सऊदी–पाक करार की हकीकत: पाकिस्तान के लिए बोझ, भारत के लिए भरोसा

सऊदी–पाक करार की हकीकत: पाकिस्तान के लिए बोझ, भारत के लिए भरोसा
सऊदी–पाक करार की हकीकत: पाकिस्तान के लिए बोझ, भारत के लिए भरोसा

नई दिल्ली पाकिस्तान इन दिनों जिस तथाकथित “रणनीतिक रक्षा समझौते” का बखान कर रहा है, उसकी असलियत उससे बिल्कुल अलग है। इस्लामाबाद इसे ऐसे पेश कर रहा है जैसे सऊदी अरब ने भारत के खिलाफ उसकी सुरक्षा गारंटी ले ली हो। पाकिस्तानी मीडिया यहां तक दावा कर रहा है कि अगर जंग छिड़ी तो रियाद के F-15 और यूरोफाइटर उसके लिए आकाश से बरसेंगे। हकीकत यह है कि यह करार न भारत के खिलाफ है और न ही सऊदी अरब अपने बहुआयामी रिश्ते भारत के साथ दांव पर लगाएगा। इसका असली संदर्भ पश्चिम एशिया की राजनीति और इस्लामी दुनिया के भीतर संतुलन साधने से जुड़ा है।

भारत–सऊदी रिश्तों की गहराई

भारत और सऊदी अरब का रिश्ता केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा, व्यापार और मानव संसाधन जैसे महत्वपूर्ण स्तंभों पर खड़ा है। वित्त वर्ष 2024–25 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 41.88 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जिससे भारत रियाद का दूसरा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार बन चुका है। इसके मुकाबले पाकिस्तान–सऊदी व्यापार महज 3–4 अरब डॉलर के आसपास है। यह अंतर ही बता देता है कि सऊदी अरब के लिए वास्तविक प्राथमिकता कौन है।

असली चिंता: इज़राइल, भारत नहीं

इस समझौते का असली केंद्र भारत नहीं बल्कि इज़राइल है। ग़ज़ा और क़तर पर हालिया इज़राइली हमलों ने अरब देशों को गहरी असुरक्षा में डाल दिया है। अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहने को लेकर झिझकते हुए सऊदी अब एक “मुस्लिम छत्रछाया” तलाश रहे हैं। पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से रियाद की रुचि का विषय रहा है और माना जाता है कि इसके लिए सऊदी ने कभी वित्तीय मदद भी दी थी। यही कारण है कि यह करार रियाद की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह इज़राइल के संभावित खतरे के जवाब में मुस्लिम दुनिया की एक परमाणु शक्ति को अपने साथ दिखाना चाहता है।

भारत के लिए यह परिदृश्य चुनौतीपूर्ण नहीं है। भारत–इज़राइल रक्षा साझेदारी लगातार मज़बूत हो रही है और ऊर्जा व निवेश के मोर्चे पर भारत सऊदी का सबसे भरोसेमंद भागीदार है।

पाकिस्तान के लिए संभावित उलझन

दिलचस्प यह है कि यह करार पाकिस्तान के लिए सुरक्षा से ज्यादा बोझ बन सकता है। यदि “एक पर हमला = दोनों पर हमला” की शर्त वाकई लागू होती है, तो पाकिस्तान को उन क्षेत्रीय संघर्षों में उतरना पड़ेगा जिनसे उसका सीधा संबंध नहीं है। ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों द्वारा सऊदी पर किए जा रहे मिसाइल और ड्रोन हमले अब पाकिस्तानी सैनिकों की जिम्मेदारी भी बन सकते हैं।

2015 में जब यमन युद्ध के लिए सैनिक भेजने से पाकिस्तान ने इनकार किया था, तो रियाद–इस्लामाबाद रिश्तों में खटास आ गई थी। इस बार अगर दबाव पड़ा, तो पाकिस्तान के पास ‘ना’ कहने का विकल्प शायद ही बचे।

भारत का संतुलित रुख

नई दिल्ली ने पूरे घटनाक्रम पर संयमित प्रतिक्रिया दी है। भारत भली-भांति समझता है कि यह करार प्रतीकात्मक है और सऊदी अरब का वास्तविक झुकाव उसकी उभरती अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव की तरफ है। ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और सुरक्षा साझेदारी में भारत सऊदी अरब का अपरिहार्य साथी है।

सऊदी की रणनीति स्पष्ट है—पाकिस्तान से धार्मिक और ऐतिहासिक जुड़ाव बनाए रखना, लेकिन असली दांव भारत पर लगाना। यही कारण है कि रियाद बार-बार यह संदेश देता है कि भारत के साथ उसके रिश्ते प्राथमिकता में हैं।

पाकिस्तान की ‘काल्पनिक जीत’

पाकिस्तान इस करार को चाहे जितना बढ़ा-चढ़ाकर पेश करे, यह उसके लिए सुरक्षा गारंटी नहीं बल्कि एक नई जिम्मेदारी है। न यह भारत को चुनौती देता है और न ही दक्षिण एशिया की शक्ति संतुलन की तस्वीर बदलता है।

भारत की आर्थिक ताक़त, वैश्विक साझेदारियाँ और रणनीतिक महत्व पाकिस्तान के इस “नाटो-स्टाइल सपने” से कहीं आगे खड़े हैं। सच यही है कि सऊदी अरब का भरोसा और निवेश भारत के साथ ही टिकेगा—आज भी और भविष्य में भी।