मिडिल ईस्ट तनाव से तेल कीमतों में 50% उछाल

Oil Prices
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Oil Prices Crisis: पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। विश्लेषकों के मुताबिक इस साल अब तक कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है। इसका मुख्य कारण मिडिल ईस्ट में बढ़ता संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर पैदा हुई अनिश्चितता है।

सबसे ज्यादा चिंता Strait of Hormuz यानी होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव और संभावित अवरोध के कारण तेल बाजार में अचानक उथल-पुथल देखी जा रही है।

तेल की कीमतों में अचानक तेज उछाल

हाल की ट्रेडिंग के दौरान अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत लगभग 6 प्रतिशत बढ़कर 85.85 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इसी दौरान क्रूड ऑयल का इंट्राडे भाव 86.22 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो अप्रैल 2024 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।

ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों के अनुसार यह उछाल अचानक नहीं आया है। पिछले सप्ताह गुरुवार को ही तेल की कीमतों में लगभग 9 प्रतिशत की एक दिन की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। यह मई 2020 के बाद से एक दिन में सबसे बड़ी तेजी मानी जा रही है।

इस तेजी के पीछे प्रमुख कारण मध्य पूर्व में बढ़ती सैन्य गतिविधियां और तेल आपूर्ति से जुड़े मार्गों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएं हैं।

युद्ध से पहले ही बढ़ने लगा था दबाव

विश्लेषकों का कहना है कि तेल बाजार में तनाव युद्ध शुरू होने से पहले ही दिखाई देने लगा था। खास तौर पर अमेरिका की सेना की मिडिल ईस्ट में बढ़ती तैनाती और क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका ने बाजार को पहले से ही अस्थिर बना दिया था।

रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध शुरू होने से ठीक पहले वाले शुक्रवार से ही कच्चे तेल की कीमतों में करीब 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी थी। जैसे ही क्षेत्र में सैन्य टकराव तेज हुआ, तेल बाजार में अस्थिरता और बढ़ गई।

ब्रेंट क्रूड में भी तेजी

वैश्विक बाजार में तेल के प्रमुख मानक Brent Crude की कीमतों में भी उछाल देखा गया है। सोमवार सुबह इसकी कीमत 81.45 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी।

विशेषज्ञों के अनुसार यह कीमत उस समय दर्ज की गई जब अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई के बाद पहली बार बाजार खुला। इससे साफ संकेत मिलता है कि भू-राजनीतिक घटनाओं का ऊर्जा बाजार पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर काफी समय तक बना रह सकता है।

दुनिया के कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मध्य पूर्व के तेल पर निर्भर हैं। ऐसे में आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा या समुद्री मार्गों में अवरोध वैश्विक स्तर पर कीमतों को और बढ़ा सकता है।

पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका

तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव सीधे तौर पर विभिन्न देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ता है।

यदि कच्चे तेल की कीमतों में यह तेजी जारी रहती है, तो आने वाले महीनों में कई देशों में ईंधन महंगा हो सकता है। इससे परिवहन लागत, उद्योग और आम लोगों के दैनिक खर्चों पर भी असर पड़ सकता है।

अनिश्चितता बनी रहेगी

ऊर्जा बाजार के विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल स्थिति पूरी तरह स्थिर नहीं है। मिडिल ईस्ट में सैन्य गतिविधियां और समुद्री सुरक्षा से जुड़े जोखिम बने हुए हैं।

यदि हालात और बिगड़ते हैं या ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख मार्ग प्रभावित होते हैं, तो तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। इसलिए आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा बाजार पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।