India strategy: मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच भारत ने एक बेहद संतुलित और रणनीतिक रुख अपनाया है। वैश्विक दबावों के बावजूद भारत ने न तो किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन किया और न ही किसी दबाव में आकर अपनी विदेश नीति में बदलाव किया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुख भारत की परिपक्व कूटनीति और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की नीति को दर्शाता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने 28 फरवरी से अब तक क्षेत्र के सभी प्रमुख देशों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा है। हालांकि, उसने किसी भी देश के पक्ष में खुलकर बयान देने से परहेज किया है। यह रणनीति भारत को एक संतुलित और विश्वसनीय वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करती है।
संतुलन और कूटनीति पर जोर
भारत की विदेश नीति इस संकट के दौरान तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित रही है:
- किसी भी दबाव में आकर पक्ष नहीं लेना
- राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना
- संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाधान पर जोर देना
इस दृष्टिकोण ने भारत को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत किया है, जो वैश्विक तनाव के समय भी संयम और विवेक से निर्णय लेता है।
दोनों पक्षों से मजबूत संबंध
भारत के Israel और Iran दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं, जो उसकी नीति को और जटिल बनाते हैं।
एक ओर, इजराइल के साथ भारत के मजबूत रक्षा और तकनीकी सहयोग हैं, जो वर्षों से विकसित हुए हैं। दूसरी ओर, ईरान भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय रणनीतिक सहयोग के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
इसी कारण भारत ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय संतुलन बनाए रखना ही बेहतर समझा।
भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता
मिडिल ईस्ट में लगभग 1 करोड़ भारतीय नागरिक काम कर रहे हैं, जो भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।
इस संदर्भ में Subrahmanyam Jaishankar ने अपने समकक्षों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा है। उन्होंने ईरान सहित कई देशों के विदेश मंत्रियों से बातचीत कर स्थिति पर चर्चा की।
जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि “तनाव कम करने का एकमात्र रास्ता संवाद और कूटनीति है।” यह बयान भारत की शांति-प्रधान नीति को दर्शाता है।
निकासी अभियान और सतर्कता
भारत सरकार ने समय रहते खाड़ी देशों से हजारों भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कदम उठाए हैं। इसके साथ ही, स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।
सरकार की इस सक्रियता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा जा रहा है, क्योंकि यह दर्शाता है कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है।
संसद में भी उठी चिंता
मिडिल ईस्ट के हालात को लेकर भारत की संसद में भी गंभीर चर्चा हुई है। विभिन्न दलों के नेताओं ने इस मुद्दे पर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं और सरकार से स्थिति पर स्पष्ट जानकारी मांगी।
सरकार ने भरोसा दिलाया कि वह हालात पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
कुल मिलाकर, भारत ने मिडिल ईस्ट संकट के दौरान एक संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनाई है। Israel और Iran दोनों के साथ संबंध बनाए रखते हुए, उसने किसी भी तरह के दबाव से बचकर अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है।
यह रुख न केवल भारत की कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है, बल्कि उसे वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में भी स्थापित करता है।

