Bihar election 2025: कल्याणकारी योजनाओं, आंतरिक गठबंधनों और बाहुबलियों के वर्चस्व के बीच निर्णायक राजनीतिक संग्राम

A large crowd of Indian voters raising their ink-marked fingers in unity, symbolizing participation in democracy, with a blue voting symbol overlayed in the center.
A vast crowd of voters proudly displaying their ink-marked fingers — a powerful reminder that democracy thrives when every citizen participates.

Bihar election 2025 लोकतंत्र की बिसात पर बिछी है ‘लाभार्थी’ और ‘नौकरी’ की रणनीति

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बिगुल बज चुका है, और राज्य की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह चुनावी समर केवल दो प्रमुख राजनीतिक गठबंधनों—सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और विपक्षी महागठबंधन—के बीच सीधा मुकाबला नहीं है, बल्कि यह संघर्ष है केंद्र और राज्य की कल्याणकारी योजनाओं से उपजे ‘लाभार्थी’ वर्ग के विश्वास, जाति आधारित समीकरणों, और युवाओं की बेरोजगारी से जुड़ी उम्मीदों के बीच। इस चुनाव में दोनों गठबंधनों की आंतरिक एकजुटता और उनकी ज़मीनी रणनीति ही बिहार की सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी, यह तय करेगी।

एनडीए का ‘लाभार्थी’ कवच: ग्रामीण मतदाताओं पर सीधा वार

एनडीए, विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड, ने इस बार चुनाव में अपनी जीत का आधार कल्याणकारी योजनाओं के सीधे लाभ को बनाया है। यह रणनीति ग्रामीण मतदाताओं, जो पारंपरिक रूप से जाति आधारित समीकरणों पर वोट देते थे, को एक नया ‘वर्ग’ (लाभार्थी) प्रदान कर रही है।

एनडीए की सफलता का केंद्रीय स्तंभ उसकी जनकल्याणकारी योजनाएं मानी जा रही हैं, जिनका सीधा प्रभाव निचले और मध्यम वर्ग पर पड़ा है। बुजुर्गों की पेंशन में ₹400 से बढ़ाकर ₹1100 तक की गई वृद्धि ने वृद्ध मतदाताओं को बड़ा सहारा दिया है। इसी प्रकार, 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने की घोषणा ने ग्रामीण परिवारों को महंगाई की मार से कुछ राहत दी है, जबकि 5 किलो मुफ्त राशन की अनवरत आपूर्ति गरीब तबके के लिए एक जीवनरेखा साबित हुई है। महिला सशक्तिकरण की प्रतीक जीविका दीदियों को ₹10,000 की सहायता राशि ने महिलाओं के बीच एक मजबूत वोट बैंक तैयार किया है। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएं, जो मध्यम वर्ग के ग्रामीण किसानों को वार्षिक वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं, भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

इन योजनाओं के साथ-साथ, एनडीए ने इस चुनाव में एक मजबूत और एकजुट मोर्चा पेश किया है। गठबंधन के भीतर बेहतर तालमेल और समन्वय दिख रहा है, जिसका सीधा लाभ उसे वोटों के बिखराव को रोकने में मिल रहा है। यह एकता ही एनडीए को चुनावी मैदान में मजबूती से टिकाए हुए है, और वह ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी योजनाओं के दम पर एक बड़ी जीत की उम्मीद कर रहा है।

महागठबंधन का सामंजस्य संकट और ‘नौकरी’ का स्वप्न

इसके विपरीत, महागठबंधन की राहें अंदरूनी कलह और समन्वय के अभाव से कठिन हो रही हैं। विपक्षी खेमे में सीटों के बंटवारे को लेकर अनिश्चितता अब तक बनी हुई है, और सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई महत्वपूर्ण सीटों पर कांग्रेस तथा राजद के उम्मीदवार आमने-सामने मजबूती से चुनाव लड़ रहे हैं। वोटों का यह बिखराव प्रत्यक्ष रूप से एनडीए को लाभ पहुंचा रहा है।

राजद नेता तेजस्वी यादव ने लालू यादव की अस्वस्थता के बावजूद पार्टी की कमान संभालते हुए, टिकट वितरण में ‘ए टू जेड’ (सभी जातियों) फॉर्मूला लागू करने का प्रयास किया है, ताकि पार्टी पर लगे ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) तक सीमित होने के ठप्पे को तोड़ा जा सके। हालांकि, सहयोगी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस, के साथ सामंजस्य की कमी और उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव द्वारा कई सीटों पर बागी उम्मीदवारों को उतारना महागठबंधन की एकजुटता को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है।

इन चुनौतियों के बीच, तेजस्वी यादव ने अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार ‘हर घर को एक नौकरी’ देने के वादे को बनाया है। बिहार में बेरोजगारी दर उच्च बनी हुई है, और यह वादा युवाओं और उनके परिवारों के बीच उम्मीद की लहर पैदा कर रहा है। राजद भले ही एकल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने की ओर अग्रसर दिख रही हो, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए त्रिशंकु विधानसभा की आशंका गहरा रही है, जिसमें वोटों के बिखराव के कारण एनडीए पहले स्थान पर रह सकता है।बाहुबल का बोलबाला और चुनावी हिंसा का बढ़ता ग्राफ बिहार की राजनीति बाहुबलियों के साये से कभी पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है, और यह चुनाव भी अपवाद नहीं है। मोकामा विधानसभा सीट इस बार चुनावी हिंसा और जातीय ध्रुवीकरण का केंद्र बनी हुई है। यहां बाहुबली अनंत सिंह (जेडीयू) और उनके विरोधी परिवार से सूरजभान सिंह की पत्नी बीना देवी (राजद) के बीच सीधा मुकाबला है। इस सीट पर जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या ने चुनावी माहौल को और गरमा दिया है, जिसके आरोप में जेडीयू के प्रत्याशी अनंत सिंह को गिरफ्तार किया गया।

इसके अलावा, पूर्णिया में मतदान के ठीक पहले हुए तिहरा हत्याकांड जैसी संदिग्ध घटनाएं बिहार चुनाव में अपराध और हिंसा की गहरी समस्या को सामने लाती हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट इन आशंकाओं की पुष्टि करती है। रिपोर्ट के अनुसार, दूसरे चरण के बिहार विधानसभा चुनाव में 32 प्रतिशत उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 193 उम्मीदवारों पर हत्या से जुड़े गंभीर मामले हैं। यह आंकड़ा बिहार के लोकतंत्र के समक्ष कानून के शासन की गंभीर चुनौती को दर्शाता है। एनडीए इसी तथ्य को भुनाते हुए ‘जंगल राज की वापसी’ का मुद्दा बार-बार उठा रहा है, हालांकि अपराधिक मामलों में वृद्धि (2013 में 183.7 से 2023 में 277.5 प्रति लाख आबादी) के सरकारी आंकड़े भी चिंताजनक हैं।

अन्य खिलाड़ियों की भूमिका और निर्णायक मोड़

इस निर्णायक लड़ाई में, कुछ अन्य छोटे खिलाड़ी भी प्रमुख गठबंधनों के भाग्य को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। प्रशांत किशोर की जन सुराज: चुनावी प्रचार के दौरान जन सुराज पार्टी की मजबूती शुरुआती सक्रियता के मुकाबले अब शांत दिख रही है, लेकिन पटना, मुजफ्फरपुर, चनपटिया और ओबरा जैसी कुछ महत्वपूर्ण सीटें हैं, जहां जन सुराज मजबूत दावेदारी पेश कर सकता है और अनुमान है कि यह पार्टी 5 से 10 सीटों पर परिणाम बदलकर मुख्य गठबंधनों के गणित को बिगाड़ सकती है।
AIMIM का दखल: असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (AIMIM) सीमांचल और मुस्लिम बहुल सीटों पर अपनी पैठ बनाकर त्रिकोणीय मुकाबला बना रही है। इसका सीधा नुकसान राजद को होगा, जिससे महागठबंधन की जीत की संभावनाएँ प्रभावित होंगी। युवा मतदाता: पहले चरण में 18 जिलों की 121 सीटों पर मतदान होना है, जहां 18-19 वर्ष के 7.37 लाख से अधिक नए मतदाता पहली बार वोट करेंगे। युवा वर्ग का यह विशाल समूह भविष्य की राजनीति का रुख तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 एक बहुआयामी लड़ाई है, जो कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों, जातीय समीकरणों, बेरोजगारी के मुद्दे, कानून व्यवस्था की चिंता, और गठबंधनों के आंतरिक सामंजस्य के बीच लड़ी जा रही है। एनडीए अपनी योजनाओं और संगठन की एकता के बल पर मजबूत स्थिति में है, जबकि महागठबंधन ‘नौकरी’ के वादे और युवा नेतृत्व के दम पर उम्मीदें पाले हुए है। इस ‘महाभारत’ का अंतिम परिणाम ही यह तय करेगा कि बिहार की सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाएगी और राज्य की राजनीति किस दिशा में मुड़ेगी।