भारत में Israel के राजदूत Reuven Azar ने हाल ही में Iran पर की गई सैन्य कार्रवाई के समय को लेकर उठ रही अटकलों पर सफाई दी है। उन्होंने कहा कि इस कार्रवाई का भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi की इजरायल यात्रा से कोई संबंध नहीं है।
नई दिल्ली में मीडिया से बातचीत करते हुए अजार ने स्पष्ट किया कि यह सैन्य कार्रवाई पूरी तरह से रणनीतिक और सैन्य परिस्थितियों के आधार पर की गई थी। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने यह अनुमान लगाया कि इजरायल ने प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा समाप्त होने का इंतजार किया और उसके बाद ही ईरान के खिलाफ कार्रवाई की। लेकिन उनके अनुसार ऐसा बिल्कुल नहीं है और दोनों घटनाओं के बीच किसी प्रकार का सीधा संबंध नहीं है।
राजदूत अजार ने बताया कि West Asia में पहले से ही तनावपूर्ण हालात बने हुए थे। इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर टकराव की स्थिति रही है। ऐसे में किसी भी सैन्य अभियान का समय कूटनीतिक कार्यक्रमों से नहीं बल्कि सैन्य रणनीति, खुफिया जानकारी और मौके की उपलब्धता से तय होता है।
उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा 25 और 26 फरवरी 2026 को हुई थी। हालांकि जिस सैन्य ऑपरेशन की चर्चा हो रही है, उसके लिए जरूरी “ऑपरेशनल अवसर” प्रधानमंत्री के क्षेत्र से लौटने के बाद मिला। अजार के मुताबिक उस ऑपरेशन को अंतिम मंजूरी भी मोदी की यात्रा समाप्त होने के लगभग दो दिन बाद दी गई थी।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह महज एक संयोग था कि ऑपरेशन का समय प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद आया। अजार के अनुसार इजरायल अपने सैन्य फैसले किसी भी विदेशी नेता की यात्रा को ध्यान में रखकर नहीं करता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
कब्जा नहीं, सुरक्षा है लक्ष्य
इजरायली राजदूत ने इस बात पर भी जोर दिया कि United States और इजरायल की ईरान के खिलाफ कार्रवाई का उद्देश्य ईरान पर कब्जा करना नहीं है। उन्होंने कहा कि इस अभियान का मुख्य लक्ष्य क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है।
अजार के अनुसार इजरायल को ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और मध्य-पूर्व के विभिन्न सशस्त्र समूहों को दिए जा रहे उसके समर्थन को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। उन्होंने कहा कि इन गतिविधियों से पूरे क्षेत्र की स्थिरता और सुरक्षा को खतरा पैदा होता है।
राजदूत ने कहा कि मौजूदा रणनीति का एक उद्देश्य यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाकर ईरान को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया जाए। उनके मुताबिक यदि ईरान की जनता अपनी सरकार की नीतियों में बदलाव चाहती है तो अंतरराष्ट्रीय दबाव उस प्रक्रिया को तेज कर सकता है।
क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक असर
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती टकराव की स्थिति का असर क्षेत्रीय सुरक्षा, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पड़ सकता है।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति खास तौर पर संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि भारत के इजरायल और ईरान दोनों के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। एक ओर भारत रक्षा और तकनीकी सहयोग के मामले में इजरायल का करीबी साझेदार है, वहीं ऊर्जा और क्षेत्रीय कूटनीति के संदर्भ में ईरान के साथ भी उसके महत्वपूर्ण रिश्ते रहे हैं।
ऐसे में इजरायल के राजदूत का यह बयान नई दिल्ली को यह संदेश देने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है कि हालिया सैन्य कार्रवाई का भारत की कूटनीतिक गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्षेत्र में तनाव कम होता है या फिर संघर्ष और बढ़ता है। फिलहाल पश्चिम एशिया की स्थिति अनिश्चित बनी हुई है और दुनिया की नजरें इस क्षेत्र पर टिकी हुई हैं।

