Donald Trump: अमेरिका की राजनीति और विदेश नीति में एक बार फिर बहस तेज हो गई है, जहां Donald Trump के प्रशासन ने साफ तौर पर कहा है कि अमेरिका, ईरान के साथ किसी औपचारिक युद्ध की स्थिति में नहीं है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब 1973 के War Powers Resolution के तहत तय की गई 60 दिनों की समय सीमा समाप्त हो चुकी है, जिससे व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच संभावित टकराव की स्थिति बनती नजर आ रही है।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के स्पीकर Mike Johnson ने इस मुद्दे पर प्रशासन का समर्थन करते हुए कहा कि मौजूदा हालात को “युद्ध” नहीं कहा जा सकता। उन्होंने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया कि अमेरिका किसी बड़े पैमाने की सैन्य कार्रवाई, जैसे व्यापक बमबारी या खुली लड़ाई में शामिल नहीं है। उनके अनुसार, अमेरिका इस समय क्षेत्र में शांति स्थापित करने के प्रयासों पर ध्यान दे रहा है।
1973 में लागू किया गया ‘वॉर पावर्स रेज़ोल्यूशन’ अमेरिकी राष्ट्रपति को सीमित समय के लिए सैन्य कार्रवाई की अनुमति देता है। इस कानून के तहत, यदि राष्ट्रपति किसी सैन्य अभियान में अमेरिकी सेना को शामिल करते हैं, तो उन्हें 60 दिनों के भीतर कांग्रेस से औपचारिक मंजूरी लेनी होती है, अन्यथा सेना को वापस बुलाना पड़ता है। इस मामले में, राष्ट्रपति ट्रंप ने 2 मार्च को कांग्रेस को सैन्य कार्रवाई की जानकारी दी थी, जिसके बाद 1 मई इस समय सीमा की अंतिम तारीख बन गई।
चूंकि अब तक कांग्रेस से इस कार्रवाई के लिए कोई औपचारिक अनुमति नहीं मिली है, इसलिए संवैधानिक गतिरोध की आशंकाएं बढ़ गई हैं। हालांकि, प्रशासन का तर्क है कि मौजूदा स्थिति में सक्रिय लड़ाई नहीं हो रही है और एक तरह का संघर्ष-विराम लागू है, जिससे इस समय सीमा की गणना प्रभावित होती है।
अमेरिकी रक्षा विभाग से जुड़े अधिकारी Pete Hegseth ने भी सीनेट की सुनवाई में यही बात दोहराई। उन्होंने कहा कि संघर्ष-विराम की स्थिति में कानूनी व्याख्या बदल सकती है और 60 दिनों की समय सीमा “रुक” सकती है। हालांकि, इस दलील को विपक्षी डेमोक्रेट्स ने सिरे से खारिज कर दिया है।
डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता Tim Kaine ने कहा कि कानून इस तरह की व्याख्या की अनुमति नहीं देता। उनके अनुसार, 60 दिन पूरे होने के बाद प्रशासन को या तो कांग्रेस से अनुमति लेनी चाहिए थी या सैन्य कार्रवाई समाप्त करनी चाहिए थी। इसी तरह Adam Schiff ने भी प्रशासन की कानूनी स्थिति को कमजोर बताया और कहा कि अब इस संघर्ष को समाप्त करने का समय आ गया है।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों में भी बदलाव देखा गया है। शुरुआती दौर में उन्होंने सैन्य कार्रवाई को लेकर चेतावनी दी थी कि इसमें अमेरिकी सैनिकों की जान जा सकती है और यह युद्ध जैसी स्थिति हो सकती है। बाद में उन्होंने संकेत दिया कि संघर्ष लगभग समाप्त हो चुका है, जबकि कुछ मौकों पर उन्होंने इसे “छोटा सैन्य अभियान” बताया।
मार्च और अप्रैल के बीच ट्रंप ने “युद्ध” शब्द के इस्तेमाल से बचने की कोशिश भी की, क्योंकि ऐसा करने पर कांग्रेस की मंजूरी लेना अनिवार्य हो जाता है। हालांकि, हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि “मुझे युद्ध में जाना पड़ा,” जिससे स्थिति और अधिक अस्पष्ट हो गई।
इस संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी, जब अमेरिका और Israel ने मिलकर Iran के कुछ ठिकानों पर हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने भी अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बनाया। इसके अलावा, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल बाजार में भी उथल-पुथल देखी गई।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि इस सैन्य अभियान में अब तक भारी आर्थिक लागत और सैनिकों की जान जा चुकी है, इसलिए इसे जारी रखना उचित नहीं है। हालांकि, किसी भी विधायी कदम को लागू करना आसान नहीं होगा, क्योंकि रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण वाली कांग्रेस और राष्ट्रपति के संभावित वीटो के चलते ऐसे प्रयासों को चुनौती मिल सकती है।
कुल मिलाकर, अमेरिका में यह मुद्दा अब केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों, कानूनी व्याख्या और राजनीतिक रणनीति का भी अहम विषय बन चुका है।

