत की है हरिकृष्ण ने। ये हैं इस बातचीत के कुछ अंश:

प्रश्न: लेखन में आपकी शुरुआत कैसे हुई?

वैसे कहूं तो लेखन का शौक मुझे पांच या छह साल की उम्र से ही था। लेकिन 1975 से नियमित लेखन प्रारंभ कर दिया और मेरी पहली कविता ‘प्रतीक्षा’ 1976 में ऋतंभरा में प्रकाशित हुई थी, जिसके बोल थे—

“प्राण तेरे प्राण की मैं एक इच्छा हूँ।
द्वार पर तेरे खड़ी हूँ मैं प्रतीक्षा हूँ।”

प्रश्न: इतनी कम उम्र से ही साहित्य लेखन के प्रति आपके झुकाव को आपके परिवार ने कैसे लिया?

मत पूछिए साहब! जब मैं बहुत छोटा था तो एक बार मेरे पिताश्री ने मुझे लिखते हुए देख लिया। उन्होंने जोरदार धुनाई की। सारी कापियां आंगन में रखकर उन पर मिट्टी का तेल डाला और आग के हवाले कर दीं। मेरे लिखे हुए सैंकड़ों पन्ने स्वाह हो गए।

प्रश्न:आपके पिता जी ने आपका लिखा सब नष्ट कर दिया, उसके पीछे उनकी क्या सोच थी?

पिता जी को लेखन से कोई खास दिक्कत नहीं थी। उनकी तो बस इतनी सी सोच थी कि पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर ले, कहीं नौकरी लग जाए उसके बाद जो चाहे लिखे। उन्होंने किसी से बात की हुई थी। वे तुम्हें एडहोक पर लगा देंगे। बाद में परमानेंट करा देंगे। हम उस रास्ते पर जाना नहीं चाहते थे। वैसे पिताजी की सोच गलत नहीं थी, वे अपनी जगह ठीक ही थे। बहरहाल जो हुआ अच्छा ही हुआ।

प्रश्न: इस घटना के बाद आपकी पढ़ाई-लिखाई का सिलसिला कैसा रहा?

बस फिर क्या था शुरू हो गई वही जीवन की जद्दोहद। कानपुर से सुबह जाते थे, शाम को आते थे, 1977 में वाणिज्य स्नातक एवं 1979 में वाणिज्य में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। उसके बाद भारतीय लागत लेखाकार प्रबंध एवं संस्थान और भारतीय कंपनी सचिव संस्थान की उपाधि परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। ‘बाल श्रमिकों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति’ पर शोधकार्य किया, जिस पर 1996 में कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा पी.एच.डी. की उपाधि से सम्मानित किया गया। वर्ष 2001 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से विधि स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उसके उपरांत इंडियन लॉ इंस्टिट्यूट से ‘इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स’ में स्नातकोत्तर डिप्लोमा ग्रहण किया।

प्रश्न: जब आपने पहली कविता लिखी तो आपकी उम्र क्या रही होगी?
जब मैंने अपनी पहली कविता लिखी तब मेरी उम्र करीब बारह वर्ष रही होगी। असल में मेरी माँ एक विदुषी महिला थीं, जिनकी साहित्य, संगीत, कला एवं ज्योतिष में गहरी रुचि थी उनके जीन्स हैं और मेरे पिता कॉलेज में प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रवक्ता थे। कुछ जीन्स उनके आए। कुछ जीन्स अपने वाले भी फड़फड़ाए। बस लिखना शुरू हो गया।

प्रश्न: आपकी पहली किताब कौन-सी थी और कब प्रकाशित हुई?

सभी किताबों के हिसाब से देखें तो मेरी पहली किताब थी इनडारेयक्ट टैक्स जो, सीए और आईसीडब्ल्यूए में पढ़ाई जाती है। उसके अब तक बारह संस्करण आ चुके हैं। मैंने बारह साल तक उसे संपादित किया। बाद में जीएसटी साहब आ गए। जीएसटी साहब ने ऐसा बना दिया कि सुबह जागो तो कोई रूल और रात को सोओ तो कोई और रूल। हमने कहा कि हम इतना नहीं कर पाएंगे। मैंने कुल मिलाकर 51 किताबें लॉ पर लिखीं हैं। 245 किताबें अन्य विधाओं पर।

प्रश्न: आप नौकरी करने लगे, लॉ की किताबें लिखीं, फिर दोबारा साहित्य की तरफ लौटना कैसे हुआ?

मोहब्बत छोड़ी थोड़े थी, बिछुड़ भले ही गए थे। मोहब्बत तो कायम थी, लिखते रहते थे। जब हम जहाज में जा रहे हों, तो कुछ न कुछ लिखते, डायरी हमारे साथ रहती थी। उसमें लिखते, वही धीरे-धीरे संकलित करके थीम के अनुसार किताबें छाप दीं दनादन।

प्रश्न: आपकी पहली साहित्यिक किताब कौन-सी है ?

मेरी पहली साहित्यिक किताब है ग्राम्या, इसमें 1975 तक की सबसे पुरानी कविताएं हैं। दूसरा संग्रह था क्षितिज, फिर निहारिका, स्वनदीप, उच्च्छास, ज्योत्सना, गुंजन इस तरह लिखना चलता रहा।

प्रश्न: आपने बताया कि जहाज में यात्रा के दौरान लिखा तो क्या आपका सारा साहित्यिक लेखन ऐसे ही हुआ?

नहीं-नहीं, सुबह चाय पीने के लिए बैठे हैं, मन हुआ कि आज तो लिखेंगे, लिखने बैठे और शाम तक एक किताब पूरी कर दी। वासवदत्ता ऐसे ही लिखी थी। जिसका बारह भाषाओं में अनुवाद हो चुका है, और ऐसे भी लिखा कि किताब को पूरा करने में चौदह साल लग गए। मैंने नाट्यशास्त्र पर ज्योतिर्मय, नृत्य के कितने भी भाव सम भाव, विभिन्न पक्ष पर अनेक प्रकार के नृत्य, नृत्यांगनाएं। इन सब पर लिखा है।

प्रश्न: आपके लेखन में विभिन्न विधाओं का समावेश है, एक तरफ टैक्स पर किताबें लिखते है, लॉ पर लिखते हैं वहीं दूसरी ओर ये नाट्यशास्त्र ये कैसे संभव हो पाया?

जिसके हाथ जितने लंबे होंगे, उतना ही रेलेगा। कंपनी एक्ट पर काम किया, तो टैक्स पर किताबें लिखने में आसानी हो गई। आपको बता दूं, ए रमैया नाम से किताब है। इस किताब में 13,000 पेज हैं। इस किताब के करीब 4,500 पेज मैंने लिखे हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश कंपनी लॉ पर कोई किताब देखेगा तो इसी को देखेगा। यह कंपनी लॉ में बाइबिल कहलाती है।

प्रश्न: आपका प्रकाशन जगत में कैसे आना हुआ?

देखो मैं लिखता हूं कविता। कविता कोई छापता नहीं, कहते हैं कि बिकती नहीं। तो हमने कहा कि कोई नहीं छापेगा तो कैसे चलेगा। हमने छापना शुरू कर दिया। पिछले छह-साढ़े छह साल में 1,300 किताबें छापी हैं। चित्रा मुद्गल, रामदरश मिश्र, ममता कालिया, और जितने तमाम स्टार लेखक है, उन सबकी किताबें हमने छापी हैं।

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प्रश्न: आप लेखक हैं और प्रकाशक भी। अक्सर लेखक और प्रकाशक के बीच विवाद के किस्से आते रहते हैं। आप इसे किस नजरिए से देखते हैं?

सबसे बड़ा लांछन लगाने वाला है तो वह है लेखक। प्रकाशक तो बिजनेस करने आया है। चार पैसे कमाएगा, चार नहीं तो दो कमाएगा। एक कमाएगा। कमाने की कोशिश करेगा तो मुफ्त में क्यों छापे किताब? आप अपने पैसे से छपवा के कुछ भी कीजिए या मुझे ऑर्डर दिला दिजिए। एडवांस में ऑर्डर दिला दिया तो आपकी किताब छाप देंगे। किताब पर दस-बारह हजार खर्चा हो रहा है तो मैं क्यों करूंगा? दूसरी चीज किताब में क्या लिखा है, आप जानो। उसका फायदा क्या होगा, आप जानो।

आपको बता दूं लेखन की दुनिया में लेखक को बहुत फायदे होते हैं, लेखक को पहला फायदा होता है जब वह कॉपी में शुरू करने के लिए ऊं लिखता है। उसे हर्ष प्राप्त होता है । दूसरा जब वह किताब लिख लेता है। टाइप कराकर पांडुलिपि तैयार करा लेता है तो वह खुश होता है। किताब तैयार हो गई। वह खुश होता है जब कोई प्रकाशक मिल गया, तब वह खुश होता है। प्रकाशक जब फॉरमेटिंग करके किताब भेजता है तब वह खुश होता है। जब फाइनल अप्रूवल के लिए किताब आती है तो वह खुश होता है और किताब छप जाती है तो वह खुश होता है। उसे पांच प्रतियां मुफ्त में मिल जाती हैं तो उसे खुशी होती है। लेखक को कितने मौके मिलते हैं खुश होने के।

अब प्रकाशक की बात करते हैं, उसे पांडुलिपि मिली। उसने जवाब नहीं दिया तो झाड़ खाएगा। फॉरमेटिंग में देर हुई तो झाड‍़ खाएगा। करेक्शन में कोई चीज रह गई तो झाड़ खाएगा। कवर में कोई गलती हुई तो झाड़ खाएगा। तो उसका काम है हर मौके पर झाड़ खाना।

एक दिन एक सभा में मैंने पूछा कि प्रकाशक बहुत चोर होते हैं। आपका पैसा खा जाते हैं लेकिन यह बताओ कि जब आपकाे एक लाख का पुरस्कार मिलता है तो आप उसे हजार रुपए भी देने जाते हैं। तेरह लाख का पुरस्कार मिलता है तो आप उसे तेरह पैसे भी देने जाते हैं। उसका भी तो किताब में दिल-दिमाग लगा है। उसने किताब को किताब बनाया। कभी किसी ने दो रुपए भी दिए काम के। प्रकाशक और लेखक दोनों अपनी जगह ठीक हैं। दोनों को मिलकर रास्ता निकालना पड़ेगा।

प्रश्न: पुरस्कारों को लेकर भी अक्सर विवाद होते हैं। आप पुरस्कार मिलने को कितना अहम मानते हैं?

मेरी संस्था है बीपीए फाउंडेशन। दूसरी संस्था है इंडिया नेटबुक्स। हर वर्ष मार्च के पहले सप्ताह में करीब डेढ़ सौ पुरस्कार देते हैं। हमारे पुरस्कारों को लोग लिटरेचर का फिल्मफेयर कहते हैं। क्राउन प्लाजा हमारा ऑफिशियल होस्ट है।

प्रश्न: आपने बताया कि डेढ़ सौ लोगों को पुरस्कार देते हैं तो काफी खर्चा आता होगा। उसकी व्यवस्था कैसे करते हैं?

कहां दिलजले को सुकूं चाहिए। जुनूं के लिए सिर्फ जुनूं चाहिए।

प्रश्न: आप को बहुत से पुरस्कार मिल चुके हैं। और कौन-सा पुरस्कार है जो आप चाहते हैं आपको मिले?

अभी तक 117 पुरस्कार मिल चुके हैं। लेटेस्ट जो पुरस्कार वो इंडिया बुक आफ रिकार्ड से है। जो कि सबसे अधिक किताबें लिखने और छपने के लिए मिला है। ठीक उससे पहले रामधारी सिंह दिनकर पुरस्कार था।

प्रश्न: पुरस्कार से लेखक की सृजनात्मकता पर क्या प्रभाव पड़ता है?

आंखें खुल जाती हैं। आंखें खोलने के लिए पढ़ना पढता है। आप पढ़ते हो तो ज्ञान की प्राप्ति होती है। फिर आंखें खुल जाती हैं तो आप लिखने लगते हो। दूसरे को दिखाने लगते हो। धीरे-धीरे आप बोद्धिवृक्ष के नीचे पहुंच जाते हैं।

प्रश्न: नौकरी, लेखन, प्रकाशन के अलावा पारिवारिक दायित्व भी आप निभा रहे हैं और समाज सेवा भी कर रहे हैं। इस सब में आप कैसे सामंजस्य बिठाते हैं?

एक तो होता कि आप एक काम कर रहे हैं, जब एक काम करते-करते दूसरे काम पर जाते हैं तो गैप हो जाता है, जिसको ब्रीदिंग करना कहते है। आप का समय खराब नहीं होता। होता यह है कि लिखने का मूड है तो टेबल पर बैठा, किताब चारों ओर रख लेते हैं। उसके बाद लिखना शुरू करता हूं। तब तक पीछे से वाइफ चिल्लाती है कि धनिया लेते आना। धनिया लेकर नहीं आया। अभी लेकर आया, धनिया लेने चला गया। लौटा तो कनेक्शन टूट गया। उस दिन की लिखाई छूट गई।
ऐसी छोटी-छोटी रुकावट भी बहुत आती हैं। वातावरण नहीं मिलता। हम तो एक कमरे में बैठकर लिखते हैं। दिन में लिखते हैं, रात में भी लिखते हैं। और देश्र रात में भी लिखते हैं। रात में नींद खुल जाती है तो भी लिखने लगते हैं। नींद आती है तो फिर सो जाते हैं। दूसरी चीज है कि हम व्यवस्थित ढंग से लिखते हैं।

मैं एक साथ कई किताबों पर काम कर रहा होता हूं। इसका फायदा होता है कि समय बरबाद नहीं होता। एक किताब कविता की चल रही है। एक कहानी और एक आलोचना की। लैपटाप में सारी फाइलें हैं। कविता लिखने बैठे हैं तो मूड झटक गया तो कविता लिख नहीं सकते। दूसरी किताब पर काम करने लगे। जीवनी लिखने लगे। इस समय दस किताबें चल रही हैं। जिस किताब में जब मन लगा, काम करने लगा । खाली समय नहीं होता। आप लिख रहे हैं तो एक किताब लिख रहे हैं। मूड ऑफ है तो एक सप्ताह तक नहीं लिखा। पूरा सप्ताह खराब चला गया। मजे की बात यह है कि आज का दौर डिजिटल युग है। हर तरफ सूचनाएं उपलब्ध हैं। उन्हें ढूंढिए और उन्हें अपने हिसाब से बैठाइए।

प्रश्न: आप अपने प्रकाशन से नए लेखकों को किस तरह प्रोत्साहित करते हैं?

हमारा कैनवास काफी बड़ा है। हम लेखक के तौर पर समझते हैं कि क्या अच्छाई है, क्या बुराई है। इसे दूसरे लेखकों पर भी लागू कर सकते हैं। समझ सकते हैं कि उसकी पीड़ा क्या है। इसीलिए हम स्टैंडर्ड तरीके से किताबें छाप देते हैं। ज्यादा पैसे नहीं लेते हैं कि चालीस हजार दे जाओ, तीस हजार दे जाओ। हमने लिख रखा है 2 रुपए पेज कॉस्टिंग आती है। कम से कम तीस किताबें लेनी होंगी। दूसरी जगह आदमी बीस हजार रुपए में किताबें छपवा रहा है तो हमारे यहां दस-बारह हजार में छप जाएगी। यह नए लेखकों के लिए आसान काम हो जाता है।
हम बच्चों की किताबें बड़े प्रेम से छापते हैं। हमारे सबसे छोटे लेखक की उम्र छह साल है। छह से सोलह साल तक के बच्चों की किताबें हम प्राथमिकता से छापते हैं। ऐसी बारह-पंद्रह किताबें छाप चुके हैं। बच्चों की प्रतिभा को सामने ला रहे हैं।

प्रश्न: प्रेमचंद ने कहा कि था लेखक समाज का अगुवा होता है। इस संदर्भ में समकालीन लेखन की भूमिका को कैसे देखते हैं?

मेरा सोचना है कि लेखक जो अभिव्यक्ति कर रहा है वह उसकी निजी सोच है। उस निजी सोच के साथ लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए। उसकी सोच का विश्लेषण कीजिए- सार-सार को राखिए, थोथा दीजे उड़ाए।
सबकुछ तो अच्छा रविन्द्र नाथ टैगोर ने भी नहीं लिखा था, जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। किसी को एक ही जन-गण-मन लिखने से नोबेल मिल जाता है। किसी को किताबें-दर-किताबें लिखने से भी कुछ नहीं मिलता है।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी एक कहानी- उसने कहा था- लिखकर अमर हो जाते हैं। कुछ लोग इतनी कहानियां लिखते हैं कि उनकी कहानी खुद कहानी बन जाती है। कुछ वक्त के हिसाब से होता है कुछ किस्मत के हिसाब से। तीसरी बात है कि कौन सी घड़ी में किताब निकली। ज्योतिष भी काम करता है।

प्रश्न: एक बड़ा वर्ग है जो ज्योतिष और वास्तुशास्त्र को नकारता है। आप इसे कैसे देखते हैं?

ज्योतिष को लबादा नहीं कह सकते। आप ओढ़ लोगे तो सबकुछ ठीक हो जाएगा। ज्योतिष एक मार्गदर्शक विधा है जो आपको यह बताती है कि आने वाला समय खराब है। आप बदल तो सकते नहीं जो कहते हैं बदल देंगे, वह बकवास है। गड्ढे में गिरना-ही-गिरना है तो क्या करोगे। कुछ तो उपाय करना ही पड़ेगा। आप हाथ-पैर बचाकर धीरे से लुढ़क जाओगे, जिससे कम-से-कम चोट आए। न बताओ तो आप फटाक से गिर गए और हाथ-पैर टूट गए।

प्रश्न: आपकी कौन-सी किताब आने वाली है। आप आजकल किस विषय पर लिख रहे हैं?
मैं ‘हिंदी साहित्य का बृहत्तर इतिहास’ लिख रहा हूं। इसमें हिंदी साहित्य के प्रारब्ध से लेकर अब तक का सारा ब्यौरा होगा। अब तक हमने 1,582 पन्ने लिख लिए हैं।

प्रश्न: आप की कितनी किताबें प्रकाशित हो गई हैं?

296 , और तीस किताबों पर काम चल रहा है।

प्रश्न: रचनाकार का चरित्र और उसका लेखन विवाद का विषय है। कुछ कहते हैं कि लेखन पर बात करो, चरित्र कुछ भी हो सकता है। कई लोगों का मानना है कि चरित्र खराब है तो उसका लेखन कैसे महान हो सकता है?

मैं मानता हूं कि अभिव्यक्ति और सोच में एकरूपता जरूरी नहीं है। आप कह सकते हैं कि आपकी सोच की छाया कभी-कभी अभिव्यक्ति पर आ सकती है। किसी रचनाकार के चरित्र और रचना में घालमेल नहीं कर सकते। हो सकता है कि कुछ अंश आ गए हों, हो सकता है कि न भी आएं। खराब चरित्र का आदमी भी अच्छा लिख सकता है।

प्रश्न: आपके बचपन का कोई रोचक प्रसंग, जो आपको अब भी याद आता हो।

एक छोटी-सी घटना अक्सर याद आती है। उस वक्त मेरी उम्र करीब बारह साल थी। ठंड के दिन थे। शाम को चार बजे माता जी ने तैयार किया। बंद गले का कोट पहनाया। जूते-मोजे पहनाए और बोलीं, ‘जाओ खेल आओ।’ मैं खेलने गया। बाहर हल्की- हल्की हवा चल रही थी। सामने वाले घर में एक पेड़ था। उसके पत्ते जोर-जोर से हिल रहे थे। मुझे लगा कि इसे जाड़ा लग रहा है। मैंने कोट उतारा और उसे पहना दिया। घर में आए तो धुनाई हुई। जाकर कोट लाया ।

प्रश्न: आपका कार्यक्षेत्र बड़ा विस्तृत है। इसमें पारिवारिक सहयोग, खासकर पत्नी का कितना रहा?

पत्नी का सहयोग न हो तो आदमी कुछ नहीं कर सकता।

प्रश्न: आप अपनी कामयाबी का कितना श्रेय अपनी पत्नी को देंगे?

(हंसते हुए)। पचास प्रतिशत से अधिक नहीं दूंगा। हम जो पुण्य करते हैं, आधा तो उसका भी पत्नी को चला जाता है।