रात के सन्नाटे में घड़ी की टिक-टिक सुनते हुए गंगाबाबू को लगता है — अब नींद नहीं, बस यादें ही रह गई हैं। गाँव की मिट्टी की खुशबू, दोस्तों की बातें, चौपाल की हँसी… सब कहीं पीछे छूट गया है। बेटे के शहर वाले फ्लैट में अब सबकुछ है — आराम, सुविधा, पर न जाने क्यों दिल खाली-खाली सा है।
हर सुबह दूध लेने, अख़बार पलटने, टीवी देखने के बीच एक सवाल बार-बार सिर उठाता है — क्या मैं सच में जी रहा हूँ, या बस दिन काट रहा हूँ?
फिर एक दिन, ठंड से जकड़ी सुबह में, कुछ अनजान चेहरे मिलते हैं… और शुरू होती है एक नई कहानी — दोस्ती, अपनापन और जीवन की फिर से लौ जलाने की कहानी। आइए खासरपट डॉट कॉम पर पढ़ते हैं वरिष्ठ कहानीकार अनुराग की संवेदनशील और दिल छू लेने वाली कहानी — “नई जमात”
गंगाबाबू ने लाइट जलाकर देखा। उन्हें लगा कि साढे़ छह बज गए हैं। वह हड़बड़ाकर उठे और जल्दी-जल्दी गरम कपडे़ पहने और स्टील की डोलची लेकर चल दिए। घर से बाहर निकले तो घुप्प अंधेरा था। उन्हें एहसास हुआ कि घड़ी गलत तो नहीं देख ली। वह वापस कमरे में आ गए। घड़ी फिर देखी। अभी पौने पांच ही बचे थे। वह कपड़े उतारकर बिस्तर पर लेट गए। फिर उन्हें नींद नहीं आई। उन्हें डर लगा रहा कि कहीं आंख लग गई और दूध लेने में देरी हो गई तो सचिन को दूध पीये बिना स्कूल जाना पडे़गा। वह बीच-बीच में लाइट जलाकर घड़ी देखते रहे।
दिसम्बर को अंतिम सप्ताह चल रहा है। कड़ाके की ठंड पड़ रही है। आज तो कोहरा भी पड़ा है। साढे़ छह बज गए। उन्होंने जर्सी, मौजे और जूते पहने और दूध लेने के लिए घर से बाहर निकल गए। कोहरा और घना हो गया था। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। एक बार को उनके कदम ठिठक गए। सोचने लग कि आज दूध रमेश ही ले आएगा। फिर ख्याल आया कि दूध लेने रमेश जाएगा तो उसे जल्दी उठना पडे़गा। यह बात उन्हें ठीक नहीं लगी। वह धूंध की चादर चीरते हुए दूध लेने चल दिए।
रमेश नहीं चाहता कि पापा सुबह उठकर दूध लेने जाएं। पहले वह ही दूध लेने जाता था। लेकिन यहां आने के बाद गंगाबाबू ने जिद की कि दूध लेने वह जाएंगे। उनका तर्क था कि इस बहाने सुबह घूमना भी हो जाएगा। यह बात रमेश को ठीक लगी।
गंगाबाबू ने दूध रसोई में रख दिया। फिर घड़ी देखी। सवा सात बज गए थे। उन्होंने दूसरे कमरे का दरवाजा खटखटा दिया, ’’ बेटा, उठो। आफिस के लिए देर हो जाएगी।।’’
’’अच्छा पापा।’’ दीपाली बोली।
गंगाबाबू अपने कमरे में आकर रजाई में बैठ गए। दो-तीन मिनट और बीत गए। उन्होंने घड़ी देखी- सात पच्चीस होने वाले थे। वह उठे और फिर से बेटे-बहू के कमरे का दरवाजा खटखटाया, ’’साढ़े सात हो गए। उठ जाओ।’’
’’पापा, उठ रही हूं।’’ दीपाली की आवाज में हल्की-सी झुंझलाहट थी।
गंगाबाबू कुछ नहीं बोले।
दीपाली हाथ-मुंह धोने के लिए बाथरूम में घुस गई।
गंगाबाबू ने देखा कि सात बजकर पैंतीस मिनट हो गए हैं। उन्हें लगा कि नाश्ते के लिए देर न हो जाए। उन्होंने दूध गरम करने के लिए गैस के चूल्हे पर रख दिया और टोकरी से निकालकर आलू छिलने लगे।
उन्होंने एक आलू छिला ही था कि दीपाली आ गई, ’’पापा, आप रहने दें। मैं कर लूंगी।’’ वह रसोई की खिड़की से बाहर देखती हुई बोली, ’’आज तो बहुत कोहरा है। पापा, आप दूध लेने मत जाते। ये ले आते।’’
गंगाबाबू कुछ नहीं बोले। वह हाथ धोकर अपने कमरे में आ गए। तब तक कामवाली आ गई। वह घर की साफ-सफाई में जुट गई।
रमेश और दीपाली आफिस के लिए निकल गए। कुछ देर बाद सचिन तैयार होकर स्कूल चला गया। दस-पंद्रह मिनट बाद कामवाली भी काम निपटाकर चली गई।
नौ बज गए थे। गंगाबाबू अखबार पढ़ने लगे। अखबार पढ़ने में उनकी कोई विशेष रुचि नहीं है। वही रोज-रोज के नेताओं के बेतुके बयान, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति, अपराध की खबरें, क्रिकेट और क्रिकेटरों का गुणगान और फिल्मी गोशिप। उन्हें यह सोचकर मजा आता कि नेता एक-दूसरे को भ्रष्ट, चरित्रहीन, देशद्रोही जो चाहे कह लें, उससे लोकतंत्र मजबूत होता है, लेकिन जैसे ही कोई और नीतिगत मसलों पर सवाल उठाता है, सब एकजुट होकर लोकतंत्र की दुहाई देने लगते हंै। कभी भूले-भटके मानवीय सरकारों से जुड़ी कोई खबर दिख जाती है, तो उसे वह एक नहीं, दो बार पढ़ लेते हैं।
तीन साल पहले पत्नी की मृत्यु के बाद गंगाबाबू गांव में अकेले रह गए। मां के जाने के बाद रमेश ने साथ चलने के लिए कहा, लेकिन वह राजी न हुए। हालांकि उनके साथ के कई लोग दुनिया को अलविदा कर चुके थे, लेकिन अपनी मिट्टी का मोह उन्हें गांव से बांधे रखता। घरों में खेल-खिलखिलाते, स्कूल-काॅलेज जाते बच्चों को देखकर उन्हें अपने पुराने दिन याद आ जाते और कभी-कभी वह उन खट्टी-मिठ्ठी यादों को किसी के साथ बांट भी लेते। दादाजी, ताऊजी, चाचाजी की पुकार में दिन बीत जाता। कभी कोई उठने-बैठने आ जाता, तो दो-चार घंटे उससे गपशप में कट जाते। कोई नहीं आया तो वह ही किसी के घर जाकर बैठकी जमा लेते। गांव में सभी उनकी ख्याल रखते। उन्हें कभी नहीं लगता कि वह गांव में अकेले हैं।
पिछले माह गंगाबाबू को बुखार हो गया। गांववाले उनकी देखभाल में जुट गए। जब सात-आठ दिन मंे भी उनका बुखार नहीं उतरा, तो उन्होंने रमेश को फोन करवा दिया। वह आया और जिद कर गंगाबाबू को अपने साथ ले गाजियाबाद ले आया। उन्हें अपनी मिट्टी और गांववालों से बिछुड़ने के साथ-साथ इस बात का भी दुखा था कि अब उनके पुश्तैनी घर में ताला लग गया। उन्होंने मन-ही-मन जन्मभूमि को प्रणाम किया- न जाने अब दोबारा आना हो या न हो।
गंगाबाबू बेटे के साथ आ तो गए, लेकिन यह दुनिया उनके लिए जेल बन गई। फ्लैटों मंे बंद लोग। किसी को किसी से मतलब नहीं। दिनभर घर में बंद रहो। गांव में किसी के घर मेहमान आता तो मिलने और हालचाल पूछने का सिलसिला शुरू हो जाता, लेकिन यहां किसी ने मुंह उठाकर देखा तक नहीं। गांव में लोगांे की पहचान बाप-दादा के नाम से होती और यहां फ्लैट नम्बर से। किसी के बारे में पूछना हो, तो तुरंत कहेंगे कि फ्लैट नम्बर बताओ।
वह चार-पांच दिन में ही अपनी बीमारी से ज्यादा एकांकीपन से परेशान हो गए। वह रमेश से बोले, ’’बेटा, मुझे यहां नहीं रहना। मुझे गांव छोड़ आ।’’
रमेश ने पूछा, ’’ क्या बात है। क्या अपनी देखभाल ठीक से नहीं हो रही है। क्या दीपाली या सचिन ने आपको कुछ कहा।’’
गंगाबाबू बोले, ’’ऐसी बात नहीं है, बेटा। मेरी देखभाल ठीक से हो रही है। वे दोनों तो मेरा बहुत ध्यान रखते हैं।’’
रमेश ने पूछा, ’’फिर क्या बात है।’’
गंगाबाबू बोले, ’’गांव में था, तो रोज दसियों लोगों से राम-राम, श्याम-श्याम हो जाती थी। यहां आए हुए चार-पांच दिन हो गए, लेकिन किसी दुआ-सलाम तक नहीं हुई।’’
रमेश उनकी बात सुनकर मुस्करा दिया, ’’आप गांव चले जाना, लेकिन पहले ठीक तो हो जाओ।’’
’’ठीक है।’’ कहकर गंगाबाबू ने सिर हिला दिया।
करीब पंद्रह दिन दवा खाने के बाद उनकी तबीयत ठीक हो गई। उन्होंने गांव जाने की जिद फिर पकड़ ली। रमेश ने बताया कि उसने टिकट करा दिया है। दो महीने बाद का टिकट मिला है, वह भी वेटिंग में। गंगाबाबू के पास रमेश की बात मानने और गांव जाने के लिए दिन गिनने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।
गंगाबाबू बात करना तो दूर, दिनभर किसी इंसान की शक्ल देखने के तरस जाते। उनके लिए समय काटना मुश्किल हो जाता। घर में फ्रिज, रूम हीटर, टेलिविजन, खुले और हवादार कमरे, आरामदायक बिस्तर सब कुछ है, बच्चे भी चाहते हैं कि उन्हें कोई परेशानी न हो, लेकिन उनका मन फिर भी बेचैन ही रहता।
घंटी टुनटुनाई तो गंगाबाबू दरवाजा खोलने उठ गए। डाकिया था। बेटे के नाम रजिस्टर्ड पत्र था। उन्हांेने साइन करके पत्र ले लिया। डाकिया मुड़ने को हुआ, तो गंगाबाबू ने पूछा, ’’बेटा, क्या नाम है, तुम्हारा।’’
‘‘जी, मनोज कुमार।’’
’’कहां के रहने वाले हो।’’
’’आजमगढ़।’’
’’यहां कहां रहते हो।’’
’’गोविंदपुरम।’’
गंगाबाबू ने उसे गौर से देखा और बोले, ’’बेटा, कितनी ठंड पड़ रही है और तुमने न तो कानों पर मफलर बांधा हुआ है और न ही मौजे पहने हुए हैं। बेटा, सबसे ज्यादा ठंड पैरों और कानों से ही शरीर में घुसती है।’’
डाकिया कुछ नहीं बोला। वह हल्का-सा मुस्कराया और वापस जाने के लिए मुड़ गया। गंगाबाबू अपने बिस्तर पर आकर रजाई में बैठ गए। वह सोचने लगे कि बंद कमरे में रजाई ओढ़कर भी उनका ठंड से बुरा हाल है तो वह बेचारा कैसे डाक बांट रहा होगा।
पिछले दिनों बेटे ने मोबाइल फोन लागकर दे दिया था। दिन में बेटा तो कभी पुत्रवधू फोन कर गंगाबाबू का हाल पूछ लेते। उन्हें सख्त हिदायत दी हुई थी कि जरा भी दिक्कत हो, तो तुरंत फोन कर दें। कभी-कभार बेटी, दामाद या किसी रिश्तेदार व परिचित का फोन आ जाता। वह चाहते कि फोन पर देर तक बात होती रहे। फोन पर बात खत्म होने के बाद उनका कुछ समय यह सोचते हुए बीत जाता कि क्या बात हुई, क्या बात कहने-सुनने से रह गई या अगली बार फोन आएगा, तो क्या-क्या बात करेंगे।
गंगाबाबू ने अखबार एक ओर रख दिया। घड़ी देखी-दस बजने वाले थे। वह नहाने के लिए उठ गए। गीजर में पानी गर्म था। नहाने के बाद उन्होंने चाय बनाई और नाश्ता कर लिया। उनके सामने फिर समस्या खड़ी हो गई कि अब क्या करें। उन्होंने टेलिविजन चला लिया। चकाचैंधवाले षड्यंत्री सीरियल में उनका मन नहीं लगा। आम आदमी और उनकी समस्याओं से तो जैसे टेलिविजन के लिए कार्यक्रम बनाने वालों का कोई सरोकार ही नहीं है। छोटे पर्दे पर आम की जगह खास ने ले ली है। समाचारों में कुछ विशेष नहीं था। डिबेट के नाम पर राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता चोंच लड़ा रहे थे। एंकर तटस्थ रहने की बजाए पार्टी प्रवक्ता की तरह बात कर रहे थे। उन्होंने थोड़ी देर देखकर टीवी बंद कर दिया।
उन्हें लगा कि मोबाइल फोन की घंटी बज रही है। उन्होंने लपककर उसे उठा लिया। देखा- कोई फोन नहीं था। पहले उन्हें मोबाइल फोन झंझट लगता था, लेकिन अब वह उनके समय काटने का जरिया हो गया। किसी का फोन आ जाता तो पांच-सात मिनट बातचीत में कट जाते। वह कोशिश करते कि बात थोड़ी लंबी खींच जाए। वह मोबाइल फोन रखकर इंतजार करते रहते कि किसी का फोन आ जाए। फोन सामने रखने की वजह यह थी कि उन्हें डर लगा रहता कि यदि फोन की घंटी नहीं सुन पाए तो किसी से बात करने का अवसर चला जाएगा।
दोपहर को ढाई बजे सचिन के स्कूल से आने पर उन्हें थोड़ी हलचल महसूस हुई। वह रसोई में जाकर खाना गर्म करने लगे। सचिन स्कूल की यूनिफॉर्म बदलकर आ गया, ’’दादा, रसोई में क्या कर रहे हो।’’
’’बेटा, तुम्हारे लिए खाना गर्म कर रहा हूं।’’ उनकी आवाज दबी हुई सी थी, जैसे कोई गलती कर दी हो।
सचिन झुंझलाकर बोला, ’’आप से कितनी बार कहा, कोई काम मत किया करो, पर आप मानते ही नहीं। चलो यहां से। मैं खाना गर्म कर लूंगा।’’
गंगाबाबू थोड़ी देर वहां खड़े रहे। फिर अपने कमरे में आकर बिस्तर में बैठ गए। सचिन खाना खाकर ट्यूशन के लिए चला गया।
शाम सात बजे तक बेटा-बहू आ गए। चाय पीकर बहू रात का खाना बनाने में जुट गई। बेटा लैपटॉप लेकर बैठ गया। सचिन होमवर्क करने लगा।
रमेश लैपटॉप पर काम करते-करते दीपाली से बोला, ’’आजकल ऑफिस में सही नहीं चल रहा है। नए बॉस को न जाने मुझसे क्या एलर्जी है। बात-बात पर कमियां निकालता रहता है। औरों की बड़ी-से-बड़ी गलतियों को नजरअंदाज कर देता है।’’
गंगाबाबू अंदर कमरे में यह बात सुन रहे थे। वह फौरन बाहर आ गए और पास की कुर्सी पर बैठते हुए बोले, ’’क्या बात है, बेटा।’’
रमेश को लगा कि पापा परेशान हो जाएंगे। वह लापरवाही से बोला, ’’पापा, आप परेशान मत हो। यह सब तो आफिस में चलता रहता है।’’
गंगाबाबू अपने कमरे में आ गए। वह चहलकदमी करने लगे। वह चाहते हैं कि बेटा, बहू या सचिन उन्हें भी अपनी बातों में शामिल करें, लेकिन अकसर ऐसा होता नहीं। गंगाबाबू कोई बात पूछना भी चाहते हैं तो आप परेशान मत हों, आप चिंता मत करो या आप आराम से रहो, जैसी बात कहकर उन्हें चुप करा देते।
गंगाबाबू बेटे से कुछ पूछते तो ’हां‘, ’हूं’ में ही जबाव मिलता और बात आगे नहीं बढ़ पाती। तीनों अपनी ही दुनिया में व्यस्त और मस्त। गंगाबाबू सोचते कि रमेश को लैपटाॅप या मोबाइल पर दुनियाभर के लोगों से बात करने का तो समय है, लेकिन सामने बैठे बाप से नहीं।
दीपाली ने आवाज दी, ’’पापा, खाना बन गया है। आ जाओ।’’
गंगाबाबू बाहर आकर डायनिंग टेबल पर बैठ गए। दीपाली ने गाजर का हलवा, आलू-मटर की सब्जी और रोटी बनाई हुई थी। गंगाबाबू का खाने का मन नहीं था। सारा दिन बैठे रहने से भूख भी कैसे लगे। उन्हांेने एक रोटी और थोड़ी-सी सब्जी ले ली, लेकिन बहू ने जिद करके गाजर का हलवा उनकी प्लेट में परोस दिया। उन्होंने धीरे-धीरे खाना खा लिया। खाना खाते समय भी बेटा-बहू अपनी ही बातों में व्यस्त रहे।
बेटा-बहू खाना खाकर सोने के लिए अपने कमरे में चले गए। गंगाबाबू भी अपने कमरे में आकर बेड पर लेट गए। वह सोचने लगे कि आज का दिन तो कट गया, कल की कल देखी जाएगी। उन्होंने खुद को रजाई से अच्छी तरह से लपेट लिया और सोने की कोशिश करने लगे।
अगले दिन सुबह उठे वही बंधी-बंधाई दिनचर्या। नौ बजे तक सभी काम-धंधे पर चले गए। गंगाबाबू के समाने समस्या कि अब क्या करें। उन्हें ठंड लगने लगी। वह रजाई ओढ़कर लेट गए। उन्हें अपनी पिताजी की बात याद आ गई। वह कहा करते थे कि खाली बैठे रहने से ठंड अधिक लगती है, लेकिन वह करें क्या।
गंगाबाबू पेशाब करने के लिए उठे। वह बेड पर वापस आने लगे तो देखा कि मेज पर सचिन की किताब-काॅपी बिखरी हुई है। गंगाबाबू ने उन्हें करीने से लगा दिया। उन्हें सचिन की हिंदी की किताब उठा ली। उन्होंने किताब को खोलकर देखा। उसमें छोटी-छोटी कहानियां और कविताएं थीं। वह किताब लेकर रजाई ओढ़कर बेड में बैठ गए। उन्होंने एक कहानी पढ़ी। अच्छी लगी। उन्होंने एक और कहानी पढ़ ली। इस तरह उन्होंने चार-पांच कहानियां पढ़ लीं।
घंटी की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ। दरवाजा खोला। सचिन स्कूल से आ गया था। दादा-पोते ने खाना खाया। गंगाबाबू फिर से रजाई में घुस गए और किताब पढ़ने लगे और सचिन होमवर्क करने लगा। थोड़ी देर बाद सचिन आया और बोला, ’’दादा, मेरी हिंदी की किताब आपने देखी। मिल नहीं रही है।’’
गंगाबाबू बोले, ’’ये लो किताब। मेरे पास थी।’’ उन्होंने उसे किताब पकड़ा दी।
’’दादा, आप मेरी किताब पढ़ रहे थे।’’ सचिन आश्चर्य से बोला।
गंगाबाबू मुस्करा दिए।
सचिन होमवर्क करने लगा। गंगाबाबू रजाई ओढ़कर लेट गए। थोड़ी देर में सचिन आया। उसे एक कहानी का सार लिखना था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था। गंगाबाबू ने कुछ देर पहले ही वह कहानी पढ़ी थी। उन्होंने समझा दिया कि कहानी का सार क्या है और कैसे लिखते हैं। सचिन ने पूछा कि मैं यहीं बैठकर होमवर्क कर लूं। गंगाबाबू ने ’हां’ कर दी। वह अपना स्कूल बैग लेकर दादा के पास आ गया और वहीं बेड पर बैठकर होमवर्क करने लगा। उसकी कुछ समझ में नहीं आता, तो दादा से पूछ लेता। उसका हिंदी का काम पूरा हो गया। वह गणित का काम करने लगा। गंगाबाबू ने सचिन की हिंदी की किताब ले ली और बची हुई दो-तीन कहानियां भी पढ़ डालीं।
गंगाबाबू ने अखबारवाले को पड़ोस के वर्माजी के घर पत्रिकांए भी देते देखा था। सभी लोग जा चुके थे। उन्होंने अखबार के पन्ने पलट लिए थे। उन्होंने सोचा कि वर्मा जी के घर से मैगजीन मांग कर ले आता हूं। संकोच भी हुआ कि वे पता नहीं क्या सोचेंगे। फिर हिम्मत कर उन्होंने वर्माजी के घर का दरवाजा खटखटा दिया। वर्मा जी आफिस जा चुके थे। दरवाजा उनकी पत्नी ने खोला, ’’अंकल नमस्ते।’’
’’मधु बेटा, आपसे कुछ काम है।’’ गंगाबाबू संकुचाते हुए बोले।
’’आप अंदर आइए।’’
’’बेटा, घर का दरवाज खुला है।’’
’’बोलिए, अंकल।’’
’’बेटा, आप पत्रिकाएं लेते हैं। पुराने एक-दो अंक दे दो। मैं पढ़कर वापस कर दूंगा।’’ गंगाबाबू ने कह दिया।
अब संकोच करने की बारी मधु की थी। वह बोली, ’’ सॉरी अंकल, दो-तीन दिन पहले ही रद्दी बेची है। अभी तो कोई मैगजीन नहीं है।’’
’’कोई बात नहीं बेटा।’’ कहकर गंगाबाबू मुड़ने लगे।
’’एक मिनट रुकिए।’’ कहकर मधु अंदर कमरे में चली गई। वह तुरंत वापस आ गई। उसके हाथ में एक किताब थी। वह गंगाबाबू को किताब देती हुई बोली, ’’आप यह किताब ले जाइए। और भी किताब आप ले लेना।’’
गंगाबाबू ने देखा कि वह प्रेमचंद की कहानियों का संग्रह है। वह ’धन्यवाद’ बोलकर वापस आ गए।
उन्होंने ’ईदगाह’ कहानी पढ़नी शुरू की थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी। उन्होंने दरवाजा खोला। प्रेस करने वाली थी। पूछा, ’’बाबा, प्रेस के लिए कपड़े हैं।’’
’’हां।’’ कहकर गंगाबाबू ने मेज पर रखी गठरी की ओर इशारा कर दिया।
वह कपड़ों की गठरी उठाकर चली गई। इस सब में मुश्किल से दो-तीन मिनट लगे, लेकिन गंगाबाबू को इस सबसे बड़ी कोफ्त हुई। वह आकर फिर से कहानी पढ़ने लगे। कहानी पूरी हुई। उनकी आंखों के कोने नम हो गए। उनकी समझ में नहीं आया कि काल्पनिक पात्रों के लिए उनके आंसू क्यों आ गए।
अगली कहानी ’बड़े भाई साहब’ थी। इस पढ़ने के बाद उनके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी कि हमारे भीतर हर समय ’बड़े भाई साहब’ कुंडली मारकर बैठ रहते हैं और समय-समय पर फुंकार उठते हैं।
गंगाबाबू एक किताब पढ़ते और वर्माजी के घर से दूसरी ले आते। इन किताबों के माध्यम से उनके तरह-तरह के दोस्त बनने लगे। उनके साथ बोलते-बतियाते और उनके जीवन का हिस्सा बन गंगाबाबू का समय बीत जाता। कभी-कभी देश और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी घूम आते।
आज कई दिनों बाद धूप निकली थी। ठंड से थोड़ी राहत महसूस हो रही थी। सचिन ने होमवर्क कर लिया था। शाम के चार बजे थे। वह बोला, ’’दादा, पार्क में चलते हैं।’’
गंगाबाबू पढ़ने के लिए कहने को हुए, लेकिन उन्होंने ’बड़े भाई साहब’ को सिर नहीं उठाने दिया और उसके साथ जीने के लिए जूते पहनने लगे।
पार्क में कई बच्चे खेल रहे थे। सचिन अपना बेट-बॉल लेकर आया था, लेकिन उन बच्चों का मैच चल रहा था। उन्होंने कहा कि यह पारी खत्म होने के बाद ही वे उसे टीम में शामिल करेंगे।
सचिन बोला, ’’दादा, हम खेलते हैं। आप बोलिंग करना, मैं बेटिंग करूंगा।’’
’’बेटे, तुम बच्चों के साथ खेलो। मैं यहां बैठ जाता हूं।’’ गंगाबाबू बेंच पर बैठते हुए बोले।
’’नहीं दादा। आप खेलो मेरे साथ।’’ सचिन उनका हाथ खींचते हुए बोला।
गंगाबाबू को अजीब लगा- बच्चों के बीच मैं बूढ़ा खेलते हुए कैसा लगूंगा। लेकिन पोते की जिद के आगे उन्हें मजबूरन बेंच से उठना पड़ा।
सचिन बेट लेकर खड़ा हो गया। गंगाबाबू ने गेंद लुढ़काकर फेंक दी।
’’ऐसे नहीं, ठीक से बॉल फेंको।’’ सचिन बोला।
गंगाबाबू ने हाथ घुमाकर गेंद फेंकी। सचिन खुश हो गया। खेलने वाले दादा-पोते ही थे इसलिए गेंद लेने के लिए गंगाबाबू को ही जाना पड़ता। पांच-सात मिनट में उनकी झिझक दूर हो गई और वह पोते के साथ खेलने का आनंद लेने लगे।
बच्चों का मैच थोड़ी देर में पूरा हो गया। उन्होंने सचिन को अपने साथ खेलने के लिए बुला लिया। गंगाबाबू पास ही में एक खाली बेंच में बैठ गए। वहां से थोड़ी दूसरी पर आठ-दस बुड्ढ़े घेरा बनाए बैठे थे। उनके बीच ताश की गड्डी और शतरंज रखी हुई थी। वे बीच-बीच में सिर जोड़कर घुसर-पुसर करते और फिर सम्मिलित ठहाका सुनाई देता। तभी उनमें से एक बुजुर्ग की नजर गंगाबाबू पर पड़ गई। वह चिल्लाए, ’’वहां अकेले-अकेले क्यों बैठे हो, जनाब। हमसे काहे की दूरी प्यारे।’’
गंगाबाबू अनमने से उठे और जब तक वह बुड्ढ़ों की सभा तक पहुंचते, उन्होंने थोड़ा-थोड़ा खिसक-खिसकर उनके बैठने के लिए जगह बना ली।
’’आइए-आइए, बैठिए-बैठिए।’’ वे सभी एक साथ बोल पड़े। उनके इस तरह के उत्साह भरे स्वागत से गंगाबाबू की झिझक थोड़ी कम हुई।
गंगाबाबू बैठ गए। फिर शुरू हुआ परिचय का दौर। कोई अफसरी कर रिटायर हुआ था कोई क्लर्की से। कोई रिटायर प्रोफेसर था तो कोई बैंक मैनेजर। अलग-अलग क्षेत्रों, प्रदेशों के विभिन्न रीति-रिवाज मानने वाले इन लोगों के जीवन में एक चीज समान थी कि सभी जीवन के ढलान पर थे, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह थी कि वे अपने जीवन को जीवंत बनाए हुए थे। उनके बीच धर्म-कर्म से लेकर राजनीतिक विषयों पर बातचीत होती रहती। फूहड़ और अश्लील चुटकलेबाजी भी होती। ऐसे प्रसंगों में बुड्ढ़ों के चहरों पर चमक देखने लायक होती।
गंगाबाबू को न शतरंज खेलना आता और न ही ताश। लूडो और सांप-सीढ़ी जरूर उन्होंने बच्चों के साथ खेला था। यह बात उन्होंने बात भी दी।
’’कोई बात नहीं गंगाबाबू, हमारे साथ पहले से ही एक छोटा बच्चा है- पारिख। यह भी सांप-सीढ़ी और लूडो से आगे नहीं बढ़ पाया। अब उसे आपका साथ मिल जाएगा।’’ वर्माजी ने हंसते हुए कहा।
’’गंगाबाबू, संगीत सुनते हो।’’ शर्माजी ने पूछा।
’’नहीं।’’ गंगाबाबू ने जवाब दिया।
’’शराब पीते हो।’’
गंगाबाबू ने सिर हिला दिया।
शर्माजी अपने मुंह गंगाबाबू के नजदीक लाते हुए रहस्मयी ढंग से फुसफसाए, ‘‘किसी के साथ कुछ लफड़ा-वफड़ा।’’
गंगाबाबू संकोच के साथ बोले, ’’ऐसा कुछ नहीं।’’
’’अरे, तुम तो नीरे बुद्धू हो।’’ शर्माजी ने कहा। वह चंद सेकंड चुप रहे और गंगाबाबू का चेहरा घूरते हुए बोले, ’’यह मैं नहीं कर रहा है। किसी विद्वान ने कहा है- जो शराब, स्त्री और संगीत से प्रेम नहीं करता, वह जीवन भर मूर्ख ही रहता है।’’ यह कहकर वह तीरछी नजर करते हुए मुस्कराए।
’’बुढ़े, मुंह में दांत नहीं और पेट में आंत नहीं बचे, लेकिन औरत और शराब की लत नहीं छुटती। अब भजन किया कर।’’ लाल ने शर्मा को कोहनी मारते हुए कहा। सभी ने जोरदार ठहाका लगाया।
अंधेरा घिरने लगा था। ठंड भी बढ़ने लगी थी। सिन्हा बोला, ’’अब चलते हैं।’’
तब तक सचिन का खेल समाप्त हो गया था। वह दोस्तों के साथ खड़ा बात कर रहा था। गंगाबाबू ने उसे बुला लिया और दोनों घर आ गए।
आज गंगाबाबू को अच्छी भूख लगी और नींद भी अच्छी आई।
अगले दिन सचिन स्कूल से आया, खाना खाया और ट्यूशन चला गया। गंगाबाबू रजाई ओढ़कर लेट गए। उन्हें झपकी आ गई। तभी गेट की घंटी बज उठी। वह उठे और दरवाजा खोला तो सामने चैधरी का हंसता हुआ चेहरा था।
’’श्रीमान जी, घर में क्या कर रहे हो। आओ, पार्क में तुम्हारा सभी इंतजार कर रहे हैं।’’
गंगाबाबू की इच्छा तो नहीं थी, लेकिन वह मौजे-जुते पहनकर पार्क के लिए चल दिए। गंगाबाबू के पार्क में दोस्तों के साथ एक-डेढ़ घंटे आनंद के साथ बीते। उनका पार्क में जाने का सिलसिला शुरू हो गया। किसी दिन साथियों के आने में देर हो जाती, तो गंगाबाबू को बेचैनी होने लगती।
एक दिन खाना खाते समय रमेश ने कहा, ’’पापा, टिकट कनफर्म हो गया है।’’
गंगाबाबू को नई जमात मिल गई थी। वह बोले, ’’बेटा, गांव में जाकर मैं अकेला क्या करूंगा। यहां मेरी देखभाल करने के लिए तुम लोग हो।’’
रमेश और दीपाली ने एक-दूसरी की तरफ देखा और मुस्करा दिए।
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