Nandan Nilekani Exam Reform Panel: नंदन नीलेकणि से पूर्व ISRO और IB चीफ तक, आखिर इतनी अलग क्यों है सरकार की यह कमेटी?

Nandan Nilekani
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Nandan Nilekani Exam Reform Panel: NTA और देश की परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बनी छह सदस्यीय हाई-पावर्ड टास्क फोर्स में नंदन नीलेकणि के साथ पूर्व ISRO प्रमुख एस. सोमनाथ, पूर्व IB निदेशक तपन डेका, IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को जगह दी गई है। इसकी बनावट बताती है कि सरकार पेपर लीक को अब केवल शिक्षा व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि तकनीक, सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स और प्रशासन से जुड़ी चुनौती के रूप में भी देख रही है।

देश की परीक्षा व्यवस्था पर लंबे समय से उठ रहे सवाल अब एक नए मोड़ पर पहुंच गए हैं। पेपर लीक और परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के खिलाफ चले छात्र-युवा आंदोलन के बीच 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। इसके अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी NTA से जुड़ी परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए छह सदस्यीय हाई-पावर्ड टास्क फोर्स की घोषणा की। इस टास्क फोर्स की कमान Infosys के सह-संस्थापक और Aadhaar परियोजना से जुड़े नंदन नीलेकणि को सौंपी गई है। लेकिन इस कमेटी की सबसे दिलचस्प बात केवल इसके अध्यक्ष नहीं हैं। इसमें पूर्व ISRO प्रमुख एस. सोमनाथ हैं, पूर्व Intelligence Bureau निदेशक तपन डेका हैं, IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि हैं, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल हैं और प्रशासन तथा लॉजिस्टिक्स का लंबा अनुभव रखने वाले पूर्व IAS अधिकारी अमृत लाल मीणा भी शामिल हैं। यानी यह किसी पारंपरिक ‘शिक्षा सुधार समिति’ जैसी दिखाई नहीं देती। सवाल है—परीक्षाओं को सुधारने के लिए अंतरिक्ष वैज्ञानिक, खुफिया अधिकारी, टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ की जरूरत क्यों पड़ी? इस सवाल का जवाब ही शायद यह बताता है कि सरकार परीक्षा और पेपर लीक की समस्या को अब किस नजर से देख रही है।

Nandan Nilekani को ही Exam Reform Panel की कमान क्यों?

नंदन नीलेकणि का नाम भारत के सबसे बड़े डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में गिना जाता है। वह Infosys के सह-संस्थापक हैं और 2009 से 2014 तक Unique Identification Authority of India यानी UIDAI के संस्थापक अध्यक्ष रहे। उनके कार्यकाल में Aadhaar जैसी विशाल डिजिटल पहचान परियोजना ने आकार लिया। अब परीक्षा सुधार समिति में उनकी भूमिका को इसी अनुभव के संदर्भ में समझना होगा। देश की बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में सुरक्षा का सवाल केवल परीक्षा केंद्र पर निगरानी तक सीमित नहीं है। प्रश्नपत्र तैयार होने से लेकर उसके सुरक्षित भंडारण, डिजिटल ट्रांसमिशन, एक्सेस कंट्रोल, उम्मीदवारों की पहचान और परीक्षा के बाद डेटा की सुरक्षा तक पूरी श्रृंखला महत्वपूर्ण होती है। यदि इस श्रृंखला की किसी एक कड़ी में कमजोरी है तो पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

नीलेकणि का अनुभव बड़े पैमाने पर ऐसे डिजिटल सिस्टम तैयार करने में रहा है जिन्हें करोड़ों लोगों के स्तर पर काम करना होता है। इसलिए NTA के भविष्य के डिजिटल ढांचे, सुरक्षित परीक्षा प्रणाली और बड़े स्तर पर technology-driven reforms तैयार करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। उनकी नियुक्ति का एक राजनीतिक पहलू भी है। नीलेकणि ने UPA सरकार के दौरान UIDAI का नेतृत्व किया था और अब NDA सरकार ने उन्हें इस महत्वपूर्ण टास्क फोर्स की जिम्मेदारी दी है। इससे कमेटी को एक हद तक राजनीतिक सीमाओं से परे स्वीकार्यता मिलने की संभावना भी बनती है।

पूर्व ISRO चीफ S. Somanath परीक्षा सुधार समिति में क्यों?

पहली नजर में सवाल स्वाभाविक है—अंतरिक्ष कार्यक्रम चलाने वाले वैज्ञानिक का परीक्षा व्यवस्था से क्या संबंध? लेकिन एस. सोमनाथ की विशेषज्ञता को केवल रॉकेट और अंतरिक्ष मिशनों तक सीमित करके देखना शायद सही नहीं होगा। एस. सोमनाथ जनवरी 2022 से जनवरी 2025 तक ISRO के अध्यक्ष रहे। उनके कार्यकाल में अगस्त 2023 में Chandrayaan-3 की ऐतिहासिक सफलता मिली और भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सफल सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला पहला देश बना। ISRO जैसे संस्थान के बड़े मिशन अत्यंत जटिल तकनीकी प्रणालियों, सुरक्षा प्रोटोकॉल, संवेदनशील डेटा, सीमित एक्सेस, कई स्तरों की निगरानी और बेहद अनुशासित संचालन पर निर्भर करते हैं। राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा व्यवस्था में भी समस्या कुछ हद तक इसी तरह की है। लाखों उम्मीदवारों के लिए तैयार प्रश्नपत्र को सही समय तक गोपनीय रखना, हजारों परीक्षा केंद्रों तक सुरक्षित पहुंचाना और पूरी प्रक्रिया में यह पता लगाने योग्य व्यवस्था रखना कि किस व्यक्ति या सिस्टम ने कब संवेदनशील सामग्री तक पहुंच बनाई—यह अपने आप में एक बड़े secure operation जैसा है। यही वजह है कि सोमनाथ का अनुभव परीक्षा प्रणाली की operational integrity मजबूत करने में उपयोगी हो सकता है।

पूर्व IB Director Tapan Deka की नियुक्ति क्या संकेत देती है?

छह सदस्यीय समिति में सबसे असामान्य नामों में से एक पूर्व Intelligence Bureau प्रमुख तपन डेका का है। और शायद यही नियुक्ति इस कमेटी की प्रकृति को सबसे स्पष्ट तरीके से समझाती है। पेपर लीक को केवल कुछ छात्रों द्वारा की गई नकल या परीक्षा केंद्र की छोटी-मोटी गड़बड़ी मानकर नहीं देखा जा सकता। कई मामलों में जांच एजेंसियों के सामने ऐसे नेटवर्क और बिचौलियों की भूमिका सामने आती रही है जिनमें प्रश्नपत्र तक पहले पहुंच बनाने, उसे आगे भेजने और पैसे के बदले उम्मीदवारों तक पहुंचाने जैसी संगठित गतिविधियां शामिल होती हैं। ऐसी स्थिति में समस्या केवल परीक्षा प्रशासन की नहीं रह जाती। यह organised crime और intelligence gathering से जुड़ा विषय भी बन सकती है। तपन डेका का लंबा अनुभव Intelligence Bureau और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियों में रहा है। इसलिए उनकी मौजूदगी से संकेत मिलता है कि भविष्य की परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था में केवल तकनीकी सुरक्षा नहीं, बल्कि पेपर लीक नेटवर्क की पहचान, उनके आपसी संपर्कों की मैपिंग, अंदरूनी मिलीभगत की जांच और संगठित नेटवर्क को पहले ही पहचानने जैसे पहलुओं पर भी जोर दिया जा सकता है। यानी लक्ष्य केवल लीक होने के बाद आरोपी पकड़ना नहीं, बल्कि ऐसा तंत्र बनाना होना चाहिए जिसमें लीक करने वाले नेटवर्क के लिए काम करना ही बेहद कठिन हो जाए।

लाखों छात्रों की परीक्षा के पीछे छिपी Logistics की चुनौती

किसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा को हम आमतौर पर छात्र, प्रश्नपत्र और परीक्षा केंद्र के नजरिए से देखते हैं। लेकिन इसके पीछे एक विशाल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क काम करता है। प्रश्नपत्रों या अन्य संवेदनशील परीक्षा सामग्री की तैयारी, पैकेजिंग, सुरक्षित परिवहन, परीक्षा केंद्रों तक समय पर डिलीवरी, सीलबंद सामग्री की निगरानी और अधिकृत व्यक्ति द्वारा निर्धारित समय पर उसे खोलना—इनमें से प्रत्येक चरण संभावित vulnerability बन सकता है। इसीलिए टास्क फोर्स में अमृत लाल मीणा को शामिल किया जाना महत्वपूर्ण है। मीणा बिहार के मुख्य सचिव और केंद्र में कोयला सचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। उन्होंने केंद्र सरकार में लॉजिस्टिक्स से संबंधित जिम्मेदारियां भी संभाली हैं। उनका अनुभव इस सवाल का जवाब खोजने में काम आ सकता है कि परीक्षा सामग्री की supply chain को किस तरह अधिक सुरक्षित और जवाबदेह बनाया जाए। भविष्य में NEET जैसी परीक्षाओं को Computer Based Test यानी CBT मॉडल की ओर ले जाने की दिशा में काम होने पर भी लॉजिस्टिक्स खत्म नहीं होगा। उसका स्वरूप बदल जाएगा। तब सुरक्षित कंप्यूटर केंद्र, सर्वर, नेटवर्क कनेक्टिविटी, बिजली का बैकअप, उम्मीदवारों की authentication और ग्रामीण तथा छोटे शहरों में पर्याप्त डिजिटल क्षमता जैसे नए सवाल सामने आएंगे।

Anita Karwal क्यों महत्वपूर्ण हैं?

टास्क फोर्स में पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल शिक्षा प्रशासन का महत्वपूर्ण अनुभव लेकर आती हैं। वह CBSE की चेयरपर्सन भी रह चुकी हैं और बाद में स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग में सचिव रहीं। इस अनुभव की जरूरत इसलिए है क्योंकि किसी भी तकनीकी समाधान को अंततः शिक्षा और सरकारी प्रशासन के मौजूदा ढांचे में ही लागू करना होगा। एक शानदार तकनीकी मॉडल कागज पर तैयार किया जा सकता है, लेकिन असली चुनौती तब शुरू होती है जब उसे मंत्रालय, NTA, राज्य सरकारों, जिला प्रशासन, परीक्षा केंद्रों और लाखों उम्मीदवारों के स्तर पर लागू करना हो। अनीता करवाल इस अंतर को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं—policy और implementation के बीच का अंतर। IIT Madras Director V. Kamakoti क्या भूमिका निभा सकते हैं? प्रोफेसर वी. कामकोटि IIT मद्रास के निदेशक और कंप्यूटर साइंस तथा तकनीक के विशेषज्ञ हैं। यदि भविष्य की परीक्षा व्यवस्था अधिक डिजिटल और CBT आधारित होती है तो साइबर सुरक्षा इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ बन जाएगी।सवाल केवल यह नहीं होगा कि प्रश्नपत्र कंप्यूटर पर उपलब्ध है।

असल सवाल होंगे—

  • प्रश्नपत्र किस तरह encrypt होगा?
  • उसे decrypt करने की अनुमति कब और किसे मिलेगी?
  • किस सर्वर से परीक्षा केंद्र तक डेटा पहुंचेगा?
  • किसी unauthorized access की पहचान कैसे होगी?
  • सिस्टम में प्रत्येक गतिविधि का audit trail कैसे बनेगा? और लाखों उम्मीदवारों के एक साथ परीक्षा देने पर सिस्टम सुरक्षित होने के साथ स्थिर कैसे रहेगा?
  • इन सवालों के तकनीकी समाधान तैयार करने में कामकोटि की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

यह कमेटी पारंपरिक Education Reform Panel क्यों नहीं है?

इस छह सदस्यीय टीम की संरचना को एक साथ रखकर देखें तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है।

  • नंदन नीलेकणि—बड़े पैमाने की डिजिटल व्यवस्था और technology architecture.
  • एस. सोमनाथ—complex systems और operational reliability.
  • तपन डेका—intelligence और security networks.
  • वी. कामकोटि—computer science, digital systems और cybersecurity.
  • अनीता करवाल—education administration और policy implementation.
  • अमृत लाल मीणा—administration और logistics.

यानी सरकार ने परीक्षा संकट को केवल ‘शिक्षा नीति’ की समस्या मानकर विशेषज्ञ नहीं चुने हैं। इसकी संरचना से ऐसा प्रतीत होता है कि परीक्षा व्यवस्था को Technology + Security + Intelligence + Logistics + Administration + Education के संयुक्त ढांचे के रूप में देखने की कोशिश की जा रही है। यही बात इस पैनल को एक सामान्य परीक्षा सुधार समिति से अलग बनाती है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल—सिफारिशें लागू कौन करेगा?

नई कमेटी के सामने तकनीकी समाधान तलाशने से भी बड़ी चुनौती implementation की होगी। 2024 के NEET-UG विवाद के बाद सरकार ने पूर्व ISRO प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई थी। उस समिति ने राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए 101 सिफारिशें दी थीं। इनमें NTA के पुनर्गठन, परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा, राज्य और जिला प्रशासन की भागीदारी, multi-session testing, technology adoption और प्रश्नपत्रों की सुरक्षा से जुड़े कई सुझाव शामिल थे। इसके बाद इन सिफारिशों के implementation को लेकर अलग-अलग स्तर पर प्रगति के दावे किए गए, लेकिन NEET-UG 2026 से जुड़े नए विवाद ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि महत्वपूर्ण सुधार जमीन पर कितनी प्रभावी तरह से लागू हुए। यही कारण है कि नई Nilekani Task Force की सफलता का पैमाना केवल उसकी रिपोर्ट नहीं हो सकती। असल कसौटी यह होगी कि उसकी सिफारिशें कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तरीके से लागू होती हैं।

Technology अकेले Paper Leak नहीं रोक सकती

भारत की परीक्षा व्यवस्था की समस्या का समाधान केवल एक नया software या encryption system नहीं कर सकता। यदि परीक्षा केंद्र पर मिलीभगत है तो तकनीक की सीमा है। यदि संवेदनशील जानकारी तक बहुत अधिक लोगों की पहुंच है तो encryption भी पर्याप्त नहीं। यदि किसी सुरक्षा उल्लंघन का audit trail नहीं है तो दोषी तक पहुंचना मुश्किल होगा। और यदि विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें वर्षों तक फाइलों में पड़ी रहती हैं तो दुनिया की बेहतरीन तकनीक भी व्यवस्था नहीं बदल सकती। इसलिए Nilekani Task Force के सामने चुनौती केवल ‘leak-proof technology’ तैयार करने की नहीं है। उसे ऐसी परीक्षा व्यवस्था का मॉडल सुझाना होगा जिसमें technology, human accountability, intelligence, logistics और प्रशासनिक जिम्मेदारी एक-दूसरे से जुड़े हों।

NTA Exam Reforms: आगे क्या बदल सकता है?

नई टास्क फोर्स की संरचना के आधार पर आने वाले समय में परीक्षा व्यवस्था में कुछ बड़े बदलावों पर विचार होने की संभावना है—CBT का विस्तार, प्रश्नपत्रों के लिए मजबूत encryption, सीमित और traceable access, secure examination centres, उम्मीदवारों की बेहतर digital authentication, real-time monitoring और परीक्षा संबंधी संवेदनशील प्रक्रियाओं के लिए स्पष्ट accountability framework। लेकिन इनमें से कौन-से कदम अंतिम सिफारिशों में शामिल होंगे, यह टास्क फोर्स की रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल इतना जरूर है कि छह सदस्यों का चयन एक संदेश देता है—सरकार परीक्षा संकट को अब केवल शिक्षा मंत्रालय की प्रशासनिक समस्या के रूप में नहीं देख रही।

असली परीक्षा अब सरकार और NTA की

नंदन नीलेकणि, एस. सोमनाथ, तपन डेका, वी. कामकोटि, अनीता करवाल और अमृत लाल मीणा—कागज पर यह एक असाधारण टीम दिखाई देती है। इसके पास technology से लेकर intelligence और logistics से लेकर education administration तक का अनुभव मौजूद है। लेकिन भारत में परीक्षा सुधार के लिए विशेषज्ञ सुझावों की कमी शायद सबसे बड़ी समस्या कभी थी ही नहीं। सबसे बड़ी समस्या रही है—सुझावों को जमीन पर उतारना और जिम्मेदारी तय करना। इसलिए आने वाले महीनों में नजर इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि Nilekani Task Force कितने पन्नों की रिपोर्ट तैयार करती है। नजर इस पर होनी चाहिए कि उसकी सिफारिशों में से कितनी NTA की वास्तविक कार्यप्रणाली बदलती हैं। क्योंकि आखिर में परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा किसी कमेटी की घोषणा से नहीं लौटेगा। वह तभी लौटेगा जब लाखों छात्र यह भरोसा कर सकें कि जिस प्रश्नपत्र के लिए उन्होंने महीनों और वर्षों तक तैयारी की है, वह परीक्षा शुरू होने से पहले किसी और के हाथ में नहीं पहुंच सकता।