नई दिल्ली: भारत–अमेरिका व्यापार समझौते (India–US Trade Deal) को लेकर उठे विवाद पर विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के उस बयान को भारत ने खारिज कर दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से व्यक्तिगत रूप से फोन पर बात न करने के कारण द्विपक्षीय व्यापार समझौता अटक गया। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि दोनों नेताओं के बीच संवाद की कोई कमी नहीं रही है और 2025 में अब तक दोनों के बीच कई बार बातचीत हो चुकी है।
MEA का आधिकारिक बयान
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच संबंध हमेशा से दोस्ताना और आपसी सम्मान पर आधारित रहे हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2025 में अब तक दोनों नेताओं के बीच आठ बार फोन पर बातचीत हो चुकी है। ऐसे में यह कहना कि व्यक्तिगत संवाद की कमी के कारण व्यापार समझौता रुका हुआ है, तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक है।
रणधीर जायसवाल ने कहा,
“प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने हमेशा कूटनीतिक मर्यादाओं का पालन करते हुए एक-दूसरे से संवाद किया है। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर पिछले साल फरवरी से कई दौर की बातचीत हुई है और दोनों पक्ष एक संतुलित तथा पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौते के काफी करीब हैं।”
हॉवर्ड लुटनिक के बयान से बढ़ा विवाद
दरअसल, अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान दावा किया था कि भारत–अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Bilateral Trade Agreement – BTA) इसलिए अटक गया क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अंतिम रूप देने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप को व्यक्तिगत रूप से फोन नहीं किया। लुटनिक के अनुसार, “सब कुछ तैयार था, बस प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति को कॉल करना था। लेकिन वे ऐसा करने में असहज थे, इसलिए कॉल नहीं हुई।”
उनकी इस टिप्पणी ने राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, जिसके बाद भारत की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई।
टैरिफ और रूस से तेल आयात बना पृष्ठभूमि
लुटनिक का बयान ऐसे समय आया है, जब राष्ट्रपति ट्रंप प्रशासन ने भारत पर रूस से तेल आयात को लेकर दबाव बढ़ाया हुआ है। अमेरिका की ओर से संकेत दिए गए थे कि यदि भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद कम नहीं की, तो भारतीय उत्पादों पर टैरिफ और बढ़ाए जा सकते हैं। पिछले वर्ष अगस्त में ट्रंप प्रशासन ने भारतीय आयात पर कुल 50 प्रतिशत शुल्क लगा दिया था, जिसमें रूस से तेल खरीद के जवाब में लगाया गया 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क और 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ शामिल था।
इन फैसलों के चलते दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में कुछ तनाव जरूर देखने को मिला, लेकिन भारत का कहना है कि बातचीत का रास्ता कभी बंद नहीं हुआ।
व्यक्तिगत कूटनीति बनाम संस्थागत संवाद
हाल के महीनों में यह भी चर्चा रही कि भारत अपने कृषि क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए पूरी तरह खोलने में संकोच कर रहा है। हालांकि, अमेरिकी पक्ष की ओर से यह संकेत दिया गया कि असली चुनौती नीतिगत नहीं, बल्कि व्यक्तिगत कूटनीति की रही है। इस बीच, उस समय तनाव और बढ़ गया जब प्रधानमंत्री मोदी ने भारत–पाकिस्तान युद्धविराम में अमेरिकी मध्यस्थता के दावे या राष्ट्रपति ट्रंप की नोबेल शांति पुरस्कार दावेदारी का समर्थन नहीं किया।
भारत का स्पष्ट रुख
भारत सरकार ने पूरे विवाद पर अपनी स्थिति दोहराते हुए कहा है कि वह अमेरिका के साथ एक ऐसे व्यापार समझौते के लिए प्रतिबद्ध है, जो संतुलित, न्यायसंगत और दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखने वाला हो। विदेश मंत्रालय का कहना है कि भारत और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं और किसी भी समझौते को केवल राजनीतिक दबाव या एकतरफा शर्तों पर अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता।
MEA के अनुसार, बातचीत जारी है और आने वाले समय में दोनों देश व्यावहारिक समाधान की ओर बढ़ सकते हैं।

