Kerala Kumbh Mela: 250 साल बाद केरल में लौटा दक्षिण का कुंभ, महामाघ महोत्सवम

Kerala Kumbh Mela
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Kerala Kumbh Mela: रात के अंधेरे में टिमटिमाते दीप, गूंजते वैदिक मंत्र और पवित्र नदी में आस्था की डुबकी लगाते हजारों श्रद्धालु—यह दृश्य किसी उत्तर भारतीय तीर्थ का नहीं, बल्कि केरल के महामाघ महोत्सवम का है, जिसे अब “दक्षिण भारत का कुंभ मेला” कहा जा रहा है। करीब 250 साल बाद यह ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन एक बार फिर “भगवान की अपनी धरती” केरल में जीवंत हो उठा है।

इस भव्य मेले का शुभारंभ 18 जनवरी को भरतपुझा नदी के तट पर हुआ। भरतपुझा को ‘दक्षिण गंगा’ और ‘नीला’ नाम से भी जाना जाता है। उत्तर भारत के कुंभ मेले से प्रेरित यह आयोजन 18 दिनों तक चलेगा और अब तक दसियों हजार श्रद्धालु यहां पहुंच चुके हैं।

चुनाव से पहले आयोजन, सियासी चर्चाएं तेज

केरल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस मेले के आयोजन ने राजनीतिक हलकों में भी चर्चा बढ़ा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आयोजन सत्तारूढ़ लेफ्ट फ्रंट सरकार की ओर से एक ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ संदेश भी हो सकता है, खासकर तब जब कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूडीएफ से कड़ी चुनौती मिल रही है। हालांकि सरकार इसे पूरी तरह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयोजन बता रही है।

केरल कुंभ की वापसी कैसे हुई

इस ऐतिहासिक महायज्ञ को दोबारा शुरू करने का श्रेय स्वामी आनंदवन भारती महाराज को जाता है। खास बात यह है कि वे कभी CPI(M) की छात्र इकाई से जुड़े रहे हैं और आज जुना अखाड़ा के वरिष्ठ संत हैं। प्रयागराज कुंभ के दौरान उन्हें दक्षिण भारत का महामंडलेश्वर नियुक्त किया गया था। उसी दौरान उन्होंने केरल में भी इस तरह के विशाल धार्मिक आयोजन की आवश्यकता पर जोर दिया।

इस आयोजन के प्रमुख संरक्षकों में माता अमृतानंदमयी (अम्मा) और केरल के देवस्वम मंत्री वी.एन. वासवन शामिल हैं। सरकार और संत समाज के संयुक्त प्रयासों से इसकी तैयारी पिछले दो वर्षों से चल रही थी।

राज्यपाल ने किया औपचारिक उद्घाटन

18 जनवरी को केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने पारंपरिक ध्वज फहराकर मेले का उद्घाटन किया। यह ध्वज अंगदिप्पुरम अलीपरंबा कलारी से भव्य जुलूस के साथ लाया गया था। अपने संबोधन में राज्यपाल ने कहा कि यह आयोजन सनातन धर्म की जीवंत परंपरा को पुनर्जीवित करता है और इसे किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं देखा जाना चाहिए।

250 साल पहले क्यों बंद हुआ था यह आयोजन

यह मेला ऐतिहासिक मामनकम मैदान में आयोजित किया जा रहा है। मध्यकाल में यहां हर 12 साल में भव्य उत्सव हुआ करता था, जिसमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम और युद्ध कौशल प्रदर्शन भी होते थे। लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान इस परंपरा को बंद कर दिया गया।

स्वामी आनंदवन भारती के अनुसार, “करीब 270 साल पहले अंग्रेजों ने इस आयोजन को रोक दिया था। आज़ादी के बाद कुछ बार इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश हुई, लेकिन निरंतरता नहीं बन पाई।” प्रयागराज महाकुंभ के बाद ही इसे दोबारा बड़े स्तर पर आयोजित करने का निर्णय लिया गया।

भरतपुझा तट पर हर शाम ‘नीला आरती’

हर शाम सूर्यास्त के बाद भरतपुझा नदी का किनारा भक्ति और रोशनी से जगमगा उठता है। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारी यहां ‘नीला आरती’ करते हैं, जो गंगा आरती की तर्ज पर आयोजित होती है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने इसे भावुक कर देने वाला क्षण बताया।

सुरक्षा और व्यवस्थाएं

केरल सरकार ने आयोजन के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं—

  • 300 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात

  • बम निरोधक दस्ते की मौजूदगी

  • यज्ञ स्थल में प्रवेश से पहले सघन जांच

  • KSRTC की 100 से ज्यादा विशेष बस सेवाएं

  • वाराणसी और ऋषिकेश से एर्नाकुलम तक विशेष ट्रेनें

अस्थायी पुल को लेकर विवाद

आयोजन से पहले अस्थायी पुल के निर्माण को लेकर विवाद भी सामने आया। राजस्व विभाग द्वारा काम रोके जाने पर आयोजकों ने साजिश का आरोप लगाया। बीजेपी नेता कुम्मनम राजशेखरन ने कहा कि बिना चेतावनी काम रोकना श्रद्धालुओं का मनोबल तोड़ने की कोशिश है। चुनाव नजदीक होने के कारण बाद में सरकार ने हस्तक्षेप कर पुल निर्माण की अनुमति दे दी।

करीब ढाई शताब्दियों बाद लौटा यह कुंभ अब केरल की धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन चुका है।