
(व्यंग्यकार लालित्य ललित से वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र प्रकाश की बातचीत)
लालित्य ललित जी नमस्कार!
नमस्ते सत्येन्द्र जी आइए …
आया तो आप ही से मिलने बतौर साहित्यकार, पर दफ्तर के गेट पर पता चला कि पहले हमें मिलना होगा हिंदी संपादक डॉ. ललित किशोर मंडोरा से। मैंने कहा, जी नहीं मुझे मिलना है श्रीमान लालित्य ललित से, जो हैं सर्वाधिक छपने वाले व्यंग्यकार। तभी मेरे साथी ने कमलेश पांडे जी से मिलाया हाथ, उन्होंने जोड़ा, कहा, आइए मंडोरा जी की कुर्सी पर वही मिलेंगे। दोनों वही हैं…सामने पहुंचे तो पता चला, हम पकड़े सही हैं।
वे हर बात में अपने ईशान कोण पर बैठे उर्दू संपादक लियाकत को बड़े सदाक़द के साथ जोड़ते थे, बिना यह विचारे कि छोटी या लंबी छोड़ते थे। हमने देखा कि वे कर सकते हैं किसी भी स्थिति, शब्द, व्यक्ति पर आशु कविता/व्यंग्य। हमने बाद परिचय के, कहा, आप कहें तो हो जाए आपके जीवन और साहित्य पर कुछ बातचीत/ सत्संग। … हां, क्षमा करें आज आप से मिलने की जो वजह थी खास, उसे तो भूल ही गया ये भुलक्कड़ प्रकाश। आपको स्वतन्त्र प्रकाशन समूह से पिछले दिनों आई आपकी ‘रचनावली’ की बधाई। आप भी अपने श्रीमुख से यह सुकार्य कर लें हरि भाई।
यों तो आप हर क्षण हैं साहित्यकार। पर फ़िर भी शुरू करते हैं उन प्रश्नों से जिनका है व्यक्तिगत जीवन से सरोकार:
– हम — जी, शुरुआत करें सवाल – जवाब की?
– ललित जी- जी, अवश्य! कृपा होगी जनाब की!
– तो बताएं, कैसा रहा आपका बचपन और प्रारंभिक जीवन?
ललित जी : मेरा बचपन आम बच्चों की तरह ही रहा; जैसे कंचे खेलना और फुटबॉल खेलना, कभी भी क्रिकेट मेरी पसंद का गेम नहीं था…
क्यों?…
वह इसलिए, कि एक बार खेलते समय किसी को बॉल लग गई थी, बस उसी दिन से क्रिकेट का साथ छोड़ दिया और फुटबॉल से नाता जोड़ लिया, पर वह भी समय के साथ पीछे छूट गया, गिल्ली डंडा भी बच्चों में खूब खेला और कंचे की वजह से एक बार खूब पिटाई भी हुई, उस समय निशाना बड़ा परफेक्ट किस्म का था।
(मैंने टोका) ‘ पिटाई के बाद?… कंचा लगभग छूट ही गया…(वे हंसते हुए बोले।)
और कलम से खेलने लगे… (हम चारों के मुंह से दांत झांकने लगे)…
मैंने मौके पर चौका लगाया, ‘ आपको गुस्सा जल्दी आता है या हँसी?’
लालित्य ललित: कहते हैं, पल में तोला और पल में माशा, वही हाल मेरा भी है। गुस्सा कम आता है और हंसने हंसाने का तो काम है अपना।…
इसी से जुड़ा अगला सवाल…रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आप कितने गंभीर और कितने हास्यप्रिय हैं?
लालित्य ललित: चेहरा गंभीर है, मैं हास्यप्रिय। जब तक शांत रहता हूं, रहता हूं, अगर कोई बेमतलब गुस्सा न दिलाए। वैसे शांत प्रवृत्ति का ही हूं, फटने का कोई शौक नहीं अनायास, मस्त रहता हूं, बिंदास। पर, मौका मिलते ही करता और कराता हूँ अट्टहास। अब अगर चेहरा चॉकलेटी न हो तो क्या फिल्म नहीं चलेगी! नवाजुद्दीन सिद्धकी को ही ले लें, बंदे की गाड़ी चल ही नहीं रही, दौड़ भी रही है।
– परिवार, रिश्तेदार और इष्ट-मित्र आपके लेखन को किस दृष्टि से देखते हैं?
लालित्य ललित: उन्हें बड़ी खुशी होती है, पहले तो घर वाले सोचते थे कि पता नहीं कागज काले करता रहता है, किसी से बात नहीं करता। लेकिन एक समय के बाद पदक, सम्मान मिलने लगे और उनके साथ धनराशि के लिफाफे ; तो घर को भी समझ आने लगा कि इसे लिखने का शौक है और यह कोई समय और कागज़ खराब नहीं करता, बल्कि उसे कीमती बनाता है।
– ललित जी, कविता तो अक्सर संवेदनशील व्यक्ति के हृदय से स्वतः फूटती जरूरत होती है उसे सिर्फ़ शब्द देने की इस कला ने, जैसा आप ने इशारा किया, धन, मान सम्मान सब दिलाया; लेकिन किसने या किन परिस्थितियों ने आपको व्यंग्य लेखन की ओर प्रेरित किया?
लालित्य ललित: ये बहुत अच्छा सवाल किया है आपने सत्येन्द्र जी! जैसा कि आपके सवाल में ही निहित है कि कला या जीवन दोनों में परिस्थितियां बड़ा मैटर करती हैं। मैं यह समझता हूं कि आपकी संगत जिस तरह के लोगों साथ होती है, आप उससे कहीं न कहीं प्रभावित होते हैं और आप उस दिशा में ही चल पड़ते है बेशक जाना न भी चाहते हों! मैंने कभी यही नहीं सोचा था कि लेखन के क्षेत्र में दखल दूंगा और यहां अपने को आजमाने आ जाऊंगा, पर आ गया और जब लोगों को मेरे व्यंग्य पसंद आने लगे, तो मैं भी डूबता गया और उसका लुत्फ़ लेने लगा। मज़ा तो तब आता है जब लोग मुझे देखते ही कह पड़ते हैं कि पांडेय जी आ गए (आपने देखा होगा कि ‘पांडे जी’ मेरे तकरीबन हर व्यंग्य के केंद्र होते हैं)। जब आपका किरदार आपसे बड़ा हो तो खुशी देखते ही बनती है, वही मेरे साथ भी हुआ और हो रहा है।
लिखने का शौक स्कूल से था, पर यह आदत बन गया जब कालेज में आया। तब से अब तक निरंतर चल रहा है मानो मैं मजदूर हूं और मुझे नई इमारत खड़ी करने का ठेका मिला हो, आप उस ‘ठेके’ की ओर मत सोचिएगा जिससे आपके चेहरे पर हँसी आ गई है, समझें भाई साहब। (फ़िर एक बार ठहाका गूंजा)…
– अच्छा, मान और मकबूलियत की बात तो हो गई लेकिन क्या कभी आपकी व्यंग्यात्मक रचनाओं से व्यक्तिगत रिश्तों पर असर पड़ा है?
लालित्य ललित: यह आपने सही सवाल किया, परिवार, नातेदार तो नहीं; कई बार अपने मित्रों में नाराजगी हुई, पर वह स्थाई नहीं रही। लेकिन विदाई नाराजगी की कुछ महीनों बाद ही हुई। आज सभी से संबंध मधुर हैं, वे भी जानते हैं कि इसके बिना सफर कटेगा नहीं और मैं भी मानता हूं कि लेखकीय नाराज़गी नहीं होनी चाहिए, मिलो तो निगाहें झुकी हुई न हों, यह भावना होनी चाहिए।
– अच्छा ये बताएं, अपनी आलोचना (criticism) को आप कैसे लेते हैं?
लालित्य ललित: मैं इसे अच्छे संदर्भों में लेता हूँ और मिली प्रतिक्रिया के बहाने अपने को मांजने की कोशिश करता हूं, पर आजकल आलोचना करने वाले अच्छे आलोचक नहीं रहे, जहां देखो, लोग आत्ममुग्धता के शिकार हैं। सब पैसे के पीछे दौड़ रहे हैं, जबकि यह नहीं होना चाहिए, किस्मत में होगा तो देर – सवेर आपको सुफल मिलेगा, दौड़िए मत उसके पीछे, ख़ुद में दम और भरोसा रखिए, देखिएगा पैसा और पॉवर खुद चलकर आएगी आपके पास।
– कभी- कभी व्यंग्य विवाद की जड़ बन जाते हैं, क्या कभी आपको इस स्थिति से मुठभेड़ करना पड़ा?…और हां! उस समय परिवार और समाज का रिएक्शन क्या रहा?
लालित्य ललित: नहीं, नहीं! ऐसा मेरे साथ नहीं हुआ, कभी भी नहीं। इस मामले में मैं लकी रहा हूं।
– व्यंग्यकार होने के नाते आपकी निजी ज़िंदगी में कोई मज़ेदार, यादगार या कुछ अजीब अनुभव वाला किस्सा हो तो साझा करें ! (ललित जी के ईशान कोण पर विराजे लियाकत और हमारे साथी हरि ने भी मेरी हां में हां मिलाई…)
लालित्य ललित: (मुस्कराकर, चतुराई से) किस्से कई हैं, नए को कोट करूं तो पहले वाला नाराज़ हो जाएगा, और पुराने की चर्चा करूं तो नया भीतर ही भीतर गुर्राएगा। मैं कहूंगा कि आप इसके लिए मेरी पुस्तकें पढ़िए, आनंद भी आएगा और आँखें भी खुलेंगी और फिर खुलती ही जाएंगी। लिखना किसी नशे की तरह है, अच्छा लगता है जब आपको अखबार वाले रेखांकित करें तो वह पल किसी सम्मान से कम नहीं होता। एक किस्सा याद आया कि जब हिंदुस्तान टाइम्स का पत्रकार और फोटोग्राफर घर आया तो बिटिया ने कहा कि पापा आप तो हिंदी के लेखक हो तो अंग्रेजी वाले पत्रकार क्यों आए हैं! तब मैंने कहा था कि बेटा! तुम्हारी मम्मी की नजरों में बेशक हम नत्थू हों पर आखिर सेलिब्रेटी लेखक हैं, तभी तो उनको आना पड़ा।
– आप तनाव और उदासी के क्षणों को कैसे संभालते हैं? (सवाल व्यंग्यकार से था, तो हँसी आ गई…)
लालित्य ललित: सोचता हूं जो मिला वह काफी है, उससे संतोष है और जो आगे मिलेगा वह प्रभु का प्रसाद होगा।ज्यादा नहीं सोचता। कुछ देर में बादल छंट जाते हैं और मौसम अच्छा लगने लगता है। मैं इन बदमाशों (तनाव, उदासी) को ज्यादा देर अपने पास टिकने ही नहीं देता। फ़िर, जब उनको लगता है कि यहां दाल नहीं गलेगी, तो ख़ुद ही अपना सा मुंह लेकर रफ़ू चक्कर हो जाते हैं। (फ़िर एक बार हम चारों के मुंह से फुहारे फूटे…)
(अपनी आदत के विपरीत मैंने थोड़ा औपचारिक होने की कोशिश की)
– अब आपके साहित्यिक जीवन से जुड़े कुछ सवाल!…
जैसा कि पांडित्य से दूर और लालित्य से भरपूर रहने वाले इस साहित्यकार ने बताया कि उन्होंने पहले कविता लिखी, तो व्यंग्य लिखना आपने कब और कैसे शुरू किया?
लालित्य ललित: कॉलेज के बाद से यानी समझ लीजिए 1995 के आसपास। सच कहूं, तो माहौल ने मुझे व्यंग्य लेखक बनाया। मेरे घर से थोड़ी ही दूर पर हरीश नवल, प्रेम जनमेजय रहते हैं और कुछ किलोमीटर दूर नरेंद्र कोहली जी। जब जिससे मन हुआ पहुंच जाता था मिलने। रचना सुनाता था। उनकी सुनता और अपने को मांजने का प्रयास करता। इस मामले में कोहली जी की मासिक गोष्ठी से काफ़ी फायदा हुआ, लेकिन कुछ समय बाद वहां से विदा ले ली, क्योंकि वहां भी आत्ममुग्ध लेखक नजर आने शुरू हुए तो अपन ने किनारा काट लिया, लेकिन नशा भरपूर चढ़ चुका था…
– अच्छा, ‘ पहले प्यार की पहली चिट्ठी ‘ की तर्ज़ पर पूछते हैं: आपकी पहली प्रकाशित रचना क्या थी और उसपर पाठकों/प्रियजनों या ‘अप्रियजनों‘ की प्रतिक्रिया कैसी रही?
लालित्य ललित: इस सवाल के जवाब के लिए फ्लैश बैक में जाना पड़ेगा, पहली रचना कविता थी, और वह ‘वीर अर्जुन’ अखबार में 1988 में छपी थी। ‘ वीर अर्जुन ‘ के संपादक अनिल नरेंद्र के संपादकीय का मैं मुरीद था। गजब लिखते थे। व्यंग्य भी किसी दैनिक में ही आया था, नाम याद नहीं आ रहा, पर पहला व्यंग्य संग्रह याद है “जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग” जो साहित्य निकेतन, बिजनौर से आया और वह पहला प्यार था, जिसके प्रमुख तौर पर संस्करण आज भी जारी हैं।
– लगे हाथ इस परंपरागत सवाल का जवाब भी दे दें कि आपके लेखन पर किन लेखकों/विचारकों का प्रभाव अधिक रहा है?
लालित्य ललित: काफी प्रतिक्रियाएं मिली हैं उसके लिए आपको देखना पड़ेगा कि किस लेखक ने क्या कहा।बलदेव वंशी जी की बात मुझे याद है। उन्होंने कहा था कि आपकी कविता बतकही शैली में लिखी गई है, जो अनायास ही सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की याद दिलाती है। ऐसे ही, किसी को व्यंग्य के पात्र पसंद हैं तो किसी को शिल्प।……श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्रनाथ त्यागी जी से मिलना हुआ, ज्ञान चतुर्वेदी, हरीश नवल, प्रेमजनमेजय, यज्ञ शर्मा, बालेंदु शेखर तिवारी, दिलीप कुमार तैतरबे और कई ऐसे नाम जिनसे सीखने को और सुधारने के टिप्स मिले। मैं अभी भी अपने को व्यंग्य का विद्यार्थी ही मानता हूं।
– अब सवाल इस विद्यार्थी को मास्टर साबित करने वाली परिघटना पर। हाल ही में आपकी रचनावली 25 खंडों में प्रकाशित हुई है। आमतौर पर बहुत वरिष्ठ लेखकों की रचनावली छपती है, वह भी उम्र के तीसरे – चौथे पड़ाव पर यानी उनके जीवन के अंतिम दौर में, या फिर जीवनोपरांत प्रकाशित होती है…और आपकी अभी आ गई, जबकि आप अभी सेवानिवृत्त भी नहीं हुए। ये रचनावली जैसा अद्भुत कार्य कैसे हो पाया?
लालित्य ललित: देखिए, मैं यह मानता हूं कि समय बेहद कम है, जो आप कर जाएंगे वह कम ही है, सुशील स्वतंत्र ने बीड़ा उठाया तो वह काम हो गया, लिखना पसंद है रोजाना चार कविताएं लिखता हूं। पहले कम लिखता था, लेकिन अब रफ्तार पकड़ में आई है, मन में है कि किसी दिन एक संग्रह जितनी कविताएं भी एक बैठक में लिखी जाएगी और ‘ श्याम सखा श्याम’ का रिकॉर्ड जरूर टूटेगा।
लिखने के लिए कोई उकसाता है तो मैं उकस जाता हूं।अपनी तो हालत वैसी है जैसे कोई बच्चा बैंड के सामने हो और थिरकने का मूड हो और कोई कहे कि चल भाई शुरू हो जा और अपन शुरू हो गए, आप में दम है तो रोक के दिखाओ।
— ये तो तय है कि आप में दम भी है और आप रुकने वाले भी नहीं हो, लेकिन यह बताएं कि व्यंग्य लेखन और हास्य लेखन में आप क्या अंतर मानते हैं, क्योंकि अक्सर दोनों गडमड हो जाते हैं?
लालित्य ललित: दोनों चीजें अलग अलग हैं– जैसे मैं व्यंग्य लिखता हूं आपका (यानी पाठक का) काम है उसमें व्यंग्य के साथ आनंद के लिए हास्य को खोजना। हास्य को लोगों ने बेहद सतही समझ लिया है जबकि वह बेहद महत्वपूर्ण इकाई है जिसे दहाई बनाने में लेखक की जान निकल जाती है, उनसे पूछिए जो मंच पर हर बात पर दाद मांगते हैं, जबकि वह उचित नहीं है, लेकिन जीवन में तारतम्य बनाए रखने पर जो बोध होता है उससे आदमी बौद्धिक तो बनता ही है और कई बार बुद्धू भी; वैसे हमें बुद्ध होना है जो एक कठिन इकाई है और कठिन काम से लोग परहेज करते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, जैसे हाथ की रोटी और तंदूरी रोटी में जमीन आसमान का अंतर होता है।
– आज के समय में व्यंग्य की प्रासंगिकता आप कैसे देखते हैं, हाथ की रोटी या तंदूरी की तरह?
लालित्य ललित: समय बदला है लेकिन विसंगतियों से उबरा नहीं हैं मनुष्य, चिंताएं उसके माथे पर मंडराती रहती हैं, वह कई बार हताश भी होता है लेकिन आंतरिक ऊर्जा उसे और उसके जीवट को बचाए रखती है और वह सांसारिक प्रलोभनों पर विजय प्राप्त कर लेता है। ऐसे में, सच यह है कि स्वादानुसार (या कहें समयानुसार) दोनों तरह की रोटियां खाने वाले हैं समाज में…
– बात समाज की आई, तो एक सवाल यह बनता है– क्या आप व्यंग्य को समाज सुधार के एक सशक्त माध्यम के रूप में मान्यता देते हैं?
लालित्य ललित: निश्चित ही व्यंग्य समाज को सुधारने का एक मूल मंत्र है जिसका सटीक सेवन यदि कर लिया जाए, तो जाता जीवन तो बेहतर होगा, साथ ही कार्यकुशलता में भी निखार आएगा। ” निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय” तुलसीदास ने यों ही नहीं कहा है! इसको ऐसे लीजिए, ‘ जोरू का गुलाम’ जैसी टिप्पणी के बाद भी पत्नी के कहने पर चलें, तो आपकी प्रगति होना तय है! सूत्र में कहुं तो व्यंग्य एक कड़वी दवा है।
– चलिए, थोड़ा गंभीर होते हैं!…आपके लेखन में समकालीन राजनीति, समाज और संस्कृति की क्या भूमिका होती है?
लालित्य ललित: राजनीति से मैं परहेज करता हूं, वह आपके कार्य में बाधक हो सकती है लेकिन यदि उसका मंतव्य आपके हित में है तो उसको बढ़ावा देने से पीछे नहीं हटना चाहिए। कॉलेज के दिनों में मैं भी यूनियन इलेक्शन में खड़ा हुआ, पराजित हुआ तो समझ में आया कि यह अपना क्षेत्र नहीं है। अपने लिए लेखन ही सही है, हमें उसपर ध्यान केंद्रित करना है जो नितांत अनिवार्य है।
— खैर, यह सही है कि लेखन के लिए ध्यान/एकाग्रता जरूरी है। पर, क्या व्यंग्य लिखते समय आपको सेंसरशिप या आत्म-सेंसरशिप की स्थिति से गुजरना पड़ता है?
लालित्य ललित: बढ़िया सवाल उठाया है आपने सत्येन्द्र जी! यदि इसका जवाब लेखक देंगे तो निश्चित ही उनकी पत्नियां उन्हें छोड़ कर मायके या हरिद्वार जा बैठेंगी।क्योंकि लोगों में ईमानदारी नहीं रही, न लेखन में और न आपसी रिश्तों में। बहुत कम लोग हैं जो इसका पालन करते हैं और वह भी बड़ी शिद्दत से।…
– अच्छा ये बताएं कि आपके अपने पसंदीदा व्यंग्यकार कौन हैं – भारतीय और विश्वस्तरीय दोनों में?
लालित्य ललित: वाजिब सवाल! हालांकि, जवाब देने से पहले मुझे थोड़ा मंथन करना होगा क्योंकि प्रिय और पसंदीदा व्यंग्यकारों की सूची भी वृहद हो सकती है लेकिन अगर कोई पूछेगा तो बताना मेरा धर्म है। ऐसों में प्रमुख हैं : हरीश नवल, प्रेमजनमेजय,अंजनी कुमार चौहान और ज्ञान चतुर्वेदी। इसके बाद अनूप शुक्ल का लेखन पसंद है फिर अरविंद तिवारी और पिलकेंद्र अरोड़ा, हरीश कुमार सिंह आते है और उसके बाद की सूची में पूरी पैसेंजर ट्रेन है जो स्टेशन पर अपनी प्रतीक्षा में है कि कब सिग्नल ग्रीन हो और वह आगे बढ़ें। और मैं भारतीय हूं इसलिए विशेष तौर पर विदेशी साहित्य की बात नहीं करूंगा।
– अच्छा विदेशी पर बात नहीं करेंगे, तो ये बताएं, आज के युवा व्यंग्यकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
लालित्य ललित: पढ़ना बेहद जरूरी है, सोशल मीडिया से जुड़ाव और उसका उपयोग बहुत सतर्कता से करना होगा, कोई एक दिन में लेखक नहीं बन जाता; इस बात को गंभीरता से समझना होगा। आज एक अच्छी पौध तैयार हो रही है लेकिन उनमें अति उत्साह दिखाई देता है जो उचित नहीं है, उनमें अभी भटकाव की स्थिति है जिसे उन्हें छोड़ना होगा।
– आपकी नज़र में, तकनीक और सोशल मीडिया ने व्यंग्य लेखन को किस तरह बदला है?
लालित्य ललित: इसने व्यंग्य को एक सशक्त प्लेटफार्म दिया है और वैश्विक स्तर पर पाठकों का एक स्नेहिल संसार भी। आज दुनिया भर के अपने पाठकों की प्रतिक्रिया से ब्लड प्रेशर भी नियंत्रित रहता है और चित्त भी प्रसन्न।
-क्या इस चित्त प्रसन्न करने वाले व्यंग्य को आप साहित्य की गंभीर विधा का दर्जा देते हैं या फिर हल्की-फुल्की केटेगरी में रखते हैं?
लालित्य ललित: व्यंग्य एक गंभीर विधा है और यह कोई हंसी मज़ाक का खेल नहीं है, पर कई बार इसी के माध्यम से खेला हो जाता है। वैसे व्यंग्य आत्मीय सरोकारों की भूमिका निभाता है।
– आपके हिसाब से व्यंग्य लेखन के लिए सबसे ज़रूरी गुण कौन से हैं?
लालित्य ललित: आपका बेबाक होना, दरबारी प्रकृति का न होना, जो है वह सीधे- सीधे कह देना। कोई आपको गद्दी पर नहीं बिठा सकता। आपको अपनी मेहनत से खड़ा होना पड़ेगा, इसको याद रखिए। मैं इसका नियम से पालन करता हूं और कभी भी कोताही नहीं बरतता।
— क्या कभी ऐसा हुआ कि आपका लिखा कोई व्यंग्य समय से पहले ही पुराना पड़ गया?
लालित्य ललित: ऐसा कभी नहीं हुआ, पर जो कॉलम राइटिंग करते है उनके लिए यह सवाल हो सकता है, पर मेरे साथ ऐसा कभी भी नहीं हुआ, हमेशा स्वाद दाल मखनी का वही रहता है जो पहले था, लेकिन कह सकते है कि लेखन की धार बनी रहनी चाहिए, इसलिए अपने को कुरेदना मुझे पसंद है।
— आने वाले समय में आप किस तरह का व्यंग्य लिखना चाहते हैं?
लालित्य ललित: ऐसे व्यंग्य लिखूंगा जिसे पढ़ना पाठकों को अच्छा लगे, वे अपने साथ लेखक के वक्तव्य को एक सीख मानते हुए अपने जीवन को एक आदर्श सूत्र में पिरोएं। पाठक आपसे जुड़ें और खुशी महसूस करें।
मुझे बड़ा अच्छा लगा, जब कोई पाठिका आगरा से चले और आपको तलाशते हुए दिल्ली पहुंच जाए और यह कहे कि सर आपसे मिलने के लिए मैं तीन बजे सुबह उठी और चार बजे रेल में बैठ गई।
यह वाक्य आपको मिलने वाले किसी भी सम्मान से कहीं ज्यादा है। इस बात को याद रखना होगा।..
-साथ में, हरिकृष्ण

