Congress-Shashi Tharoor Rift: कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बार फिर अंदरूनी मतभेदों और असहजता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस बार कारण बने हैं पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर, जो संसद के बजट सत्र से पहले बुलाई गई एक अहम रणनीतिक बैठक में शामिल नहीं हुए। यह बैठक कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के दिल्ली स्थित आवास पर आयोजित की गई थी, जहां पार्टी की आगे की संसदीय रणनीति और सरकार को घेरने की रूपरेखा पर मंथन किया गया।
इस बैठक को कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था, क्योंकि बजट सत्र में महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक स्थिति और सामाजिक मुद्दों पर विपक्ष को सरकार के खिलाफ एकजुट होकर आक्रामक रुख अपनाना है। ऐसे में शशि थरूर जैसे अनुभवी, अंतरराष्ट्रीय छवि वाले और मुखर नेता की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैठक में शीर्ष नेतृत्व मौजूद, थरूर रहे नदारद
इस रणनीतिक बैठक में कांग्रेस के लगभग सभी बड़े चेहरे मौजूद थे। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, संचार प्रभारी जयराम रमेश, वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम सहित कई दिग्गज नेता बैठक में शामिल हुए।
जब इतने बड़े स्तर पर पार्टी नेतृत्व एक साथ बैठा हो, तब शशि थरूर की गैरमौजूदगी को सामान्य नहीं माना जा रहा। कांग्रेस के भीतर और बाहर दोनों ही स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह महज संयोग है या फिर पार्टी और थरूर के रिश्तों में कोई गहरी खटास उभर रही है।
यात्रा का हवाला, लेकिन संदेह बरकरार
शशि थरूर ने अपनी अनुपस्थिति पर सफाई देते हुए कहा कि वे उस समय दुबई से दिल्ली की फ्लाइट में यात्रा कर रहे थे और शाम करीब 8 बजे दिल्ली पहुंचने वाले थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस बारे में पार्टी कार्यालय को पहले से सूचित कर दिया गया था।
हालांकि, कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब थरूर किसी अहम बैठक से इस तरह अनुपस्थित रहे हों। पिछले कुछ महीनों में वे कई महत्वपूर्ण बैठकों और पार्टी गतिविधियों में नजर नहीं आए हैं, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि कहीं यह दूरी जानबूझकर तो नहीं बनाई जा रही।
क्या कांग्रेस और थरूर के बीच बढ़ रहे हैं मतभेद?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बार-बार की गैरहाजिरी को केवल व्यस्तता या यात्रा से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। शशि थरूर पिछले कुछ समय से कई मुद्दों पर पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग राय रखते हुए दिखाई दिए हैं। चाहे वह विदेश नीति हो, आर्थिक दृष्टिकोण या संगठनात्मक सुधार, थरूर के बयान कई बार कांग्रेस के भीतर बहस का विषय बने हैं।
इसके अलावा, कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान भी थरूर ने खुलकर चुनाव लड़ा था, जिसे पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक पहल के रूप में देखा गया, लेकिन इसके बाद से उनके और शीर्ष नेतृत्व के बीच रिश्तों में पहले जैसी सहजता नहीं दिखी।
केरल की राजनीति से भी जुड़ रही है चर्चा
शशि थरूर की यह दूरी सिर्फ दिल्ली की राजनीति तक सीमित नहीं मानी जा रही। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि इसका असर केरल की राजनीति और आगामी विधानसभा चुनावों पर भी पड़ सकता है। थरूर केरल में एक लोकप्रिय चेहरा हैं और तिरुवनंतपुरम से लगातार सांसद रहे हैं।
हालांकि, थरूर ने कभी सार्वजनिक रूप से पार्टी छोड़ने या किसी अन्य राजनीतिक विकल्प की बात नहीं की है। उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि वे कांग्रेस के साथ बने रहना चाहते हैं, लेकिन पार्टी के भीतर संवाद, सम्मान और भूमिका की स्पष्टता को लेकर असंतोष महसूस कर रहे हैं।
आगे क्या संकेत देती है यह स्थिति?
फिलहाल, शशि थरूर की लगातार बैठकों से गैरमौजूदगी कांग्रेस की एकजुटता और आंतरिक तालमेल को लेकर सवाल खड़े कर रही है। बजट सत्र जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव पर पार्टी को हर अनुभवी नेता की जरूरत है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में कांग्रेस नेतृत्व और शशि थरूर के बीच संवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।
क्या यह अस्थायी असहजता है या किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत—इसका जवाब फिलहाल भविष्य के घटनाक्रम ही देंगे।

