US Pressure on Nepal: तिब्बती शरणार्थियों के अधिकार और चीन के प्रभाव पर बड़ी चेतावनी

US Pressure on Nepal
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US Pressure on Nepal: नेपाल में तिब्बती शरणार्थियों की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ती जा रही है। हाल ही में US House Appropriations Committee की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट में नेपाल सरकार से अपील की गई है कि वह अपने यहां रह रहे तिब्बती शरणार्थियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। यह रिपोर्ट वित्तीय वर्ष 2027 के लिए तैयार की गई है, जिसमें अमेरिकी विदेश नीति और मानवीय सहायता से जुड़े कई मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई है।

रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि नेपाल में बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी ऐसे हैं जिन्हें अब तक कानूनी पहचान नहीं मिल पाई है। इसका मुख्य कारण 1995 के बाद से शरणार्थियों के पंजीकरण की प्रक्रिया का बंद होना बताया गया है। समिति ने सुझाव दिया है कि नेपाल सरकार को इस प्रक्रिया को फिर से शुरू करना चाहिए, ताकि सभी शरणार्थियों को वैध पहचान और जरूरी अधिकार मिल सकें। यह कदम उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के साथ-साथ उन्हें कानूनी सुरक्षा भी प्रदान करेगा।

अमेरिकी समिति ने United States Department of State से भी आग्रह किया है कि वह नेपाल के साथ इस मुद्दे पर सक्रिय रूप से काम करे और यह सुनिश्चित करे कि तिब्बती शरणार्थियों के अधिकारों का उल्लंघन न हो। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए अमेरिका की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे इस दिशा में लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।

रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा चीन के बढ़ते प्रभाव पर केंद्रित है। इसमें कहा गया है कि China की नेपाल में बढ़ती राजनीतिक और कूटनीतिक पकड़ के कारण तिब्बती समुदाय की स्थिति और कमजोर हो गई है। धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर भी असर पड़ा है, जिससे शरणार्थियों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है। समिति ने इस बात पर चिंता जताई है कि अगर यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में तिब्बती समुदाय के अधिकार और भी सीमित हो सकते हैं।

अमेरिका ने नेपाल और India दोनों में तिब्बती शरणार्थियों के लिए चल रही सहायता योजनाओं को जारी रखने की भी सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में तिब्बत से जुड़े कार्यक्रमों के लिए करीब 23 मिलियन डॉलर का बजट निर्धारित किया गया था, जबकि 2025 में 6.8 मिलियन डॉलर की सहायता को बहाल किया गया था। अब वित्तीय वर्ष 2027 के लिए भी फंडिंग जारी रखने का प्रस्ताव रखा गया है।

विशेष रूप से, समिति ने तिब्बत में सांस्कृतिक संरक्षण के लिए 10 मिलियन डॉलर और भारत-नेपाल में शरणार्थियों की सहायता के लिए 8 मिलियन डॉलर देने की सिफारिश की है। यह फंडिंग न केवल शरणार्थियों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगी, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान को भी बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगी।

रिपोर्ट में नेपाल सरकार को United Nations High Commissioner for Refugees (यूएनएचसीआर) के नियमों का पालन करने की भी सलाह दी गई है। खास तौर पर “नॉन-रिफाउलमेंट” के सिद्धांत पर जोर दिया गया है, जिसके तहत किसी भी शरणार्थी को जबरन उस देश में वापस नहीं भेजा जा सकता जहां उसकी जान या स्वतंत्रता को खतरा हो। यह अंतरराष्ट्रीय कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और सभी देशों को इसका पालन करना आवश्यक है।

कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट न केवल नेपाल में तिब्बती शरणार्थियों की वर्तमान स्थिति को उजागर करती है, बल्कि चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी वैश्विक चिंता को सामने लाती है। साथ ही, यह दर्शाती है कि अमेरिका इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है और वह चाहता है कि नेपाल अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अपने दायित्वों को निभाए।