Pregnancy Health: दुनियाभर में बढ़ता तापमान अब केवल मौसम और पर्यावरण को ही प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि इसका असर मानव जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पहलू—जन्म दर—पर भी दिखाई देने लगा है। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि गर्भावस्था के दौरान अधिक गर्मी का सामना करने वाली महिलाओं में लड़कों के जन्म की संभावना कम हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ता तापमान गर्भ में पल रहे भ्रूण के विकास को प्रभावित करता है, जिससे जन्म के समय लड़का-लड़की के प्राकृतिक अनुपात में बदलाव आ सकता है।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल Demography में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने भारत और उप-सहारा अफ्रीका के 50 लाख से अधिक जन्मों के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि बढ़ते तापमान का गर्भावस्था और नवजात शिशुओं के लिंग अनुपात पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है।
तापमान बढ़ने पर लड़कों के जन्म में कमी
शोध में सामने आया कि जिन दिनों अधिकतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा, उन परिस्थितियों में लड़कों के जन्म की संख्या अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई। उप-सहारा अफ्रीका में गर्भावस्था के पहले त्रैमास यानी शुरुआती तीन महीनों के दौरान ज्यादा गर्मी का सामना करने वाली महिलाओं में लड़कों के जन्म की संभावना कम पाई गई।
वहीं भारत में इसका असर मुख्य रूप से गर्भावस्था के दूसरे त्रैमास में देखने को मिला। अध्ययन के मुताबिक जब गर्भवती महिलाएं 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान के संपर्क में रहती हैं, तो लड़कों के जन्म की संभावना में लगभग 0.014 प्रतिशत अंक की कमी देखी जा सकती है। हालांकि यह प्रतिशत छोटा लग सकता है, लेकिन जब इसे बड़े पैमाने पर देखा जाता है तो इसका प्रभाव काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों और अधिक उम्र की माताओं पर ज्यादा प्रभाव
रिसर्च में यह भी पाया गया कि बढ़ते तापमान का असर सभी महिलाओं पर समान रूप से नहीं पड़ता। खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं, अपेक्षाकृत अधिक उम्र की माताओं और उन महिलाओं में यह प्रभाव ज्यादा देखने को मिला जो पहले से कई बच्चों को जन्म दे चुकी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं को अत्यधिक गर्मी से बचाव के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पातीं। वहीं अधिक उम्र की गर्भवती महिलाओं का शरीर भी पर्यावरणीय तनाव को कम सहन कर पाता है, जिसके कारण गर्भ में पल रहे भ्रूण पर इसका असर अधिक पड़ सकता है।
वैज्ञानिकों ने बताई संभावित वजह
शोधकर्ताओं ने इस निष्कर्ष को विकासवादी सिद्धांत Trivers–Willard hypothesis से जोड़ा है। इस सिद्धांत के अनुसार जब पर्यावरणीय परिस्थितियां प्रतिकूल होती हैं, तब पुरुष भ्रूण अधिक संवेदनशील होते हैं और उनके गर्भ में जीवित रहने की संभावना कम हो सकती है। यही कारण है कि अत्यधिक गर्मी जैसी परिस्थितियों में लड़कों के जन्म का अनुपात घट सकता है।
गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी खतरा
चेन्नई स्थित Sri Ramachandra Institute of Higher Education and Research से जुड़ी पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ Vidhya Venugopal के अनुसार बढ़ता तापमान गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए कई तरह के जोखिम पैदा कर सकता है।
उनका कहना है कि अत्यधिक गर्मी के कारण शरीर का तापमान बढ़ जाता है, जिससे गर्भवती महिलाओं में हाई ब्लड प्रेशर, गर्भकालीन डायबिटीज, समय से पहले प्रसव और कम वजन वाले बच्चों के जन्म का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा डिहाइड्रेशन और थकान जैसी समस्याएं भी अधिक देखने को मिलती हैं।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ती चिंता
स्वास्थ्य विशेषज्ञ Jane Hirst के अनुसार वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि अत्यधिक गर्मी के कारण समय से पहले जन्म यानी प्री-टर्म बर्थ का खतरा लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। भारत के तमिलनाडु में किए गए एक अध्ययन में यह जोखिम तीन गुना तक अधिक पाया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सरकारों और स्वास्थ्य संस्थानों को गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को संवेदनशील समूह के रूप में पहचानना चाहिए। इसके साथ ही उन्हें अत्यधिक गर्मी से बचाने के लिए विशेष स्वास्थ्य कार्यक्रम, जागरूकता अभियान और सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर यह अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब मानव जीवन के बहुत गहरे स्तर तक पहुंच चुका है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय में और भी जरूरी हो जाएगा।

