Gaza Crisis: गाज़ा में जारी संघर्ष और विनाश के बीच पाकिस्तान इस स्थिति को अपने लिए रणनीतिक अवसर के रूप में देख रहा है। इस्लामाबाद न केवल गाज़ा को “स्थिर” करने के लिए प्रस्तावित इंटरनेशनल स्टैबलाइजेशन फोर्स (ISF) में शामिल होना चाहता है, बल्कि वह इस बल की कमान भी अपने हाथ में लेने की तैयारी कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान चाहता है कि इस अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन का नेतृत्व एक वरिष्ठ पाकिस्तानी जनरल करे — यानी यदि गाज़ा में शांति सेना जाती है, तो उसका नियंत्रण पाकिस्तान के पास हो।
पाकिस्तान की शर्तें
पाकिस्तान ने साफ कर दिया है कि उसकी भागीदारी कुछ शर्तों पर ही संभव है। सबसे अहम शर्त यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टू-स्टेट सॉल्यूशन को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की गारंटी दी जाए।
इसके साथ ही पाकिस्तान ने यह भी कहा है कि उसकी भूमिका केवल शांति और स्थिरता बनाए रखने तक सीमित रहेगी; वह न तो आक्रामक सैन्य कार्रवाई करेगा और न ही हथियारों की जब्ती जैसे कदम उठाएगा।
सूत्र बताते हैं कि पाकिस्तान अमेरिका के अलावा सऊदी अरब, यूएई, कतर और मिस्र जैसे देशों से भी सामूहिक समर्थन चाहता है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान ने इस मिशन के बदले लंबी अवधि के आर्थिक और सुरक्षा पैकेज की मांग भी रखी है।
अमेरिका से क्या चाहता है इस्लामाबाद?
गाज़ा मिशन के बहाने पाकिस्तान, अमेरिका से पुराने फायदे वापस पाना चाहता है। उसने वाशिंगटन से अपने ‘मेजर नॉन-नाटो एलाय’ (MNNA) स्टेटस की बहाली की मांग की है — एक ऐसा दर्जा जो 2004 में मिला था और जिससे उन्नत हथियारों व सैन्य सहयोग तक पहुंच आसान हो जाती थी। पिछले कुछ वर्षों में यह सहयोग काफी कमजोर पड़ा है।
इस मुद्दे पर पाकिस्तानी और अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के बीच लगातार बातचीत चल रही है। माना जा रहा है कि जल्द ही पाक सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की मुलाकात अमेरिकी सेंटकॉम कमांडर से हो सकती है, जबकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की संभावित पाकिस्तान यात्रा को लेकर भी चर्चा तेज है।
इज़रायल और भारत की वजह से सुरक्षा आश्वासन
इस पूरे प्रस्ताव का एक संवेदनशील पहलू यह है कि पाकिस्तान ने मिशन का हिस्सा बनने से पहले इज़रायल से सुरक्षा आश्वासन मांगा है। वजह बताई जा रही है — इज़रायल और भारत के मजबूत रणनीतिक संबंध।
पाकिस्तान चाहता है कि ISF के लिए एक संयुक्त कोऑर्डिनेशन हेडक्वार्टर बनाया जाए, जिसमें अमेरिका, इज़रायल और अन्य बड़े देशों की भागीदारी हो।
मध्य-पूर्व में प्रभाव बढ़ाने की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि गाज़ा को लेकर पाकिस्तान की यह सक्रियता उसके बड़े राजनीतिक और सैन्य एजेंडा का हिस्सा है — जिसके जरिए वह खुद को फिर से मध्य-पूर्व में एक प्रभावशाली भूमिका में स्थापित करना चाहता है। हाल के महीनों में पाक सेना प्रमुख की सऊदी अरब, जॉर्डन, मिस्र और लीबिया यात्राओं को भी इसी रणनीति से जोड़ा जा रहा है।
फिलहाल बातचीत शुरुआती दौर में है, पर इतना तय है कि गाज़ा संकट के मुद्दे पर पाकिस्तान अब केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि नेतृत्व और सौदेबाज़ी की राजनीति खेल रहा है।

