Delhi High Court: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर एक महत्वपूर्ण और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि किसी नाबालिग बच्चे को कामुक इरादे से अपने गुप्तांगों को छूने के लिए मजबूर करना बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के अंतर्गत गंभीर यौन हमला माना जाएगा। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की।
🚫 आरोपी की अपील खारिज
यह फैसला उस अपील पर आया, जिसमें एक व्यक्ति ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को चुनौती दी थी। आरोपी को लगभग चार साल की बच्ची के साथ यौन अपराध के मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 10 के तहत दोषी ठहराया गया था। निचली अदालत ने जुलाई 2024 में उसे सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी पीड़िता के घर में किरायेदार के रूप में रह रहा था और यह अपराध वर्ष 2022 में हुआ था।
📜 पोक्सो कानून की व्याख्या
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पोक्सो अधिनियम के अनुसार, 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के खिलाफ किया गया यौन हमला स्वतः ही गंभीर श्रेणी में आता है। अदालत ने कहा कि इस तरह के कृत्य में किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती, क्योंकि यह सीधे तौर पर बच्चे की शारीरिक और मानसिक सुरक्षा पर हमला है।
🗣️ पीड़िता के बयान को माना भरोसेमंद
अदालत ने आरोपी के उस तर्क को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने दावा किया था कि पीड़िता को सिखाया-पढ़ाया गया है और उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं। उच्च न्यायालय ने कहा कि पीड़िता के बयान पूरे मामले में मूल आरोप को लगातार दोहराते हैं। बयान में यदि कुछ मामूली अंतर भी हैं, तो वे स्वाभाविक हैं और इससे उसकी विश्वसनीयता पर कोई असर नहीं पड़ता।
⏳ एफआईआर में देरी पर भी कोर्ट की टिप्पणी
आरोपी ने यह भी दलील दी कि प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी हुई, जिससे मामला कमजोर हो जाता है। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को भी अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग पीड़िता की मां द्वारा अपने पति के दूसरे शहर से लौटने का इंतजार करना एक स्वाभाविक और मानवीय प्रतिक्रिया थी। ऐसे मामलों में देरी को बाधा नहीं माना जा सकता, खासकर जब पीड़ित बच्चा हो।
⚠️ समाज के लिए स्पष्ट संदेश
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी संकेत दिया कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर न्यायपालिका किसी भी प्रकार की ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेगी। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य न केवल दोषियों को सजा देना है, बल्कि समाज में एक मजबूत संदेश देना भी है ताकि भविष्य में ऐसे अपराधों को रोका जा सके।

