छत्तीसगढ़ शराब घोटाला मामले में Supreme Court ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की खिंचाई करते हुए पूछा कि आखिर जांच में इतनी देरी क्यों हो रही है और अभी तक कौन-से बिंदु जांच के अधूरे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि जांच अधिकारी व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करें और बताएं कि पूर्व मंत्री कवासी लखमा के खिलाफ किस प्रकार की जांच लंबित है।
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के आबकारी विभाग के अधिकारियों को दी गई अंतरिम गिरफ्तारी सुरक्षा को स्थायी कर दिया। ये अधिकारी मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का सामना कर रहे हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट एस. नागमुथु और सिद्धार्थ अग्रवाल ने अपनी दलीलें रखीं, जबकि राज्य सरकार और ED की ओर से सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी और एएसजी एस.डी. संजय ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई बार सवाल किया कि ED को जांच पूरी करने में इतना समय क्यों लग रहा है और बार-बार समय मांगने की क्या वजह है।
कवासी लखमा की गिरफ्तारी क्यों हुई?
ED के अनुसार, पूर्व मंत्री और वर्तमान विधायक कवासी लखमा राज्य में सक्रिय शराब सिंडिकेट के महत्वपूर्ण सदस्य थे। एजेंसी का दावा है कि यह सिंडिकेट लखमा के इशारों पर काम करता था और राज्य की शराब नीति में किए गए बदलावों का उन्हें सीधा लाभ मिलता था। ED ने यह भी आरोप लगाया कि लखमा की पहल पर FL-10 लाइसेंस प्रणाली शुरू की गई, जिसका फायदा सिंडिकेट को मिला।
एजेंसी का कहना है कि लखमा को आबकारी विभाग में हो रही गड़बड़ियों की पूरी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने उन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। उन्हें 15 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया गया था और वे पिछले 10 महीनों से जेल में बंद हैं। उनकी खराब होती सेहत को लेकर कांग्रेस ने तत्काल चिकित्सा उपचार की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी से साफ है कि वह अब ED की जांच प्रक्रिया और उसकी समयसीमा को लेकर गंभीर है। कोर्ट ने जांच अधिकारी से विस्तृत हलफनामा मांगकर यह स्पष्ट कर दिया है कि अब एजेंसी को लंबी जांच का ठोस कारण बताना होगा और यह बताना होगा कि आगे कितना काम बाकी है। अगली सुनवाई हलफनामा जमा होने के बाद होगी।

