Global Tension: दुनिया एक बार फिर गंभीर भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में प्रवेश करती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त विदेश नीति और हालिया सैन्य गतिविधियों के चलते मिडल ईस्ट से लेकर यूरोप तक तनाव तेज़ हो गया है। अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाते हुए कई रणनीतिक विमान तैनात किए हैं, जिसके जवाब में ईरान ने भी वायु रक्षा और मिसाइल अभ्यास कर अपनी तैयारियों का प्रदर्शन किया है। इसी बीच ग्रीनलैंड विवाद के संदर्भ में डेनमार्क ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि उसकी ज़मीन पर किसी भी हमले का तुरंत सैन्य जवाब दिया जाएगा।
मिडल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य गतिविधि बढ़ी
खुले स्रोतों और फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, अमेरिका ने KC-135 और KC-46A जैसे एयर-रिफ्यूलिंग विमान तथा C-17 और C-5M जैसे भारी परिवहन विमानों को यूरोप से हटाकर मध्य पूर्व की ओर भेजा है। इन विमानों को कतर के अल-उदीद एयरबेस सहित रणनीतिक ठिकानों पर तैनात किए जाने की संभावना है। हालांकि पेंटागन की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे संभावित आपात स्थितियों से निपटने की तैयारी मान रहे हैं।
ईरान की जवाबी सैन्य तैयारी
अमेरिकी गतिविधियों के बीच ईरान ने 4 जनवरी को तेहरान सहित कई शहरों में वायु रक्षा और मिसाइल अभ्यास किए। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने उन्नत रडार सिस्टम और सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल इकाइयों को तैनात किया। ईरान का कहना है कि ये कदम उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाए गए हैं।
डेनमार्क का कड़ा संदेश
यूरोप में भी बेचैनी बढ़ती दिख रही है। डेनमार्क ने साफ किया है कि यदि उसकी संप्रभुता पर हमला होता है तो वह “बिना देरी किए सैन्य कार्रवाई” करेगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के पुराने बयानों ने फिर से चर्चा तेज़ कर दी है। हालांकि दोनों देश नाटो सहयोगी हैं, फिर भी बयानबाज़ी ने कूटनीतिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिका-ईरान तनाव की जड़ें
अमेरिका ईरान पर परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर आरोप लगाता रहा है, जबकि ईरान इसे ऊर्जा उत्पादन तक सीमित बताता है। 2018 में ट्रंप द्वारा JCPOA से बाहर निकलने के बाद दोनों देशों के रिश्ते लगातार बिगड़े हैं। इजराइल को लेकर मतभेद, क्षेत्रीय मिलिशिया समूहों की भूमिका और अमेरिकी सैन्य अड्डों की मौजूदगी ने तनाव को और गहरा किया है।
वैश्विक व्यापार और बाज़ार पर असर
इन घटनाओं के बीच अमेरिका ने कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों से हटने की घोषणा की है और रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ की चेतावनी भी दी है। इससे वैश्विक बाज़ारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। निवेशकों के बीच डर है कि हालात बिगड़ने पर शेयर बाज़ार में गिरावट और सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुझान बढ़ सकता है।
तेल और सप्लाई चेन पर खतरा
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ते ही कच्चे तेल की कीमतों में उछाल की आशंका जताई जा रही है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है और किसी भी सैन्य टकराव से शिपिंग, बीमा और सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर एशिया और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।

