Iran Crisis Impact: मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर अब वैश्विक स्तर पर साफ दिखाई देने लगा है और इसका सीधा प्रभाव चीन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। संभावित ईंधन संकट की आशंका के बीच China ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी करने का फैसला लिया है। यह कदम देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और भविष्य में किसी भी आपूर्ति संकट से निपटने की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
यह निर्णय National Development and Reform Commission (NDRC) द्वारा लिया गया है। सरकारी बयान के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में असामान्य तेजी को देखते हुए यह कदम जरूरी हो गया था। सरकार का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखना, आम लोगों पर प्रभाव को सीमित करना और ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
नई दरों के तहत पेट्रोल (गैसोलीन) की कीमत में 1160 युआन प्रति टन की बढ़ोतरी की गई है, जबकि डीजल की कीमत 1115 युआन प्रति टन तक बढ़ा दी गई है। इस घोषणा के बाद कई शहरों में लोग बड़ी संख्या में पेट्रोल पंपों पर पहुंचने लगे, जिससे संभावित संकट की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। लोग भविष्य में कीमतों में और बढ़ोतरी या आपूर्ति में कमी की आशंका के चलते पहले से ही ईंधन स्टॉक करने की कोशिश कर रहे हैं।
इस पूरी स्थिति की जड़ Strait of Hormuz में बढ़ता तनाव है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग माना जाता है, जहां से करीब 20 प्रतिशत वैश्विक ऊर्जा सप्लाई गुजरती है। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
चीन के लिए यह स्थिति इसलिए अधिक संवेदनशील है क्योंकि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है। आंकड़ों के अनुसार, चीन अपनी जरूरत का लगभग 70 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से करीब 45 प्रतिशत तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है, यानी कुल आपूर्ति का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा सीधे इसी मार्ग पर निर्भर है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही कुछ मजबूत कदम उठाए हैं। Goldman Sachs के विश्लेषक एंड्रयू टिल्टन के अनुसार, चीन की ऊर्जा व्यवस्था अन्य देशों की तुलना में अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जाती है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि चीन के पास लगभग चार महीने का आपातकालीन तेल भंडार मौजूद है, जो संकट के समय राहत प्रदान कर सकता है।
इसके अलावा, चीन ने रूस के साथ दीर्घकालिक ऊर्जा समझौते भी किए हैं, जिससे उसे वैकल्पिक आपूर्ति का सहारा मिलता है। इस कारण अल्पकालिक संकट का असर सीमित रह सकता है। हालांकि, यदि मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो चीन समेत पूरी दुनिया को गंभीर ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ईंधन की कीमतों में यह बढ़ोतरी एक तरह से चेतावनी संकेत है कि आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। इससे न केवल तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर, चीन का यह कदम दिखाता है कि दुनिया के बड़े देश अब संभावित ऊर्जा संकट के लिए पहले से तैयारी कर रहे हैं। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर फैल रहा है और आने वाले समय में इसका प्रभाव और भी व्यापक हो सकता है।

