पाक रक्षा मंत्री (Khawaja Asif)का बयान: अमेरिका ने किया इस्तेमाल

Khawaja Asif
Khawaja Asif

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ (Khawaja Asif) ने संसद में बोलते हुए अमेरिका के साथ अपने देश के रिश्तों और पिछली नीतियों पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अतीत में एक रणनीतिक मकसद के लिए इस्तेमाल किया गया और बाद में उसे “बेहद अपमानजनक तरीके” से किनारे कर दिया गया। उनके इस बयान ने पाकिस्तान की राजनीति और विदेश नीति पर नई बहस छेड़ दी है।

संसद में खुलकर बोला गया असंतोष

संसद में हुई बहस के दौरान ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान ने कई दशकों तक अमेरिका का साथ दिया, खासकर अफगान संघर्षों के दौरान। लेकिन जब अमेरिका के रणनीतिक हित पूरे हो गए, तो पाकिस्तान को गंभीर आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा संकटों के साथ अकेला छोड़ दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन नीतियों का खामियाजा आज भी देश भुगत रहा है।

आसिफ का कहना था कि पाकिस्तान को एक सहयोगी के रूप में बराबरी का सम्मान नहीं मिला। उन्होंने स्वीकार किया कि देश ने अपनी विदेश नीति में ऐसे फैसले लिए जिनके दीर्घकालिक परिणामों का सही आकलन नहीं किया गया।

सैन्य शासकों की नीतियों पर सवाल

रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासकों—जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ—का नाम लेते हुए कहा कि उनके दौर में लिए गए फैसलों ने देश को गहरे संकट में धकेल दिया। उन्होंने कहा कि अफगान युद्ध में भागीदारी को धार्मिक रंग देकर पेश किया गया, जबकि असल उद्देश्य एक वैश्विक शक्ति के साथ सामरिक गठजोड़ था।

आसिफ ने कहा कि उस समय ‘जिहाद’ के नाम पर हजारों युवाओं को लामबंद किया गया। इससे न केवल क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी, बल्कि पाकिस्तान के भीतर भी कट्टरपंथ और हिंसा की जड़ें मजबूत हुईं। उन्होंने यह भी माना कि उस दौर में शिक्षा और सामाजिक विमर्श को भी प्रभावित किया गया, जिसके प्रभाव आज तक दिखाई देते हैं।

“ब्लोबैक” की स्वीकारोक्ति

ख्वाजा आसिफ ने खुलकर कहा कि पाकिस्तान आज जिन आतंकी घटनाओं और चरमपंथी चुनौतियों का सामना कर रहा है, वह अतीत की नीतियों का “ब्लोबैक” है। उनके मुताबिक, जब बाहरी ताकतें क्षेत्र से चली गईं, तो उनके पीछे एक जटिल सुरक्षा संकट, हथियारों का प्रसार और वैचारिक उग्रवाद रह गया।

उन्होंने कहा, “हम अक्सर अपने इतिहास को स्वीकार करने से बचते हैं। लेकिन अगर हम गलतियों को नहीं मानेंगे, तो उनसे सीख भी नहीं पाएंगे।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक दबाव दोनों से जूझ रहा है।

अमेरिका-पाक रिश्तों पर नई बहस

रक्षा मंत्री के बयान के बाद पाकिस्तान में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या देश को अपनी विदेश नीति की दिशा पर पुनर्विचार करना चाहिए। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते हमेशा रणनीतिक जरूरतों पर आधारित रहे हैं—चाहे वह शीत युद्ध का दौर हो या 9/11 के बाद का समय।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि पाकिस्तान ने भी इन साझेदारियों से आर्थिक और सैन्य सहायता का लाभ उठाया। इसलिए पूरे संबंध को एकतरफा बताना उचित नहीं होगा। फिर भी, यह स्पष्ट है कि मौजूदा नेतृत्व अतीत की नीतियों की समीक्षा करना चाहता है।

भविष्य की राह क्या?

ख्वाजा आसिफ ने संकेत दिया कि पाकिस्तान को अब संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति अपनानी चाहिए। उनका जोर इस बात पर था कि देश को अपने दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए, न कि किसी एक वैश्विक शक्ति के एजेंडे के अनुसार चलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जो नुकसान हो चुका है, उसकी पूरी भरपाई संभव नहीं है, लेकिन पारदर्शिता और आत्ममंथन से आगे की राह बेहतर बनाई जा सकती है। उनके इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था के भीतर अतीत की रणनीतियों को लेकर असंतोष और आत्मविश्लेषण दोनों मौजूद हैं।