इज़राइल में सियासी घमासान: युद्धविराम पर नेतन्याहू पर भड़के लैपिड

Ceasefire
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Ceasefire: इज़राइल की राजनीति में उस समय तीखा टकराव देखने को मिला जब विपक्ष के नेता Yair Lapid ने प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu पर जोरदार हमला बोला। अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्तों के युद्धविराम को लेकर लैपिड ने इसे “इज़राइली इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता” करार दिया। उनका आरोप है कि इस अहम फैसले में इज़राइल को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया, जबकि यह मुद्दा सीधे उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

लैपिड ने कहा कि यह बेहद चौंकाने वाली बात है कि United States और Iran जैसे बड़े देश इज़राइल को विश्वास में लिए बिना युद्धविराम जैसे बड़े कदम पर आगे बढ़ गए। उनके मुताबिक, यह स्थिति दर्शाती है कि नेतन्याहू की सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी कूटनीति करने में विफल रही है।

“सेना मजबूत, लेकिन सरकार नाकाम”

लैपिड ने अपने बयान में साफ कहा कि इज़राइल की सेना ने अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाई और देश की जनता ने भी एकजुटता दिखाई, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह असफल रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि नेतन्याहू सरकार अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रही और रणनीतिक स्तर पर कई बड़ी गलतियां कीं।

उनके अनुसार, सरकार की कार्यशैली में “अहंकार, लापरवाही और स्पष्ट रणनीति की कमी” साफ नजर आती है। लैपिड ने चेतावनी दी कि इस कूटनीतिक चूक का असर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है और इससे हुए नुकसान की भरपाई करने में इज़राइल को कई साल लग सकते हैं।

अमेरिका के फैसले पर सरकार का समर्थन

विपक्ष की तीखी आलोचना के बावजूद नेतन्याहू सरकार ने अमेरिका के फैसले का समर्थन किया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि वह Donald Trump के युद्धविराम प्रस्ताव के साथ है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें भी रखी गई हैं।

इज़राइल ने कहा है कि यह समर्थन तभी संभव है जब ईरान पूरी तरह से हमले बंद करे और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग Strait of Hormuz को खोल दे। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है, और इसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर असर पड़ सकता है।

लेबनान में जारी रहेगा सैन्य अभियान

इज़राइल ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह युद्धविराम लेबनान में लागू नहीं होगा। दक्षिणी लेबनान में Hezbollah के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रहेगा। इज़राइल का मानना है कि हिज़्बुल्लाह, जो ईरान समर्थित संगठन है, उसकी सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है।

सरकार का कहना है कि जब तक यह खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता, तब तक सैन्य कार्रवाई जारी रखना जरूरी है। इस बयान से यह साफ हो गया है कि इज़राइल अपनी सुरक्षा नीति में किसी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है।

राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौती

यह पूरा मामला इज़राइल की आंतरिक राजनीति और उसकी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। एक तरफ विपक्ष सरकार पर गंभीर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी तरफ सरकार अपने फैसलों को सही ठहराने की कोशिश कर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में इज़राइल की राजनीतिक दिशा और विदेश नीति को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या नेतन्याहू सरकार इस आलोचना का प्रभावी जवाब दे पाती है या नहीं।