सरसों उत्पादन में 70% बढ़ोतरी की संभावना, परती धान भूमि बनेगी गेमचेंजर

Mustard Production
Mustard Production

Mustard Production: सरसों की खेती को लेकर एक बड़ी सकारात्मक खबर सामने आई है, जो भारत को तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही रणनीति और वैज्ञानिक योजना अपनाई जाए, तो छत्तीसगढ़ जैसे गैर-पारंपरिक राज्यों में सरसों की पैदावार में 70 फीसदी तक बढ़ोतरी संभव है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIRMR) के पूर्व निदेशक पी. के. राय के अनुसार, धान की कटाई के बाद बड़ी मात्रा में खाली रहने वाली जमीन को रबी सीजन में सरसों की खेती से जोड़ा जाए तो उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। वर्तमान में पी. के. राय राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान के निदेशक हैं।

धान की परती जमीन: एक बड़ा अवसर

छत्तीसगढ़ का कुल खेती क्षेत्र लगभग 4.78 मिलियन हेक्टेयर है, लेकिन इसमें से केवल 23 प्रतिशत क्षेत्र ही सिंचित है। राज्य में लगभग 3.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है, जो मुख्यतः वर्षा आधारित है। धान की फसल कटने के बाद लगभग आधी जमीन रबी सीजन में खाली रह जाती है।

खेत खाली रहने के पीछे कई वजहें हैं—सिंचाई की कमी, मिट्टी में नमी का तेजी से खत्म होना, कुछ इलाकों में जलभराव, लंबी अवधि वाली धान किस्मों के कारण देर से कटाई, छुट्टा पशुओं का खतरा और तकनीकी जानकारी का अभाव। इन चुनौतियों के कारण किसान रबी सीजन में खेती से बचते हैं।

सरसों क्यों है बेहतर विकल्प?

विशेषज्ञों का मानना है कि धान की परती जमीन के लिए सरसों सबसे उपयुक्त फसल है। सरसों को कम पानी की आवश्यकता होती है और यह सीमित नमी में भी अच्छी पैदावार देती है। इसकी अधिकांश किस्में 90 से 120 दिनों में तैयार हो जाती हैं, जिससे धान की कटाई के तुरंत बाद इसकी बुवाई संभव है।

इसके अलावा, सरसों हल्के सूखे और तापमान में उतार-चढ़ाव को सहन कर सकती है। यही कारण है कि यह उन क्षेत्रों के लिए आदर्श फसल मानी जा रही है जहां सिंचाई सीमित है।

उत्पादन में दोगुनी वृद्धि की संभावना

फिलहाल छत्तीसगढ़ में सरसों का रकबा लगभग 31 हजार हेक्टेयर है और कुल उत्पादन करीब 17 हजार टन है। यहां औसत उत्पादकता 5-6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि इसे 11-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बढ़ाया जा सकता है। तुलना करें तो 2024-25 में देश की औसत उत्पादकता 14.63 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रही है।

यदि वैज्ञानिक तकनीकों, उन्नत बीजों और बेहतर प्रबंधन को अपनाया जाए, तो उत्पादन में दोगुनी से अधिक वृद्धि संभव है।

रिसर्च में मिले सकारात्मक संकेत

पिछले तीन वर्षों में किए गए बहु-स्थान परीक्षणों में सरसों की किस्म DRMR-150-35 ने उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। यह किस्म 95 से 110 दिनों में तैयार हो जाती है और धान कटाई के बाद बुवाई के लिए उपयुक्त पाई गई है। परीक्षणों में प्रमुख कीट और रोगों का गंभीर प्रकोप नहीं देखा गया, केवल एफिड्स की समस्या सामने आई।

विशेषज्ञों के अनुसार, सरसों को चना जैसी फसलों के साथ मिश्रित खेती में भी अपनाया जा सकता है, जिससे किसानों की आय के स्रोत बढ़ सकते हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर अहम पहल

देश में 2024-25 के दौरान सरसों का कुल उत्पादन घटकर 12.67 मिलियन टन रह गया, जबकि इससे पहले यह 13.26 मिलियन टन था। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सरसों की खेती को बढ़ावा देना उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने में मददगार साबित हो सकता है।

यदि परती धान भूमि का प्रभावी उपयोग किया जाए, तो यह न केवल किसानों की आय बढ़ाएगा बल्कि देश की तेलहन आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करेगा। आने वाले वर्षों में यह पहल कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।