Jute Industry Crisis: देश का पारंपरिक जूट उद्योग इन दिनों गहरे संकट से गुजर रहा है। कच्चे जूट की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी और आपूर्ति की भारी कमी के चलते कई जूट मिलों में उत्पादन लगभग ठप हो गया है। इसका सबसे बड़ा असर मजदूरों पर पड़ा है, जहां 75,000 से अधिक श्रमिकों के बेरोजगार होने का दावा किया जा रहा है। उद्योग संगठनों का कहना है कि अगर सरकार ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह संकट और गंभीर हो सकता है और लाखों लोगों की आजीविका पर खतरा मंडराने लगेगा।
इंडियन जूट मिल एसोसिएशन (आईजेएमए) के अनुसार, कच्चे जूट की कीमतें ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जिससे मिलों के लिए उत्पादन लागत संभालना मुश्किल हो गया है। जूट उद्योग पहले ही बढ़ती लागत, सीमित मांग और प्रतिस्पर्धी विकल्पों की चुनौती झेल रहा था, लेकिन अब कच्चे माल की कमी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। कई मिलों को मजबूरन उत्पादन घटाना या अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है।
75,000 से ज्यादा मजदूरों पर संकट
आईजेएमए ने केंद्र सरकार से मांग की है कि 1 अप्रैल से निजी व्यापारियों द्वारा कच्चे जूट की खरीद-बिक्री पर पूर्ण रोक लगाई जाए। संगठन का कहना है कि निजी व्यापार के कारण जमाखोरी बढ़ी है, जिससे कीमतें आसमान छू रही हैं। इसका सीधा नुकसान जूट मिलों और श्रमिकों को हो रहा है। एसोसिएशन के मुताबिक, मौजूदा हालात के कारण अब तक 75,000 से ज्यादा मजदूरों को काम से हाथ धोना पड़ा है, जबकि आने वाले दिनों में यह संख्या और बढ़ सकती है।
जूट उद्योग खास तौर पर पश्चिम बंगाल, बिहार, असम और ओडिशा जैसे राज्यों में लाखों परिवारों की आजीविका का साधन है। उत्पादन ठप होने से न केवल मजदूरों की नौकरी पर असर पड़ा है, बल्कि इससे जुड़े परिवहन, पैकेजिंग और छोटे कारोबार भी प्रभावित हो रहे हैं।
मिलों में तेजी से घट रहा कच्चे जूट का स्टॉक
आईजेएमए के अनुसार, बीते कुछ महीनों में जूट मिलों के पास उपलब्ध कच्चे जूट का स्टॉक तेजी से घटा है। केवल दिसंबर 2025 में ही जूट मिलों का स्टॉक लगभग 1.25 लाख गांठ कम हो गया। घटते स्टॉक के बीच मांग बनी रहने से कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है।
दक्षिण बंगाल की TDN-3 ग्रेड जूट की कीमतें बढ़कर करीब 13,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी ऊंची कीमत पर जूट खरीदकर तैयार उत्पाद बनाना आर्थिक रूप से संभव नहीं रह गया है।
सरकार से हस्तक्षेप की मांग
उद्योग संगठनों का मानना है कि जूट एक पर्यावरण-अनुकूल और रणनीतिक रूप से अहम फसल है, जिसका उपयोग पैकेजिंग, कृषि और निर्यात में बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में सरकार को कच्चे जूट की उपलब्धता सुनिश्चित करने, जमाखोरी पर रोक लगाने और मिलों को राहत देने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए।
यदि समय रहते नीतिगत हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो विशेषज्ञों का कहना है कि जूट उद्योग का यह संकट लंबे समय तक बना रह सकता है। इसका असर न केवल उत्पादन और रोजगार पर पड़ेगा, बल्कि देश के इस पारंपरिक उद्योग के अस्तित्व पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।

