Middle East Crisis: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारतीय उद्योगों और कारोबार पर गहराई से दिखने लगा है। खासतौर पर छोटे और मझोले उद्योग (MSMEs) इस संकट की सबसे बड़ी चपेट में आ गए हैं। ताजा आकलन के अनुसार, भारत की करीब 800 छोटी और मझोली कंपनियों के निवेश पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे कारोबारी अनिश्चितता लगातार बढ़ती जा रही है।
पिछले छह महीनों के दौरान इन कंपनियों ने United Arab Emirates (UAE) में लगभग ₹12,000 करोड़ (करीब 1.3 अरब डॉलर) का निवेश किया है। हालांकि, United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव ने हालात को और जटिल बना दिया है। इस तनाव का सबसे ज्यादा असर रिटेल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर पड़ा है, जहां लगभग 280 भारतीय कंपनियों ने हाल ही में करीब 40 करोड़ डॉलर का निवेश किया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी क्षेत्र में जारी अस्थिरता भारतीय MSMEs के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर रही है। आपूर्ति में कमी, माल ढुलाई की बढ़ती लागत, लॉजिस्टिक बाधाएं और भुगतान में देरी जैसी समस्याएं कंपनियों के नकदी प्रवाह (कैश फ्लो) को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। इससे न सिर्फ उनका संचालन मुश्किल हो रहा है, बल्कि कई कंपनियों के लिए अस्तित्व का संकट भी खड़ा हो गया है।
उत्पादन पर गहरा असर
इस संकट का असर अब भारत की पेट्रोकेमिकल सप्लाई चेन पर भी साफ नजर आने लगा है। पॉलिमर (प्लास्टिक कच्चा माल) की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं, जिससे प्लास्टिक प्रोसेसिंग उद्योग पर भारी दबाव बन गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश में करीब 50% प्लास्टिक इकाइयों ने उत्पादन बंद कर दिया है। प्रमुख पॉलिमर जैसे पॉलीप्रोपाइलीन (PP), एचडीपीई (HDPE), एलएलडीपीई (LLDPE), पीवीसी और पीईटी रेजिन की कीमतों में 78% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कच्चे माल की कमी के चलते उत्पादन क्षमता में भी भारी गिरावट आई है—जहां पहले इकाइयां 100 टन प्रति माह उत्पादन करती थीं, वहीं अब यह घटकर 20 टन तक रह गया है।
ड्राई फ्रूट बाजार में उछाल
पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर ड्राई फ्रूट बाजार पर भी देखने को मिल रहा है। आपूर्ति बाधित होने के कारण कई मेवों की कीमतों में 20% से 50% तक की वृद्धि हो चुकी है।
दिल्ली के प्रमुख थोक बाजार Khari Baoli में व्यापारी फिलहाल पुराने स्टॉक के सहारे काम चला रहे हैं। बादाम, अंजीर, पाइन नट्स, खजूर और कई औषधीय जड़ी-बूटियों की सप्लाई लगभग ठप हो गई है। व्यापारियों का कहना है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे, तो कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
दवा उद्योग पर भी असर
यह संकट केवल मैन्युफैक्चरिंग और रिटेल तक सीमित नहीं है, बल्कि फार्मा सेक्टर भी इसकी चपेट में आ रहा है। पेट्रोकेमिकल्स से जुड़े कच्चे माल—जैसे नैफ्था, स्टाइरीन और पॉलीइथिलीन—की सप्लाई प्रभावित होने से दवाओं के उत्पादन पर दबाव बढ़ गया है।
भारत और China जैसे बड़े फार्मा हब इस स्थिति से प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि कई दवाओं के एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (API) इन्हीं कच्चे माल से तैयार किए जाते हैं। यदि सप्लाई चेन में बाधा लंबे समय तक जारी रही, तो दवाओं की कीमतों और उपलब्धता दोनों पर असर पड़ सकता है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो इसका असर भारतीय उद्योग, महंगाई और वैश्विक सप्लाई चेन पर और भी गंभीर हो सकता है। खासतौर पर MSME सेक्टर, जो पहले ही कई आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, इस संकट से उबरने में अधिक समय ले सकता है।

