Lohri 2026: लोहड़ी का पर्व उत्तर भारत, विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में, बड़े हर्षोल्लास और पारंपरिक अंदाज़ में मनाया जाता है। यह त्योहार केवल सर्दियों के अंत का संकेत नहीं देता, बल्कि नई फसल के स्वागत, प्रकृति के प्रति आभार और सामूहिक आनंद का उत्सव भी है। लोहड़ी की शाम को जलती अग्नि के चारों ओर परिवार और मित्र एकत्र होते हैं, लोकगीत गाए जाते हैं और भंगड़ा-गिद्धा के साथ उल्लास मनाया जाता है।
अक्सर लोहड़ी का नाम लेते ही रेवड़ी और गजक की मिठास याद आती है, लेकिन वास्तव में यह पर्व कुछ खास पारंपरिक खाद्य पदार्थों और रस्मों के बिना अधूरा माना जाता है। इन चीजों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही, साथ ही ये सर्दियों में शरीर के लिए भी बेहद लाभकारी होती हैं।
रेवड़ी और गजक
लोहड़ी की पहचान मानी जाने वाली रेवड़ी और गजक तिल और गुड़ से बनाई जाती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, तिल और गुड़ दोनों की तासीर गर्म होती है, जो ठंड के मौसम में शरीर को अंदर से मजबूत बनाती है। तिल कैल्शियम और आयरन से भरपूर होता है, जबकि गुड़ पाचन सुधारने और ऊर्जा देने में मदद करता है। लोहड़ी की अग्नि में इन्हें अर्पित करना नई फसल का पहला अंश ईश्वर को समर्पित करने का प्रतीक माना जाता है।
मूंगफली
लोहड़ी पर मूंगफली खाना और अग्नि में डालना एक बेहद लोकप्रिय परंपरा है। प्रोटीन और हेल्दी फैट्स से भरपूर मूंगफली को ‘गरीबों का काजू’ भी कहा जाता है। इस समय नई मूंगफली बाजार में उपलब्ध होती है, इसलिए इसे उत्सव का हिस्सा बनाया जाता है। मान्यता है कि मूंगफली को अग्नि देव को अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।
पॉपकॉर्न (फुल्ले)
लोहड़ी पर फुल्ले यानी पॉपकॉर्न का विशेष महत्व होता है। मक्का नई फसल का प्रतीक है और फुल्ले को आग में डालना पुरानी नकारात्मक ऊर्जा और दुखों के अंत का संकेत माना जाता है। यह परंपरा जीवन में नई शुरुआत और सकारात्मकता का संदेश देती है।
मक्के की रोटी और सरसों का साग
लोहड़ी के दिन पारंपरिक भोजन के रूप में मक्के की रोटी और सरसों का साग जरूर बनाया जाता है। यह व्यंजन पूरी तरह मौसमी और स्थानीय होता है। सरसों का साग फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है, जबकि मक्का ऊर्जा का अच्छा स्रोत है। सफेद मक्खन के साथ यह भोजन सर्दियों में शरीर को ताकत देता है और किसान की मेहनत के प्रति सम्मान भी दर्शाता है।
लोहड़ी का असली अर्थ
लोहड़ी सिर्फ खाने-पीने का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, फसल और सामूहिक संस्कृति का उत्सव है। यह त्योहार सिखाता है कि परंपराओं से जुड़े रहकर और खुशियां साझा करके ही समाज में सौहार्द और आनंद बना रहता है।

